के.आर. मलकानी: जयंती (19 नवम्बर) पर विशेष आपातकाल और आपबीती

    दिनांक 20-नवंबर-2020
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के.आर. मलकानी की पुस्तक ‘द मिडनाइट नॉक’ के  हिंदी रूपांतरण ‘आधी रात कोई दस्तक दे रहा है’ में आपातकाल की भयावहता का  मार्मिक वर्णन किया गया है। यह आपातकाल के उन दिनों को पाठकों के सामने सजीव कर देगा जिन्होंने आपातकाल को नहीं देखा

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‘आधी रात कोई दस्तक दे रहा है’ नामक शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय विचारक, लेखक, पत्रकार, संपादक श्री के.आर. मलकानी की अंग्रेजी में छपी पुस्तक ‘द मिडनाइट नॉक’ का हिंदी रूपांतर है।  नरेश मेहता ने इस पुस्तक को हिंदी में रूपांतरित किया और सन् 1978 में इलाहाबाद के लोक भारती प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया। इस पुस्तक की कथा भारतीय लोकतंत्र के काले अध्याय ‘आपातकाल’ की त्रासदी को रेखांकित करती है। हम सहृदयी भारतवासियों की यह सुधारणा थी कि इतनी दीर्घकालीन उच्च दर्शनिक परंपरा, संतों, महापुरुषों, ऋषियों के जीवन प्रसंगों, उनके मार्गदर्शन आचरणों व जीवन चरित्रों के कारण भारत में कभी कोई अमानवीय, कू्रर, निर्मम, तानाशाह उत्पन्न नहीं होगा। गांधी जी व उच्च लोकतंत्र की प्रणाली के कारण भी हम आश्वस्त थे किन्तु 26 जून, 1975 को समाजवादी राजनीति भी मध्यकालीन ही सिद्ध हुई। भारतीय नागरिकों की स्वतंत्रता का बलात अपहरण किया गया, जबानों पर ताले जड़े गए और स्वतंत्र देश जेल में बदल दिया गया। गिरफ्तार किए गए लोगों में राजनेता, सांसद, पत्रकार, संपादक, वकील, प्रोफेसर, लेखक, विद्यार्थी आदि थे। ‘दो शब्द’ शीर्षक से प्रस्तुत अपने मन की बात में नरेश मेहता लिखते हैं कि ‘‘ मैं सामान्यत: अनुवाद नहीं करता और विशेषकर प्रतिबद्ध राजनीतिक रचना का तो नहीं ही। लेकिन ‘द मदरलैंड’ के यशस्वी संपादक श्री मलकानी की इस रचना को आपातकाल पर निकली अन्य पुस्तकों से भिन्न एवं विशिष्ट पाया। इस रचना में उनके पत्रकार व्यक्तित्व से अधिक संस्पर्शी रचनाकार तथा उससे भी ज्यादा समाज से जुड़े एक बुद्धिजीवी होने के संतुलित व्यक्तित्व का परिचय मिला।
अनुवादक की इसी जुड़ाव की भाव-भूमिका में मलकानी जी द्वारा लिखित प्राक्कथन के शब्दों को आइए पढ़ते हैं ‘‘ एक बंदी जो देखता है, सुनता है तथा भोगता है उसकी ही यह मर्मगाथा है। उस अर्थ में यह किसी भी बंदी का आत्मचरित्र हो सकती है या बंदी जीवन के संबंध में सभी बंदियों का सर्वोत्कृष्ट दस्तावेज भी। इसके कई अध्याय, जेल में प्रबंध के ढंग पर लिखे गए, लेकिन उस समय मुझे किंचित भी कल्पना न थी कि ये पुस्तक रूप में संकलित तथा प्रकाशित भी होंगे। फिर भी मैंने लिखा, इसलिए कि एक लेखक को लिखना-पढ़ना चाहिए, नहीं तो उसकी आत्मिक मृत्यु हो जाएगी।’’
महीनों तक जेल में भोगी गई कठोर यातना के बाद भी मलकानी जी जब यह लिखते हैं कि ‘आंसुओं से अधिक मुस्कानों की सृष्टि हो’ तो संत पुरुष, ऋषितुल्य से प्रकट होते हुए दिखते हैं। बुद्ध के शांत भाव को अंगीकार करते हुए दिखते हैं।
‘आधी रात कोई दस्तक दे रहा है’ नामक पुस्तक को भी मलकानी जी ने विधिवत शीर्षकों से अनेक अध्यायों में प्रस्तुत किया है जैसे-आधी रात: एक दस्तक, गड़गड़ाहट, परी कथाओं से भी अधिक विचित्र, ग्रहों की भविष्यवाणी, दो अविस्मरणीय दिन, तीन कारागार, हवा महल, विचार अनुष्ठान, बंदी जीवन, मुलतान-एक नया परिप्रेक्ष्य, अंतिम हंसी और संघ के चरणों में। इन अध्यायों से कुछ उद्धरण पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं:-
‘‘मलकानी साहब! मलकानी साहब!  मैं नींद में ही जागा। आश्चर्यचकित था कि इस समय यह कौन पुकार रहा है? रात गरम थी और मैं थोड़ी देर पहले ही सोने के लिए गया था क्योंकि 25 जून वाले जे.पी. के ऐतिहासिक भाषण का देर रात तक संपादन करता रहा था। इसलिए जिस समय यह असामान्य दस्तक और अपने नाम की बेवक्त पुकार सुनी, तब तक मैं गहरी नींद  में नहीं सोया था। ‘‘आप मलकानी साहब हैं न?’’ जी हां! ‘‘आपको थाने चलना होगा! एक क्षण में ही सारी बात समझ में आ गई कि यह किसी एक व्यक्ति की आसन्न मृत्यु नहीं है बल्कि यह सम्पूर्ण लोकतांत्रिक प्रणाली की संभावित मृत्यु थी। ’’
मैंने उनसे अपना वारंट मांगा, जो कि उनके पास नहीं था। मैंने अपने आॅफिस में फोन किया। उन्हें सारी सूचना दी और कहा कि वे तत्काल संघ, जनसंघ, पी.टी.आई और यू.एन.आई. को भी खबर कर दें। मेरा यह फोन, मैं समझता हूं कि उन सारे लोगों के लिए सामयिक चेतनावनी थी जो बाद में पुलिस के शिकंजे से अपने को बचा सके। जाहिर था कि दिल्ली में उस रात गिरफ्तार किए जाने वालों में मैं पहला व्यक्ति था। ‘द मदरलैंड’ के लेख घर तक पहुंच गए थे।
रात्रि के डेढ़ बजे जैसे ही चलने को हुआ कि सुंदरी ने चाहा कि वह बच्चों को जगा दे लेकिन मैं नहीं चाहता था कि बच्चे इस विषम परिस्थिति का सामना करें, इसलिए सबसे बड़े सत्रह बर्ष के अरविंद को ही जगाया गया, जो कि उस समय जो घटित हो रहा था, उसे देखकर चकित था। ज्यों ही विदा लेकर बाहर जाने को हुआ, त्यों ही मुझे लगा कि शायद अब मैं फिर कभी न लौटूं इसलिए मैंने चाहा कि मैं अपनी दस वर्ष की बिटिया सिंधू और  18 वर्ष के विक्रम को प्यार करता चलूं। लेकिन मेरा यह प्यार करना पुलिसवालों को कहीं मेरी कमजोरी या भावुकता न लगे, इसलिए सीधा जाकर पुलिसवालों की जीप में बैठ गया। जैसे ही जीप रवाना हुई कि बगल वाले लॉन से कुछ और भी पुलिस वाले निकल आए, स्पष्ट था कि पुलिस ने सारे रास्तों की नाकाबंदी कर रखी थी। यह एक सफल धावा था।
जब हम न्यू राजेन्द्र नगर थाने पहुंचे तो वहां एक पुलिस अफसर को छोड़कर कोई नहीं था। लगभग ढाई बजे भारतीय जनसंघ के उपाध्यक्ष डॉ. भाई महाबीर वहां लाए गए। क्या विषमता थी कि वहां पहुंचने पर 4.20 पर हमें मीसा के वारंट थमाए गए। जब हमें सिविल लाइन्स पुलिस प्रमुख कार्यालय पहुंचाया गया तब थोड़ी-थोड़ी देर में हमारे बीच बीजू और पीलू, राजनारायण और चंद्रशेखर तथा और भी कई नेता पहुंच चुके थे। सूर्योदय के पहले ही हम दस को एक पुलिस गाड़ी में बैठाया गया। बहादुरगढ़ पर हमें उपेक्षापूर्ण चाय दी गयी। यहां भी हमें नहीं बताया गया कि कहां ले जाया जा रहा है, जब तक कि हम रोहतक जेल नहीं पहुंचे। आरंभिक खानापूर्ति के बाद हमें सामूहिक हाल ले जाया गया, जहां एक दर्जन खाटें चेन से बंधी पड़ी थीं। यहां घुसते ही किसी ने कहा कि हम एक सप्ताह में ही मुक्त हो जाएंगे जबकि दूसरे का ख्याल था कि शायद एक मास में, परंतु बीजू पटनायक ने आजीवन कहा। वे आगे बोले ‘‘मैं श्रीमती जी को जानता हूं कि वह कितनी निर्मम हो सकती हैं।’’ अशोक मेहता और सिकंदर बख्त भी आधे घंटे बाद हममें शामिल हुए इसके बाद ही रेडियो ने घोषणा की कि राष्ट्रीय आपातकालीन तिथि लागू कर दी गई है। आपातकाल?

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‘द मदरलैंड’ ने शुरू से ही सरकार के गंदे पैरों का भंडाफोड़ किया था बल्कि ‘द मदरलैंड’ के पहले आर्गेनाइजर ने भी यही काम किया था। जिनके पास शस्त्र के नाम पर सिर्फ कलम हो, ऐसे व्यक्ति से क्यों इतना विद्वेष था? 26 जून रात को दो बजे प्रधानमंत्री के आवास से दिल्ली के एक पुलिस अधिकारी को यह जानने के लिए फोन किया गया था कि मैं गिरफ्तार कर लिया गया गया या नहीं ताकि वह आश्वस्त हो सकें।
अपातकाल की घोषणा के कुछ दिन बाद नेहरू परिवार से संबंधित एक निकट का व्यक्ति तीन विभिन्न अवसरों पर सुंदरी से मिला था। वह चाहता था कि सुंदरी प्रधानमंत्री से मिले, जाहिर था मेरे लिए। उस व्यक्ति ने कहा कि 14 जून, 1975 के अपने संपादकीय में जो पुराण पंथी उपदेश- ‘‘स्त्री, दफा हो, फिर कोई पापाचार नहीं’’ दिया गया है उससे मैडम बहुत दु:खी हैं, लेकिन सुंदरी ने दृढ़ता के साथ मिलने से अस्वीकार कर दिया, ‘‘मुझे उससे कोई काम नहीं।’’
‘दो अविस्मरणीय दिन’ शीर्षक से प्रस्तुत पाठ में श्री मलकानी जी लिखते हैं कि ‘‘लगभग दो बजे रात में मैंने देखा कि मुझे ‘मुखबिर-वार्ड’ में लगाया जा रहा है। क्या यह कोई षड्यंत्र है? क्या मैं मुखबिर हो गया? क्या देने वाला था यह विचार!... यह दूसरा वार्ड एक भिन्न दुनिया था। इसमें भयंकर अपराधी ही रोज जाते थे जिनके डंडाबेड़ी पड़ी रहती थी। जिन्हें डंडाबेड़ी नहीं पड़ी थी, वे पागल थे। क्या मुझे भी डंडाबेड़ी में ही रखा जाएगा? क्या इन्दिरा गांधी शासित भारत रहने के योग्य था? मैंने पूछा कि मुझे ऐसे वार्ड में क्यों ले जाया रहा है? अधिकारी ने बड़े टेढ़े ढंग से जवाब दिया-‘दिल्ली का हुक्म है कि मुझे अगले हुक्म तक अकेला ही रखा जाए।’ कोठरी में कोई पंखा नहीं था। कमोड भी शाम को ही लाया जाना था।
अगले दिन अम्बाला का एक फल विक्रेता नाथ जो कि आजीवन कारावासी था, पंखा टांगने के लिए तैनात कर दिया गया। लंच के लिए दाल और रोटी मिली। रोटी में बालू बहुत थी, और उसे विषैला बना दिया हो तो? जिस सरकार ने खूनियों के बीच डाल रखा हो वह स्वर्ग या नरक कहीं भी भेजने में क्यों झिझकेगी?’’ मलकानी जी आगे लिखते हैं- ‘‘मैंने सुंदरी को  पत्र लिखा कि वह मेरी चिंता न करे। मैंने शाह लतीफ को उद्धृत किया कि दु:ख, सुख के अलंकार हैं। मैं सुखों का अगर वे बिना दु:ख के आते हैं तो परित्याग कर सकता हूं। अधिकारी मेरे पत्र को लेकर वापस लौटा कि यह नहीं भेजा जा सकता। सिंधी की यह पंक्ति संकेत- भाषा में खतरनाक संदेश बन सकती है। मुझे उसे काट देना पड़ा। अगले दिन मैंने राष्ट्रपति के नाम एक तार तैयार किया। संदेश था ‘‘खूनियों और पागलों के बीच अकेले बंद किए जाने का घोर विरोध है, हिसार।’’
‘तीन कारागार’ शीर्षक से प्रस्तुत पाठ में मलकानी जी अपनी व्यथा को आगे बढ़ाते हुए लिखते हैं कि हिसार जेल दुखती रग के समान थी। जब भी भूख लगती मैं मुट्ठी भर चने (भुगड़े) खा लिया करता था। हिसार के उन अजीबोगरीब चार महीनों में मैंने 15 किलो वजन खोया था। खाटें, लौह के दरवाजों से जंजीरों में बंधी रहतीं, इसलिए कि दीवार फांदने की कोशिश में कहीं हम उन्हें सीढ़ियां न बना लें। गुसलखानों में दरवाजे नहीं थे और पाखानों के पल्लों में बोल्ट नहीं थे। बिजली तो इनमें से किसी में नहीं थी। पानी के एक गढ़े में से हम नहाते, जो कि सामान्यत: घोड़ों के लिए होता है। हमारी चिट्ठियां हिसार, चंडीगढ़ और दिल्ली में सेंसर की जाती थीं। अगस्त से सितम्बर तक मुझे कोई चिट्ठी नहीं मिली और न ही सुंदरी को ही मेरा पत्र मिला। महीनों पर महीने बीत रहे थे और मैं चिंतित था कि परिवार किस प्रकार चल रहा होगा। मुझे याद है कि मैं अपने पीछे बैंक में 300 रुपए छोड़ आया था। हालांकि सुंदरी ने मुझे लिखा कि इस बारे में मुझे चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है, फिर भी सोचता तो रहा ही वे लोग सब कैसे जुगाड़ बैठा रहे होंगे। ... जब यह खबर आई कि मुझे 20 नवम्बर को दिल्ली हाईकोर्ट में प्रस्तुत होना है तो मैंने इस संभावना का स्वागत किया। घर से बढ़कर और क्या हो सकता है? अपने ही शहर की जेल में दूसरे शहर की जेल से बेहतर ही है। दिल्ली की बदली हुई, हालांकि हथकड़ियों में तिहाड़ में मीसा बंदी पांच वार्डों में विभक्त थे। वार्ड नंबर एक में युवा नेता, छात्र, अध्यापक और पत्रकार थे, बंदी जीवन की यातना से मुक्ति के लिए  हममें से अनेक हनुमान चालीसा का पाठ करते थे। एक बार हमारे वार्ड में रामायण का अखंड पाठ भी सम्पन्न हुआ था।
मलकानी जी ने अपनी इस पुस्तक के अंतिम दो अध्यायों ‘अंतिम हंसी’ व ‘संघ के चरणों में’ निम्न तथ्यों को प्रस्तुत किया है-
जब सरकार ने इमरजेंसी लागू कर दी, तीस हजार के करीब लोग जेलों में ठूंस दिए तो उनमें अधिकांश बंदी या तो राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के थे या संघ की पृष्ठभूमि के भारतीय जनसंघ के लोग थे।  बाद में नवम्बर 1978 में जब ‘सत्याग्रह’ आरंभ हुआ तो भी इन सत्याग्रहियों में बहुत बड़ी संख्या उनकी ही थी।  राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ में ऐसा क्या है जो अपने अनुयायी को देश के लिए प्राणार्पण के लिए वह तैयार कर लेता है? शायद मेरे अपने उदाहरण से स्पष्ट कर सकूं कि संघ किसी व्यक्ति के लिए क्या करता है तथा संघ, राष्ट्र के लिए क्या करता है?
वह 18 जनवरी की शाम थी। हम रात्रि भोज के बाद विश्राम कर रहे थे कि दूसरे वार्ड का एक लंबरदार आया और उसने बताया कि बी.बी.सी. ने घोषणा की कि मोरार जी देसाई तथा श्री लालकृष्ण आडवाणी छोड़ दिए गए हैं और भारत सरकार ने लोकसभा के चुनावों का निर्णय ले लिया है। इन 19 महीनों में पहली  बार प्रसन्न मन से मैंने इस समाचार की पुष्टि के लिए ‘आकाशवाणी’ लगाया। जी हां, प्रधानमंत्री लोकसभा के चुनाव की घोषणा कर रही थीं।
प्रतीक्षित दिन और रात आखिरकार आए। रात के भोजन के समय तक एकदम स्पष्ट हो गया था कि जनता पार्टी जीत रही है। रात एक बजे के बाद एक साथी के चिल्लाने की आवाज आने लगी, ‘माई हार गई, माई हार गई।’ हम चार बजे तक जगते कि अगर कहीं रेडियो सुनने में जरा भी चूक हो जाए तो उस समय फिर सुना जा सके। तभी शोर सुनाई दिया ‘‘इमरजेंसी उठ गई। इमरजेंसी उठ गई।’’ तत्काल ही बधाई देने के लिए जेल अधिकारी उपस्थित हो गए। हमें लग गया कि दिन शुरू होने से पहले ही बाहर हो जाएंगे। हुए भी 4.20 पर सवेरे। दीर्घकाल-रात्रि बीत चुकी थी। लगता था कि यह अजीब 420 वाला गोरख-धंधा हैलेकिन चलो आखिरकार सब खत्म हुआ। 21 मार्च, 1977 का प्रात: काल सहसा सुगंधित हो उठा और लगा कि जहां तक याद पड़ता है, उन सबसे अधिक आज यह सुहाना दिन वास्तविक है। फ्रांसीसी क्रांति के संबंध में वडर््सवर्थ की पंक्तियां सहसा याद हो आयीं। ‘‘परमानंद था उस सूर्योदय की बेला में जीवित रहना परंतु युवा होना स्वयं स्वर्ग ही था।’’ और जेल अधिकारियों ने प्रसन्नता से हमारे साथ मिठाइयों पर हाथ साफ किये। सबकी आंखों में आंसू थे, निश्चय ही अश्रु प्रसन्नता के थे।
( लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सिंधी भाषा के एसोसिएट प्रोफेसर हैं )