इस्लामिक आतंकवाद से कराहती दुनिया, फ्रांस के बाद अब वियना में आतंकी हमला

    दिनांक 03-नवंबर-2020
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प्रणय कुमार
फ्रांस में हो रहे आतंकवादी हमले अभी थमे भी नहीं थे किआज ऑस्ट्रिया के वियना शहर में आतंकवादियों ने छह जगहों पर हमले किए जिसमें चार की मौत और 14 नागरिक घायल हो गए

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आतंकी हमले के बाद जान बचाकर भागते लोग।
इस्लामिक कट्टरपंथी ताक़तें पूरी दुनिया में अमन और भाईचारे का माहौल बिगाड़ने का काम कर रही हैं। भारत में भी भोपाल, बरेली, अलीगढ़, मुंबई आदि स्थानों पर मज़हबी प्रदर्शन हुए। शहर-शहर, गली-गली ऐसे प्रदर्शनों की बाढ़ आना चिंताजनक है। होना यह चाहिए था कि फ्रांस में हो रहे आतंकवादी वारदातों के विरुद्ध इस्लाम के अनुयायियों के बीच से आवाज़ उठनी चाहिए थी। पर हो उल्टा रहा है। गला रेते जाने वालों के समर्थन में जुलूस-जलसे आयोजित किए जा रहे हैं। सैमुअल मैक्रो की तस्वीरों पर पांव रखकर कट्टरपंथी इस्लामिक ताक़तें अपनी घृणा का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रही हैं। विभिन्न् देशों के मुस्लिम नेता सरेआम उसके समर्थन में बेहद शर्मनाक बयान ज़ारी कर रहे हैं। तुर्की, पाकिस्तान से लेकर तमाम इस्लामिक मुल्कों में फ्रांस के विरोध को लेकर एक होड़-सी मची है। इन आतंकी घटनाओं को मिल रहे व्यापक समर्थन का ही परिणाम है कि आतंकवादियों के हौसले बुलंद हैं। आज लगभग पूरा यूरोप ही आतंकवाद की चपेट में आता दिख रहा है। फ्रांस में हो रहे आतंकवादी हमले अभी थमे भी नहीं थे कि कनाडा से भी ऐसे हमलों की पुष्टि हुई और आज ऑस्ट्रिया के वियना शहर में आतंकवादियों ने छह जगहों पर हमले बोल दिए, जिसमें चार की मौत और 14 नागरिक घायल हो गए।
इन कट्टरपंथी ताक़तों की जड़ में कौन-सी विचारधारा या मानसिकता काम कर रही है ? वह कौन-सी विचारधारा है, जो चर्च में प्रार्थना कर रही 70 साल की बुज़ुर्ग महिला को अपना दुश्मन मानती है ? वह कौन-सी विचारधारा है जो एक अध्यापक की हत्या का समर्थन करती है ? वह कौन-सी विचारधारा है जो विद्यालयों-पुस्तकालयों-प्रार्थनाघरों पर हमला करने में बहादुरी देखती है ? वह कौन-सी विचारधारा है जो दूर देश में हुए किसी घटना के विरोध में बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिन्दुओं के घर जलाने में सुख पाती है ? दुनिया के किसी कोने में कोई घटना होती है और उसे लेकर भारत या अन्य तमाम देशों में विरोध, हिंसक प्रदर्शन, रैलियां-मजलिसें समझ से परे है ? सवाल यह उठता है कि क्या ऐसा पहली बार हो रहा है ? आधुनिक समाज संवाद और सहमति के रास्ते पर चलता है। समय के साथ तालमेल बिठाता है। किसी काल विशेष में लिखे गए ग्रंथों, दिए गए उपदेशों, अपनाए गए तौर-तरीकों को आधार बनाकर तर्क या सत्य का गला नहीं घोंटता। चांद और मंगल पर पहुंचते क़दमों के बीच कट्टरता की ऐसी ज़िद व जुनून प्रतिगामी एवं क़बिलाई मानसिकता है।
क्या यह सवाल पूछा नहीं जाना चाहिए कि आतंकवाद या इस्लामिक कट्टरता को वैचारिक पोषण कहां से मिलता है ? क्यों सभी आतंकवादी समूहों का संबंध अंततः इस्लाम से ही जाकर जुड़ता है ? कट्टरता को पोषण देने वाले सभी विचारों-मजहबी किताबों की युगीन व्याख्या होनी चाहिए। चाहे वह कितना भी महान, पवित्र और सार्वकालिक क्यों न मानी-समझी-बतलाई जाएं। चाहे वह किसी भी पैगंबर-प्रवर्तक-मुल्ला—मौलवी द्वारा क्यों न प्रचलित की गई हों ? किसी काल-विशेष में लिखी और कही गई बातों पर गंभीर मंथन कर अवैज्ञानिक, अतार्किक और दूसरों के अस्तित्व को नकारने वाली बातों-सूत्रों- आयतों, विचारों-विश्वासों-मान्यताओं-रिवाज़ों को कालबाह्य घोषित करना चाहिए। क्या यह सत्य नहीं कि इस्लामिक कट्टरता के सर्वाधिक शिकार मुसलमान ही हुए हैं ? और इस मज़हबी कट्टरता का कोई संबंध शिक्षा या समृद्धि के स्तर-स्थिति से नहीं। मज़हबी कट्टरता एक प्रकृति है, विकृति है।