अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता का 'सीरियल किलर' नेहरू-गांधी परिवार

    दिनांक 04-नवंबर-2020   
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अर्नब के साथ जो हुआ व नई बात नहीं है, यह परंपरा है। यह परंपरा है नेहरू गांधी परिवार की, वे हमेशा से ऐसा करते आए हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना, कांग्रेस और राकांपा की महाअघाड़ी सरकार है। राकांपा तो खैर कांग्रेस की बी टीम है ही, उद्धव ठाकरे का भी पूरी तरह कांग्रेसीकरण हो चुका है

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रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के प्रमुख व जाने-माने टीवी पत्रकार अर्नब गोस्वामी को बुधवार सुबह मुंबई पुलिस ने किसी गुंडे की माफिक गिरफ्तार कर लिया। मारपीट, परिवार के सदस्यों के साथ बेअदबी। सब बिल्कुल ठेठ पुलिसिया अंदाज में। और साफ शब्दों में कहें, तो ठेठ कांग्रेसी अंदाज में। महाराष्ट्र में शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस की महाअघाड़ी सरकार है। राकांपा तो खैर कांग्रेस की बी टीम है ही, मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का भी पूरी तरह कांग्रेसीकरण हो चुका है। इस कार्रवाई पर कांग्रेस की कार्यशैली की मुहर थी। वही कार्यशैली जो आजादी के बाद से आज तक लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की आवाज को दबा देना चाहती है, कुचल देना चाहती है। नेहरू से लेकर सोनिया तक मीडिया और न्यायपालिका, लोकतंत्र के दोनों ही स्तंभों को अपना पिट्ठू बनाकर रखने की प्रवृत्ति पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।
देश आजाद होते ही नेहरू की ये इच्छा सामने आ गई थी कि कैसे भी मीडिया पर नियंत्रण रखना है। उन्होंने ही इस परंपरा की नींव डाली कि न्यायपालिका पर सरकार अपनी पसंद के लोगों को आगे बढ़ाकर नियंत्रण बनाए। फिर इंदिरा गांधी तो और आगे निकल गईं। आपातकाल के वे काले दिन ये देश कभी नहीं भूलेगा. मौलिक अधिकारों तक को छीनने का प्रयास इंदिरा गांधी ने किया। राजीव गांधी कहां कम थे। वह मीडिया पर नियंत्रण के लिए कानून तक बनाने की तैयारी कर बैठे थे। बोफोर्स मामले में जिस तरीके से एक्सप्रेस ग्रुप पर ताबड़-तोड़ छापे मारे गए, क्या वह अर्नब प्रकरण की याद नहीं दिलाता।
फिर सोनिया गांधी कैसे पीछे रह सकती थीं। कांग्रेस का एक अपना पसंदीदा मीडिया है। इसे आप पद्म पुरुस्कार मीडिया भी कह सकते हैं। इसके अलावा जो बोलने का प्रयास करता है, कांग्रेस उसका मुंह दबोच लेना चाहती है। सत्ता का बेशर्म दुरुपयोग आज पूरा देश देख रहा है और सोनिया गांधी अपने बयानों में सरकार को अभिव्यक्ति की आजादी की सीख दे रही हैं।
नेहरू ने संविधान के पहले संशोधन में ही प्रेस का गला घोटा
अमेरिका की जब बात होती है, जो संवैधानिक रूप से पहला संशोधन अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार नागरिकों को देता है, लेकिन भारत के संविधान में जो पहला संशोधन हुआ था, वह ठीक इसके उलट है। यह लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अंततः प्रेस की आजादी पर लगाम लगाता है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को एक तबका उदारवादी करार देते नहीं थकता। लेकिन वह नेहरू थे, जिन्होंने प्रेस की आजादी को कुचलने का इंतजाम किया। पहले संशोधन में न सिर्फ मीडिया में प्रकाशित विचारों पर पहरे का इंतजाम किया गया, बल्कि सरकारों को ये अधिकार दे दिया गया कि वे समाचारपत्रों पर कार्रवाई भी कर सकती हैं। नेहरू का दावा था कि प्रेस के अश्लीलता और झूठे समाचारों को परोसने की प्रवृत्ति के चलते ऐसा किया गया है। हालांकि ये कोरा झूठ है। नेहरू दरअसल दिखावे के ही लोकतंत्रवादी थे। वह बेहद दंभी थे और उन्हें आलोचना बर्दाश्त नहीं थी। उनका कार्यकाल इस तरह के उदाहरणों से भरा पड़ा है।
आजाद भारत में जब मीडिया ने नेहरू की नीतियों की आलोचना शुरू की, तो उन्हें ये बर्दाश्त नहीं हुआ। माना ये जाता है कि संघ परिवार के कुछ प्रकाशनों को निशाना बनाने के लिए नेहरू ने ये इंतजाम किया था। नेहरू ने संसद में दलील दी थी कि बहुत से गैर जिम्मेदार समाचार माध्यम युवाओं के दिल में जहर भर रहे हैं। मेरे लिए यह राजनीतिक से ज्यादा नैतिक समस्या है। इस तरह नेहरू देश में नैतिकता के स्वयंभू अलंबरदार बन बैठे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तब कहा था कि ऐसा कुछ नहीं हो गया, जिसकी आड़ में प्रेस की स्वतंत्रता को छीनने को जायज ठहराया जा सके। संशोधन के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जो अधिकार दिया गया है, वह इस कदर व्यापक है कि यदि कोई व्यक्ति हत्या कर देने या अन्य हिंसक अपराधों की भी वकालत करता है, तो उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। बहुत से देशों में जहां लिखित संविधान है, वहां अभिव्यक्ति या प्रेस की स्वतंत्रता का ये मतलब नहीं कि सरकार इसके दुरुपयोग पर उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकती और इसी के साथ लोकतंत्र की मूल भावना अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता की हत्या कर दी गई।
इस कानून की आड़ लेकर नेहरू मशहूर शायर मजरूह सुल्तानपुरी को गिरफ्तार कराया। उनका गुनाह बस इतना था कि वह नेहरू की आलोचना कर बैठे थे। उन्होंने एक साल जेल में बताया। कथित तौर पर टाइम्स ऑफ इंडिया में उनका एक कॉलम भी बंद करा दिया गया क्योंकि यह नेहरू का विरोध करता था।
बेटी इंदिरा ने लिखा लोकतंत्र के इतिहास का काला अध्याय

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लोकतंत्र के काले दिन कौन भूल सकता है। जी हां, इमरजेंसी यानी आपातकाल। पिता ने संविधान में पहले संशोधन से नींव रख दी थी। बेटी इंदिरा गांधी ने पिता की विरासत को आगे बढ़ाया। सत्ता जाने के डर से इंदिरा ने देश पर आपातकाल थोप दिया। 26 जून 1975 को देश के तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने देश में आपातकाल लागू करने के फरमान पर हस्ताक्षर कर दिए। कुछ आंकड़े देखिए। आपातकाल में 3801 के अखबारों के डिक्लेरेशन जब्त कर दिए गए। 327 पत्रकारों को आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम (मीसा) के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। मई 1976 तक अलग-अलग आरोपों में कुल 7000 मीडियाकर्मियों को गिरफ्तार किया गया। 290 अखबारों के विज्ञापन रोक लिए गए। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना शुरू हुई तो टाइम्स और गार्डियन जैसे विदेशी समाचार पत्रों के प्रतिनिधियों को देश छोड़कर जाने के लिए कह दिया गया। रायटर्स समेत तमाम महत्वपूर्ण समाचार एजेंसियों के टेलेक्स और फोन काट दिए गए। जिस दिन आपातकाल की घोषणा हुई इसके बाद अगले दो दिन तक अखबार के दफ्तरों पर छापे पड़ते रहे। दो दिन तक देश की जनता तक अखबार ही नहीं पहुंचने दिया गया। अखबारों में खबरों को सेंसर करने के लिए चीफ प्रेस एडवाइजर पद बनाया गया।
बिना इसकी अनुमति के कुछ नहीं छापा जा सकता था। सबसे पहले इंडियन एक्सप्रेस और द स्टेटमैन ने विरोध स्वरूप अपने संपादकीय वाले हिस्से को खाली छोड़ दिया। इसका अनुसरण बहुत से प्रकाशनों ने किया. टाइम्स ऑफ लंदन, द वाशिंगटन पोस्ट, द लोस एंजलिस टाइम्स के पत्रकारों को देश से निष्कासित कर दिया। द गार्डियन और द इकनोमिस्ट के पत्रकारों को लगातार जान से मारने की धमकियां दी गईं, तो वे अपने मुल्क वापस लौट गए। बीबीसी के मशहूर पत्रकार मार्क टली को भी हटा दिया गया। इसके बावजूद कांग्रेस का पसंदीदा मीडिया का एक वर्ग बेखौफ रहा, पुरुस्कृत होता रहा। इनमें से तमाम तो ऐसे थे, जिन्होंने आपातकाल की तारीफ के पुल बांधे। मजबूर लालकृष्ण आडवाणी को कहना पड़ा था, आपसे सिर्फ झुकने के लिए कहा गया था, लेकिन आप तो रेंगने लगे।
राजीव गांधीः भ्रष्टाचार पर मुंह बंद करने की कोशिश
1988 की बात है। राजीव गांधी का जादू देश के सिर से उतर चुका था. बोफोर्स के दाग दामन पर गहराते जा रहे थे। देश में आंदोलन खड़ा हो रहा था। राजीव गांधी सरकार देश के मीडिया पर अंकुश लगाने वाला बिल लेकर आई। कांग्रेस की सरकार को उस समय प्रचंड बहुमत हासिल था। बिल का उद्देश्य मानहानि की आड़ में मीडिया की स्वतंत्रता को कुचलना था। दरअसल ये भ्रष्टाचार के खिलाफ मीडिया की अति सक्रियता का दौर था। इस बिल को लाने से पहले मीडिया को खामोश करने के लिए राजीव सरकार हर हथकंडा इस्तेमाल कर चुकी थी। यह बिल लोकसभा से पास हो गया, लेकिन कुछ महीने बाद ही राजीव गांधी को बढ़ते विरोध के चलते इसे वापस लेना पड़ा। कुछ समय पहले तक मीडिया पर अंकुश के तलबगार राजीव गांधी की सरकार की ओर से बाकायदा बयान जारी किया गया। स्वतंत्र प्रेस हमारे लोकतंत्र की अंतर्निहित शक्ति का हिस्सा है। बिना फ्री प्रेस लोकतंत्र संभव नहीं है। यह पहला मौका था, जब कांग्रेस की सरकार पर बाहरी ही नहीं, अंदर से सांसदों का भी इस बिल के खिलाफ दबाव था। इस मानहानि विधेयक के विषय में राजीव गांधी का हृदय परिवर्तन इस विरोध के सामने कोई चमत्कार नहीं था। अलबत्ता इस विधेयक के वह किस कदर पुरजोर समर्थक थे, इसकी बानगी उनके बयान में नजर आती है। खुद उन्होंने बयान जारी करके कहा था, हम चाहते हैं कि प्रेस इस विधेयक को पढ़े। हम पूरी तरह से संतुष्ट हैं कि यह बिल्कुल आवश्यकतानुसार है। मुझे यकीन है कि हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। हालांकि इस कानून को बनाने का सपना टूट गया, लेकिन राजीव गांधी के कार्यकाल में जिस तरह से बोफोर्स मामले पर प्रेस को कुचलने की कोशिश हुई, वह आपातकाल सरीखी ही थी।
इंडियन एक्सप्रेस समूह राजीव गांधी का मुख्य निशाना रहा। सैकड़ों की तादाद में सरकारी अधिकारी जब चाहे, एक्सप्रेस पर छापेमारी कर देते थे। इनमें आयकर, कस्टम जैसे विभागों के नुमाइंदे भी शामिल होते थे। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के तत्कालीन महासचिव एच.के. दुआ ने कहा था कि सरकार जानबूझकर देश के प्रमुख समाचारपत्रों को डराने की कोशिश कर रही है। यह प्रेस की आजादी के लिए खतरा है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। हालांकि राजीव गांधी ने इन छापों में अपना हाथ होने से इंकार किया। दलील दी गई कि प्रिटिंग उपकरणों को खरीदने में मुद्रा कानूनों का उल्लंघन किया गया है, जिसकी जांच हो रही है।
आज भी उसी राह पर है कांग्रेस
महाराष्ट्र में जो हो रहा है, उससे साफ हो जाता है कि कांग्रेस की सोच के डीएनए में मीडिया की स्वतंत्रता का विरोध है। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने तो इसे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के इटालियन मूल और उनके पिता के मुसोलिनी से नजदीकी तक से जोड़ा। लेकिन इसके लिए इतना दूर जाने की जरूरत नहीं है। पीढ़ी दर पीढ़ी, कांग्रेस इसी तरह से मीडिया को कुचलने की कोशिश करती रही है। यहां तक कि 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में सोशल मीडिया पर नियंत्रण का वादा तक किया था।