केजरीवाल कहीं बेहतर साबित हुए क्या ?

    दिनांक 04-नवंबर-2020   
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कोरोना की रोकथाम में फेल,नागरिक सेवाओं में फेल, प्रदूषण में फेल , आरोप और सिर्फ आरोप की राजनीति करने वाले केजरीवाल क्या किसी मामले में स्वयं को बेहतर साबित कर पाए हैं.. जानने के लिए पढ़ें यह रिपोर्ट

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2006 का साल वर्तमान में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के जीवन में एक महत्वपूर्ण साल था। इस साल अरविन्द को रेमन मैग्सेसे अवार्ड मिला और इसी साल अरविंद अपनी भारतीय राजस्व सेवा की नौकरी छोड़कर पूरे समय के लिए एनजीओ वाले हो गए। वे एनजीओ के माध्यम से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने का दावा कर रहे थे। जबकि एनजीओ क्षेत्र आंकठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ था। मतलब अरविंद लोहे से लोहे को काटने की इच्छा रख रहे थे।
कानपुर के ठग्गू के लड्डू और दिल्ली की आम आदमी पाटी का ध्येय वाक्य फिर एक ही हो गया, ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं। अन्ना हजारे, प्रशांंत भूषण, योगेन्द्र यादव, राजू पुरुलेकर, आशुतोष गुप्ता, आशीष खेतान, कपिल मिश्रा जैसे दर्जनों नामों की एक लंबी सूची है।
असफलताओं की सरकार
दिल्ली में अरविंद केजरीवाल असफलताओं का इतिहास रच रहे हैं। दिल्ली में अपनी कमजोरियों को छुपाने के लिए उनकी पार्टी तरह—तरह के इवेन्ट की न सिर्फ योजना बनाती है बल्कि उसके कार्यान्वयन में भी वे लग जाते हैं। चाहे जामिया नगर का प्रदर्शन हो या फिर शाहीन बाग में सीएए विरोध के नाम पर सड़कों पर अव्यवस्था फैलाने की बात। या फिर उत्तर—पूर्वी दिल्ली में दंगे फैलाने में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं की संदिग्ध भूमिका। पार्टी का एक विश्वासपात्र पार्षद ताहिर हुसैन अपने घर में दंगों का इतना सामान लेकर बैठा था, जैसे उसे पूरी उत्तर पूर्वी दिल्ली को राजधानी के नक्शे से मिटाने की सुपारी मिली हो। इन दंगों के लिए उसके पास कई करोड़ रुपए आए भी। उस दौरान यह खबर भी बाहर आई थी कि पार्टी का पार्षद दंगों के दौरान दिल्ली के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के संपर्क में था।
मुस्लिम तुष्टीकरण
दिल्ली का मुसलमान कांग्रेस का पारम्परिक मतदाता रहा है। कांग्रेस से उन्हें खींचकर आम आदमी पार्टी का मतदाता बनवाने के लिए केजरीवाल को कुछ अलग तो करना ही था। इसलिए दिल्ली के मस्जिदों में बैठने वाले इमामों को प्रति माह 18 हजार रुपए सैलरी देने की बात उसी दिशा में पार्टी का बढ़ाया गया एक कदम था।
दिल्ली वक्फ बोर्ड के चेयरमैन अमानतुल्लाह खान भी दिल्ली दंगों के संदिग्ध हैं। उनके वीडियो जामिया गोली कांड से लेकर उत्तर—पूर्वी दिल्ली दंगों तक कई बार सामने आए। सीएम केजरीवाल की मौजूदगी में पिछले साल अमानतुल्लाह ने ऐलान किया था कि मस्जिदों के मौलानाओ को दस हजार से बढ़ाकर 18 हजार और मुअज्जिन को 9 हजार से बढ़ाकर 16 हजार रुपए प्रति माह दिया जाएगा। वक्फ बोर्ड के चेयरमैन अमानतुल्लाह ने सिर्फ उन 300 मस्जिदों के लिए ऐलान नहीं किया जो वक्फ बोर्ड के अंदर आते हैं। बल्कि ऐसी 1500 मस्जिदें जो वक्फ का हिस्सा नहीं हैं, उनके इमामों को भी 14 हजार रुपए और मोअज्जिन को 12 हजार रुपए सैलरी देने की बात कही गई थी।
कोरोना की रोकथाम में हुए फेल
 
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दिल्ली में कोविड 19 का मामला सम्भलने का नाम नहीं ले रहा। कुछ समय के लिए देश के गृह मंत्री ने खराब होते हालात को देखकर थोड़ी सी सक्रियता दिखाई और राजधानी में हालात नियंत्रण में भी आ रहा था लेकिन उसी दौरान दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल के अंदर का एनजीओकर्मी जाग गया। अरविंद केजरीवाल हर उस जगह पर आम आदमी पार्टी की तख्ती लेकर खड़े हो गए, जो काम गृहमंत्री श्री शाह के नेतृत्व में संपन्न हुआ था।
आज कोविड 19 राजधानी में अपने सबसे खराब स्थिति में है। पिछले एक सप्ताह में 5269 नए मामले औसतन प्रतिदिन आए। उसके बावजूद सरकार के पास इस बीमारी से निपटने की कोई स्पष्ट नीति दिखाई नहीं देती। दिल्ली में दो लाख से अधिक कोविड के मामले हैं और कोविड की वजह से 4500 से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है। उसके बावजूद दिल्ली सरकार इस बीमारी को लेकर गंभीर नहीं दिखाई देती। मनीष सिसोदिया बयान जरूर देते हैं कि कोविड 19 के मरीजों की संख्या साढ़े पांच लाख को पार करेगी और इनके ईलाज के लिए 80,000 अस्पतालों की जरूरत दिल्ली को है।
जब दिल्ली सरकार को कोविड 19 की भयावहता का अनुमान था फिर गृह मंत्री अमित शाह के प्रयासों से कोविड 19 नियंत्रित होता देखकर अचानक उसने दिल्ली में कई तरह की छूट क्यों दे दी? जिसके बाद दिल्ली में फिर एक बार मामले बढ़ने लगे। केजरीवाल सरकार ने छूट के अन्तर्गत राज्य में साप्ताहिक बाजारों को भी शुरू कर दिया। जहां कोविड 19 के लिए जारी गाइड लाइन की खूब धज्जियां उड़ी। कोविड 19 के नियंत्रण को लेकर केजरीवाल सरकार की कोई स्पष्ट नीति तो नहीं दिखाई दे रही लेकिन वह दिल्ली वालों की दीपावली खराब करने की योजना पर जरूर अभी से काम कर रहे हैं। मिल रही खबर के अनुसार वे आने वाली दीपावली—छठ के लिए लंबी—चौड़ी गाइड लाइन बना रहे हैं। जिसमें त्योहार मनाने पर तमाम तरह की पाबंदियां होगी। मतलब दिल्ली सरकार की लापरवाही की सजा दिल्ली वाले भुगतेंगे।
पांच महीने पहले 30 मई, 2020 को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लोगों को आश्वस्त करते हुए कहा था कि केजरीवाल सरकार कोविड 19 से ‘चार कदम आगे’ है। दिल्ली में किसी भी प्रकार की स्थितियों से निपटने के लिए दिल्ली सरकार पूरी तरह तैयार है। केजरीवाल ने आवश्यकता से अधिक बेड के इंतजाम कर लिए जाने का दावा किया था। वे दावे नवंबर आते—आते पंचर हो चुके हैं। दिल्ली इस बात को देख—समझ रही है।
कोरोना महामारी के संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर दिल्ली के वैश्य अग्रवाल समाज के लोगों ने गरीब और जरूरतमंद लोगों के भोजन और राशन की चिंता की। दिल्ली भर में उसका वितरण हुआ।
सिविल डिफेन्स है या आम आदमी पार्टी का कैडर

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दिल्ली के अंदर सिविल डिफेन्स की लगातार शिकायतें आ रहीं हैं, यह भी सच है कि दिल्ली वाले पहली बार इस तरह की असुविधा का सामना कर रहे हैं। सिविल डिफेन्स को अपनी मनमानी करने के दौरान न दिल्ली पुलिस का डर है और ना ही ट्रैफिक पुलिस का। ऐसा लग रहा है कि वह पूरी तरह आम आदमी पार्टी से ही नियंत्रित हो रही है। ऐसे में उन्हें आम आदमी पार्टी का कार्यकर्ता क्यों न कहा जाए?
इन दिनों वर्दी पहन कर 732 रुपए की दिहाड़ी पर कुछ युवक दिल्ली में सिविल डिफेन्स के नाम पर दिल्ली की सड़कों पर अराजकता फैला रहे हैं। सिविल डिफेन्स की कार्य प्रणाली को देखकर लगता है कि सीविल डिफेन्स भी दिल्ली के मुख्यमंत्री के दिमाग से निकला एक नया अराजक शाहकार है। जैसे अन्ना आंदोलन और सीएए के नाम पर दिल्ली में विरोध प्रदर्शन। जैसे दिल्ली दंगे।
दिल्ली पुलिस से उनका टकराव। बिना किसी कानूनी प्रावधान के उनके द्वारा गाड़ियों का चालान काटा जाना। कई जगह पर ये लोग अवैध वसूली करते हुए भी पाए गए। रेड लाइट पर इनकी उपस्थिति से दिल्ली में अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो रही है। कोविड 19 के समय जहां अधिक से अधिक दूरी बनाकर रहना हर एक नागरिक का दायित्व बन जाता है। ऐसे में लाल बत्ती पर पर अरविन्द केजरीवाल की होर्डिंग लेकर सिविल डिफेन्स कार्यकर्ताओं को खड़ा करना कितना उचित है?
कनॉट प्लेस पुलिस स्टेशन में तैनात हेड कॉन्स्टेबल नरेश का पश्चिम दिल्ली के नारायणा विहार में मास्क ठीक से नहीं लगाने पर सिविल डिफेन्स वालों ने चालान काट दिया। न सिर्फ चालान काटा बल्कि उनके साथ हाथापाई भी की। दिहाड़ी पर लगे इन सिविल डिफेन्स कार्यकर्ताओं को बिना आम आदमी पार्टी के सहयोग के इतना साहस कहां से मिल सकता है कि वे दिल्ली पुलिस के साथ हाथापाई करें? दिल्ली की सुरक्षा के लिए आने वाले समय में हालात ऐसे ही रहे तो नए तरह के संकट पैदा हो सकते हैं। जिसे दिल्ली और केन्द्र दोनों सरकारों को समझने की जरूरत है।
अशोक नगर में 23 वर्षीय उपेन्द्र सिंह को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है। उपेन्द्र ने सिविल डिफेन्स के लिए फॉर्म भरा और वर्दी पहन कर अशोक नगर की एक सोसायटी में पैसा वसूली करने पहुंच गया। इससे समझा जा सकता है कि दिल्ली अंदर बेरोजगार युवाओं के बीच सिविल डिफेन्स और भ्रष्टाचार दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची बनते जा रहे हैं। सिविल डिफेन्स के नाम पर जिन युवाओं को दिल्ली सरकार ठग रही है, उन्हें पक्की नौकरी क्यों नहीं दे रही? सिविल डिफेन्स का अर्थ अब दिल्ली वालों के लिए केजरीवाल सरकार से मान्यता प्राप्त अराजक तत्व ही हो गया है। इन्हें अपनी छवि सुधारने के लिए प्रयास करना चाहिए।
सिविल डिफेन्स में बेरोजगारों का कोई भविष्य नहीं
सिविल डिफेन्स का एक दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह भी है कि इनके सामाजिक—आर्थिक सुरक्षा की कोई जिम्मेवारी दिल्ली सरकार की नहीं होती। इसी 13 जुलाई को 48 वर्षिय सीविल डिफेन्स वालेन्टियर अरुण कुमार की कोविड 19 संक्रमण की वजह से मृत्यु हो गई। उनके पीछे परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं। इस परिवार का भरण—पोषण कैसे होगा? इसकी कोई योजना सरकार के पास नहीं है।
दिल्ली सिविल डिफेन्स के संबंध में कुछ बातें जो जानने योग्य है। यहां नौकरी मिलने की कोई गारंटी नहीं है। क्योंकि सिविल डिफेन्स के पास अपनी कोई स्थायी नौकरी नहीं होती है। जब किसी दूसरे सरकारी विभाग से कार्यकर्ताओं की मांग आती है तो सिविल डिफेन्स उनकी पूर्ति करता है। सिविल डिफेन्स कॅरियर का कोई विकल्प नहीं हो सकता। यहां कोई भविष्य नहीं है। सिविल डिफेन्स के परिचय में लिखा मिलता है कि यह एक निष्काम सेवा है, इसलिए भर्ती होने के बाद काम नहीं मिला तो शिकायत न करें। एक महत्वपूर्ण बात कि भर्ती होने के बाद नौकरी मिले या न मिले, आपको एक्सरसाइज, मॉक ड्रील, मीटिंग के लिए नियमित जाना होगा। जिस तरह के काम में दिल्ली के युवाओं को आम आदमी पार्टी ने सिविल डिफेन्स के नाम पर लगाया है, उसे देखकर यही लगता है कि केजरीवाल सरकार सिर्फ उनका इस्तेमाल कर रही है।
अराजकता के सरदार
अरविन्द केजरीवाल अराजकता संबंधी मामलों में सरदार हैं। अब दिल्ली के लोग इस बात को समझने लगे हैं कि अरविंद केजरीवाल सिर्फ शोर मचा सकते हैं। हंगामा खड़ा कर सकते हैं। धरना दे सकते हैं लेकिन बिगड़े हुए हालात को सामान्य करना उनके वश की बात नहीं है। ऐसा उन्हें कभी कोई प्रशिक्षण ही नहीं मिला।
 
बच्चों का विश्वास नहीं, मनीष के स्कूल पर
सच्चाई तो यही है कि मोर्चा दर मोर्चा अरविन्द केजरीवाल की सरकार फेल हुई है। वह स्वास्थ हो, इन्फ्रास्ट्रक्चर हो, पीने का पानी हो, रोजगार हो, पर्यावरण हो, मतलब लगभग हर मोर्चे पर वह फेल हुई है। शिक्षा का दिल्ली सरकार में बहुत प्रचार हुआ। मनीष सिसोदिया इसके ब्रांड एम्बेस्डर बनकर यूट्यूब के लिए भाषण तैयार करते रहे। उन वीडियो पर लाखों लोगों के व्यूज और रिव्यू भी आ गए। लेकिन दिल्ली सरकार की शिक्षा पर न अरविंद को विश्वास हुआ और न ही उनके बच्चों को। यदि वे मनीष सिसौदिया की देखरेख में चल रहे दिल्ली सरकार के स्कूलों में पढ़ते तो दिल्ली वालों का विश्वास दिल्ली सरकार के स्कूलों में और मजबूत होता। लेकिन मनीष और अरविंद की पहचान एनजीओ वाली है और एनजीओ के काम—काज में लोग जानते हैं कि एनजीओ द्वारा चलाया जाने वाला स्कूल और उन स्कूलों के लिए तैयार किया जाने वाला पावर प्रजेन्टेशन अलग होता है और एनजीओ वाले के बच्चे जिस स्कूल में पढ़ते हैं, वह स्कूल अलग होता है।
पानी की समस्या भयावह होने के आसार
वर्ल्ड वाइड फंड की आई नई रिपोर्ट के अनुसार यदि आने वाले समय दिल्ली ने पानी की समस्या के मुद्दे को गम्भीरता से नहीं लिया तो राजधानी में पानी का संकट गहराने वाला है। इस दिशा में दिल्ली सरकार जितने भी प्रयास दिख रहे हैं, वह किसी ठोस कार्रवाई की तरफ इशारा नहीं करते। ऊंचे—ऊंचे मकान बन रहे हैं, शहरीकरण हो रहा है, पेड़ काटे जा रहे हैं, महानगरों में लोग बढ़ते जा रहे हैं, इन सारी बातों को व्यवस्थित करने के लिए दिल्ली सरकार के पास कोई योजना नहीं है। लेकिन हालात ऐसे ही रहे तो इस लापरवाही का परीणाम पूरी दिल्ली भुगतेगी।
पूरे नहीं हुए अब तक सात साल पुराने वादे
2013 में केजरीवाल ने दिल्ली वालों से तीन वादे किए थे। पहला पूरी दिल्ली को साफ़ पानी उपलब्ध होगा। दूसरा सभी नियमित और अनियमित कॉलोनी में सीवर लाइन डाली जाएगी। यमुना नदी की सफाई कराएंगे। सात सालों में एक भी काम वे दिल्ली में नहीं करा पाए हैं। यमुना की सफ़ाई के लिए तो केन्द्र सरकार से केजरीवाल को 400 करोड़ रुपये मिले हैं। केजरीवाल सरकार ने अब तक न कोई काम किया और न ही उन्होंने 400 सौ करोड़ का हिसाब दिया। विपक्ष ने बार—बार यह सवाल केजरीवाल के सामने उठाया कि 400 करोड़ मिलने के बाद भी आज तक यमुना की सफ़ाई के लिए कोई ट्रीटमेंट प्लांट क्यों नहीं लगा?
दिल्ली जल बोर्ड पर 28,000 करोड़ का ऋण
केजरीवाल सरकार दिल्ली जल बोर्ड के निजीकरण पर काम कर रही है। जिस तरह वह साल प्रति साल जल बोर्ड का ऋण बढ़ाती जा रही है, उनके निजीकरण की मंशा को समझना कोई मुश्किल काम नहीं है। अगस्त 2020 तक दिल्ली जल बोर्ड 630 करोड़ रुपये के घाटे में था जो अक्टूबर 2020 में 830 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। दिल्ली जल बोर्ड पर 28000 करोड़ का ऋण है जिसकी किश्तों का भुगतान लंबे समय से नहीं किया गया है। केजरीवाल को बताना चाहिए कि इस ऋण को चुकाने के लिए उनके पास क्या योजना है?
दिल्ली सरकार का सालाना बजट 60,000 करोड़ रुपए का है लेकिन फिर भी दिल्ली सरकार तीनों नगर निगम के कर्मचारियों का 13000 करोड़ रुपए रोक कर बैठी है। जबकि केजरीवाल यह भी नहीं समझ रहे कि निगम कर्मी कोविड 19 संकट के समय फ्रंटलाइन वॉरियर के रूप में काम कर रहे हैं। यदि कोविड 19 के समय में उनका वेतन प्रभावित होगा तो कोविड के समय में दिल्ली की इस बीमारी से लड़ाई भी कमजोर होगी। एक तरफ वे निगम कर्मचारियों को वेतन नहीं दे रहे और दूसरी तरफ सिविल डिफेन्स में नई भर्तियां कर रहे हैं। यह सब देखकर निगम कर्मचारी आपकी नियत पर शक न करें तो क्या करें?
दिल्ली की केजरीवाल सरकार चुनाव के ठीक पहले सक्रिय होती है, पूरे पांच साल सोकर बिताने के लिए। इस वक्त यह सरकार एक के बाद एक मोर्चे पर असफल साबित हो रही है। न प्रदूषण संभल रहा है, न कोविड 19 और दिल्ली के जल बोर्ड को बिकने की स्थिति में इस सरकार ने पहुंचा दिया है। दिल्ली वाले कैसे करें केजरीवाल पर विश्वास?