अर्णब की गिरफ़्तारी मीडिया-जगत और कथित बुद्धिजीवियों को सांप क्यों सूंघ गया है

    दिनांक 06-नवंबर-2020
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प्रणय कुमार
लोकतंत्र में सभी को अपनी बात कहने की आज़ादी है। संविधान अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है। लेकिन असहमति या विरोध की क़ीमत गिरफ़्तारी तो नहीं। आखिर कहां हैं 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का ढिंढोरा पीटने वाले

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महाराष्ट्र पुलिस-प्रशासन ने जिस प्रकार अर्णब गोस्वामी को एक पुराने एवं लगभग बंद पड़े मामले में जिस तरह से गिरफ़्तार किया, वह उसकी मंशा एवं कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। उससे भी ज्यादा सवाल उन कथित बुद्धिजीवियों पर खड़े हो रहे हैं, जो बात—बात पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ढिंढोरा पीटते रहते हैं, लेकिन अर्णब की गिरफ़्तारी पर मुंह सिले हैं
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ माना जाता है। नागरिक अधिकारों की रक्षा करने एवं लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती प्रदान करने में विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के साथ-साथ मीडिया की विशेष भूमिका होती है। उसका उत्तरदायित्व निष्पक्षता से सूचना पहुंचाने के साथ-साथ जन सरोकार से जुड़े मुद्दे उठाना, जनजागृति लाना, जनता और सरकार के बीच संवाद का सेतु स्थापित करना और जनमत बनाना भी होता है। सरोकारधर्मिता मीडिया की सबसे बड़ी विशेषता रही है। यह भी सत्य है कि सरोकारधर्मिता की आड़ में कुछ चैनल-पत्रकार अपना एजेंडा भी चलाते रहे हैं। हाल के वर्षों में टीआरपी एवं मुनाफ़े की गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा ने मीडिया को अनेक बार कठघरे में खड़ा किया है। उसका स्तर गिराया है। उसकी साख़ एवं विश्वसनीयता को संदिग्ध बनाया है। निःसंदेह कुछ चैनल-पत्रकार पत्रकारिता के उच्च नैतिक मानदंडों एवं मर्यादाओं का उल्लंघन करते रहे हैं। जनसंचार के सबसे सशक्त माध्यम से जुड़े होने के कारण उन्हें जो सेलेब्रिटी हैसियत मिलती है, उसे वे सहेज-संभालकर नहीं रख पाते और कई बार सीमाओं का अतिक्रमण कर जाते हैं।
स्वतंत्रता-पूर्व से लेकर स्वातन्त्रयोत्तर काल तक भारतवर्ष में पत्रकारिता की बड़ी समृद्ध विरासत एवं परंपरा रही है। उच्च नैतिक मर्यादाओं एवं नियम-अनुशासन का पालन करते हुए भी पत्रकारिता जगत ने जब-जब आवश्यकता पड़ी, लोकतंत्र एवं लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। सत्य पर पहरे बिठाने की निरंकुश सत्ता द्वारा जब-जब कोशिशें हुईं, मीडिया ने उसे नाकाम करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आपातकाल के काले दौर में तमाम प्रताड़नाएं झेलकर भी उसने अपनी स्वतंत्र एवं निर्भीक आवाज़ को कमज़ोर नहीं पड़ने दिया। लोकतंत्र को बंधक बनाने का वह प्रयास विफल ही मीडिया के सहयोग के बल पर हुआ। पत्रकारिता के गिरते स्तर पर बढ़-चढ़कर बातें करते हुए हमें मीडिया की इन उपलब्धियों और योगदान को कभी नहीं भुलाना चाहिए|
अर्णब का दोष केवल इतना है कि, जो संबंध परदे के पीछे निभाए जाते रहे, उसे अर्णब ने बिना किसी लाग-लपेट के परदे के सामने ला भर दिया। उन्होंने आम लोगों की भाषा में जनभावनाओं को बेबाक़ी से स्वर दे दिया। जिसे समर्थकों ने राष्ट्रीय तो विरोधियों ने एजेंडा आधारित पत्रकारिता का नाम दिया। पर सवाल यह है कि केवल अर्णब ही सत्ता के आसान शिकार और कोपभाजन क्यों ?
महाराष्ट्र पुलिस-प्रशासन ने जिस प्रकार अर्णब गोस्वामी को एक पुराने एवं लगभग बंद पड़े मामले में जिस तरह से आनन-फ़ानन में गिरफ़्तार किया, वह उसकी मंशा एवं कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। पुराने मामले में किसी को ख़ुदकुशी के लिए उकसाने के आरोप में अर्णब को गिरफ्तार करने की महाराष्ट्र सरकार एवं मुंबई पुलिस की नीयत जनता ख़ूब समझती है।
पुलिस इस केस की क्लोजर रिपोर्ट भी दाख़िल कर चुकी है। अब अचानक पुलिस को ऐसा कौन-सा सबूत मिल गया कि वह अर्णब को गिरफ़्तार करने पहुँच गई। और वह भी इतने बड़े लाव-लश्कर, एनकाउंटर स्पेशलिस्ट और हथियारों से लैस! कमाल की बात यह कि उसने कोर्ट से अर्णब को पुलिस रिमांड में रखने की इजाज़त भी मांगी।
ज्ञात हो कि अर्णब गोस्वामी का कोई आपराधिक अतीत नहीं है। न वे कोई सजायाफ्ता मुज़रिम या आतंकी हैं। बल्कि वे मुख्य धारा के बड़े पत्रकार हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अपने चैनल पर विभिन्न मुददृों पर प्रश्न पूछा जाना इन महत्वाकांक्षी, वंशवादी नेताओं को नागवार गुजरा है ? क्या सत्ता के अहंकार के कारण वे अर्णब को घेरने और उनकी आवाज उठाने—दबाने की कोशिश कर रहे हैं ?
यदि अर्णब ने कुछ ग़लत भी किया है तो न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत पारदर्शी तरीके से कार्रवाई होनी चाहिए, न कि जोर-जबरदस्ती से ? यदि निष्पक्षता पत्रकारिता का धर्म है तो कार्यपालिका एवं सरकार का तो यह परम धर्म होना चाहिए। उसे तो अपनी नीतियों एवं निर्णयों के प्रति विशेष सतर्क एवं सजग रहना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर स्वविवेक का नियंत्रण तो ठीक है, परंतु उस पर सरकारी पहरे बिठाना, उसे डरा-धमकाकर चुप कराना संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है। जब देश ने आपातकाल थोपने वालों को जड़-मूल समेत उखाड़ फेंका तो वंशवादी बेलें क्या बला हैं ? जो इस मौके पर चुप हैं, समय उनके भी अपराध लिख रहा है। आज अर्णब की तो कल हमारी या किसी और की बारी है|