ट्रम्प की हार क़रीब-क़रीब तय, विरासत की छाप कई दशक रहेगी!

    दिनांक 06-नवंबर-2020
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ललित मोहन बंसल, वाशिंगटन से
एक बिज़नेसमैन रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (74) व्हाइट हाउस बेटिंग की दूसरी पारी में अंतत: गुगली पर मात खा गए। इसके बावजूद उनका रुआब, उनकी विरासत कुछ दशकों तक भारत सहित दुनिया भर के लोगों के दिलों-दिमाग़ पर रहेगी

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एक रियलिटी शो के ‘महानायक’ ट्रम्प के बारे में क्या किसी ने सोचा होगा, राजनीति की बिसात पर यह नौसिखिया ‘बल्लेबाज़’ दूसरी पारी में दो टर्म के डेमोक्रेट उपराष्ट्रपति, 47 वर्षों की राजनीति के हर दांव-पेच में माहिर 78 वर्षीय जोई बाइडन टक्कर ले पाएगा? दो दिन पूर्व 03 नवंबर को हुए ‘अंतिम’ चुनाव मतदान के नतीजों पर निगाह दौड़ाएं तो ध्वनि यही सुनने को मिलती है, ‘’वाह, उस्ताद वाह। पारी ख़ूब खेली!’’ चुनाव के अंतिम पड़ाव में कोरोना संक्रमण से उबरने के बाद आख़िरी दो सप्ताह में ट्रम्प ने जिस तरह कांटे की टक्कर वाले सात-आठ राज्यों को रिपब्लिकन के रंग में लाल करने की कोशिश की और अंतिम क्षणों तक एक-एक मत के लिए कोशिश करते हुए अमेरिका के पच्चास राज्यों (26-23) में प्रभावशाली प्रदर्शन किया, वह चिरस्मरणीय रहेगा।
कांटे की टक्कर वाले राज्यों में शह-मात का अजूबा खेल?: प्रेज़िडेंशियल सिस्टम की मौजूदा ख़ामियों के बावजूद डोनाल्ड ट्रम्प 538 सदस्यीय निर्वाचक मंडल के चुनाव परिणामों में बुद्धवार देर रात तक कांटे की टक्कर वाले सात राज्यों में ‘शह-मात’ का खेल जारी रहा। इस पर ट्रम्प ने पहले दिन ही अपनी जीत की घोषणा करते हुए वकीलों की एक फौज तैनात करने की घोषणा कर डाली। उन्होंने इन राज्यों में पिछड़ने के बाद व्हाइट हाउस में तीव्र प्रतिक्रिया कर डाली, ‘वह शुरू में इन राज्यों में जीत रहे थे, तो अब क्यों पिछड़ रहे हैं? हालांकि चौबीस घंटों बाद डोनाल्ड ट्रम्प का नतीजों में पिछड़ना (253-214) जारी है। अभी दो बड़े राज्यों पेंसेलवेनिया (20) और जार्जिया में शेष कुछ प्रतिशत मतों की गिनती जारी है, जबकि तीन राज्यों- मिशिगन, जार्जिया और विसकोनसिन में पोस्टल और प्रारंभिक मतों के देरी से हुए भुगतान में कथित धांधली के आरोप लगाते हुए राष्ट्रपति ट्रम्प इन राज्यों की संघीय अदालतों में मुक़दमें दायर करवा चुके हैं। ट्रम्प ने पिछले चुनाव में इन तीनों राज्यों में जीत पाई थी। इस बार भी ट्रम्प क़रीब डेढ़ लाख से अधिक लोकप्रिय मतों से पीछे हैं, हालांकि मौजूदा सिस्टम में इन लोकप्रिय मतों में जीत-हार का कोई औचित्य नहीं है। व्हाइट हाउस में सत्तारूढ़ होते हुए ट्रम्प की पिछले 28 वर्षों में यह पहली पराजय होगी। इससे पहले जार्ज एच डब्ल्यू बुश (1992), ज़िम्मी कार्टर (1980), जे॰फ़ोर्ड (1976) और हरबर्ट हूपर (1932) में एक टर्म के राष्ट्रपति रहे हैं।
प्रवासी भारतीय ट्रम्प नहीं, बाइडन के साथ?
अमेरिका में एक प्रतिशत अर्थात 42 लाख प्रवासी भारतीय मतदाताओं में इस बार क़रीब अठारह लाख मतदाताओं में 60 से 65 मतदाताओं ने रिपब्लिकन उम्मीदवारों की तुलना में डेमोक्रेट उम्मीदवारों पर भरोसा किया। इसके फलस्वरूप कैलिफ़ोर्निया में उदारवादी डाक्टर एमी बेरा, आर ओ खन्ना, इलिनोईस में राजा कृष्णमूर्ति, सिएटल- वाशिंगटन से प्रमिला जायपाल एक बार फिर कांग्रेस के निचले सदन ‘प्रतिनिधि सभा’ के लिए निर्वाचित हो गए। इनके अलावा रिपब्लिकन पार्टी की ओर से प्रमुख पदों पर प्रवासी भारतीय चुनाव मैदान में खड़े हुए, परास्त हो गए, हालांकि प्रवासी भारतीय बहुल न्यू जर्सी में रिपब्लिकन प्रत्याशी रिक मेहता ने सिनेटर के पद पर क़रीब डेढ़ लाख मत अर्जित किए, पर वह एक दमदार अश्वेत डेमोक्रेट कोरी बूकर से हार गए। इस पर एक ‘राष्ट्रवादी’ प्रवासी भारतीय ने टिप्पणी की कि प्रवासी भारतीय दिग्भ्रमित हैं, उन्हें भारत नहीं, अमेरिका की चकाचौंध लुभाती है। यही स्थिति ‘कांटे की टक्कर’ के सात राज्यों- फ़्लोरिडा, नार्थ कैरोलाइना, मिशिगन, पेंसेलवेनिया, जार्जिया, अरिज़ोना और विसकोनसिन में बसे प्रवासी भारतीय मतदाताओं की भी रही। इन राज्यों में बसे प्रवासी भारतीयों में से ज़्यादातर ने ट्रम्प की बाजाए जोई-बाइडन-कमला हैरिस को वोट देना ज़्यादा उचित समझा। इस कार्य में तमिल और तेलुगु समाज ने बढ़ चढ़ कर डेमोक्रेट का तन, मन, धन से साथ दिया।
मुद्दे क्या रहे ?
ट्विटर की दुनिया में बेताज बादशाह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ( 8 करोड़ 80 लाख) के 93 प्रतिशत परंपरावादी और इवेंजिलिस्ट रिपब्लिकन समर्थकों के बावजूद इस चुनाव में संभावित पराजय का कोई एक मूल कारण ढूंढा जाए तो वह कोरोना महामारी होगा। जोई बाइडन और पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा, बिल क्लिंटन, मिशेल ओबामा और हिलरी क्लिंटन सहित अनेक डेमोक्रेट ने टीवी डिबेट हो या कोई छोटी-बड़ी जनसभा में ‘उदारवादी’ मीडिया में कोरोना महामारी को एक बड़ा मुद्दा बनाए रखा। यहीं नहीं, इस महामारी में दो लाख तीस हज़ार अमेरिकी नागरिकों की मौत के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को ज़िम्मेदार ठहराया गया। यह बार-बार कहा गया कि राष्ट्रपति ट्रम्प के पास इस महामारी से बचाव के लिए कोई योजना नहीं है, हालांकि वह भी कोरोना वैक्सीन के अलावा कोई स्पष्ट योजना नहीं दे पाए? यों बड़े शहरों- न्यू यॉर्क, शिकागो, लॉस एंजेल्स, सिएटल, सान फ़्रांसिस्को, ह्युस्टन और डलस आदि में नस्लीय भेदभाव को लेकर पांच महीनों तक ‘ब्लैक लाइव मैटर’ आंदोलन में काले कपड़े पहने ‘एंटीफा’ और मानवाधिकारी कूद पड़े। इनमें अश्वेत-अफ़्रो-अमेरिकन का साथ देने लेटिनो, एशियन और उदारवादी शहरी श्वेत अमेरिकी भी पीछे नहीं रहे। ग्रामीण अंचलों में श्वेत वर्ण के अमेरिकी मतदाताओं, ख़ासतौर पर महिलाओं ने ट्रम्प का साथ दिया।
अब देखना इतना भर है कि जोई बाइडन राष्ट्रपति बनते हैं और अगली 20 जनवरी को सत्तारूढ़ होते हैं तो उनकी विदेश नीति में चीन और पाकिस्तान के साथ क्या रवैया रहता है? यह कहा जा रहा है कि व्हाइट हाउस में कोई भी पार्टी का नेता सत्तारूढ़ हो, वह ‘भू राजनैतिक’ दृष्टि से आज के नए भारत को नज़रंदाज नहीं कर सकता। जोई बाइडन ने अभी तक के ताज़ा वक्तव्यों में चीन की धौंसपट्टी पर अंकुश रखने के संकेत तो दिए हैं, लेकिन कश्मीर और सी ए ए जैसे ज्वलंत मुद्दों पर ताज़ा टिप्पणी करने से परहेज़ किया है। वह नाटो देशों से मेलमिलाप बढ़ाने, ईरान और फ़िलिस्तीन से संबंध सुधारने और अफ़्रो-एशियन मुस्लिम देशों के साथ रिश्ते बढ़ाने की बातें ज़रूर कर रहे हैं।