पत्रकारिता के जहरीले और घोटालेबाज बहरूपिए

    दिनांक 09-नवंबर-2020   
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ऐसे पत्रकार जो अर्नब की गिरफ्तारी के बाद बोल रहे हैं कि भाजपा शासित राज्यों में भी पत्रकारों के खिलाफ रिपोर्ट लिखी गईं हैं, वे असल में वे हैं जिनकी कलम हिंदुओं के खिलाफ चलती है और देश विरोधी एजेंडा चलाना जिनका शगल है

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रिपब्लिक टीवी एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी, यातनाओं के बीच में कांग्रेस और वामपंथी गिरोह के पत्रकार कई नजीरें गिनाते हैं. कहते हैं कि भाजपा शासित राज्यों में भी तो पत्रकारों के खिलाफ रिपोर्ट लिखी गईं, गिरफ्तारियां हुईं. लेकिन क्या आप जानते हैं, जिन नामों की ये दलीलें दे रहे हैं, वे असल में और कुछ नहीं, इस गिरोह के एजेंडा पर देश, समाज को बांटने की कोशिश करने वाले लोग हैं, जो पत्रकारों के भेस में छिपे हैं.
इनकी तीन श्रेणियां हैं. एक वे जो पत्रकार कम, अफवाहबाज ज्यादा हैं. जिनके पास तथ्य नहीं, फर्जी खबरें हैं और फिर उनका पर्दाफाश हो जाने के बाद वे अंजाम भुगत रहे हैं. दूसरी श्रेणी में वे हैं, जिन्होंने कांग्रेस की गोदी में बैठकर घी पिया है, लेकिन अब जब पाप खुल रहे हैं, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देते हैं. तीसरी श्रेणी देशद्रोहियों और अखबारों को ही निगल जाने वालों की हैं. कमाल की बात है न. इन गंभीर आरोपों से घिरे पत्रकार अभिव्यक्ति के अलंबरदार हैं और सीधे-सापट तौर पर सच बोलने वाला गुनहगार.
'द वायर' ( 'The Wire' ) नाम की एक कुख्यात वामपंथी वेबसाइट है. इसका जन्म, अस्तित्व इसीलिए है कि ये हिंदू विरोध करे. वामपंथी एजेंडा को आगे बढ़ाए और राष्ट्रीय हित में काम करने वालों के खिलाफ झूठ फैलाए. इसी के संपादक हैं सिद्धार्थ वरदराजन. कांग्रेस राज में मैडम गिरोह का आंखों का तारा रहे वरदराजन अर्ध बेरोजगार हैं. सिद्धार्थ वरदराजन पर बुधवार 1 अप्रैल को एफआईआर दर्ज की गई. उनके खिलाफ अयोध्या कोतवाली में धारा 188 और 505 (2) के तहत केस दर्ज किया गया. वरदराजन उस समय तबलीगी जमात द्वारा कोरोना के प्रसार जैसी गंभीर घटना को किसी भी तरह जायज ठहराने की असंभव मुहिम पर आकाओं द्वारा लगाए गए थे. इसी जोश में उन्होंने सीएम योगी पर झूठी टिप्पणी करते हुए कहा था, '' जिस दिन तब्लीगी जमात का आयोजन हुआ था, उस दिन योगी आदित्यनाथ ने जोर देकर कहा था कि 25 मार्च से 2 अप्रैल तक रामनवमी के अवसर पर अयोध्या में आयोजित होने वाला एक बड़ा मेला हमेशा की तरह आयोजित होगा.'' योगी के मीडिया सलाहकार मृत्युंजय कुमार ने उन्हें आगाह भी किया था. वरदराजन गुमान में थे कि मैं हमेशा की तरह झूठ बोलता रहूंगा और उस पर कायम रहूंगा. आखिरकार उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ. अपनी तरफ से एक मुख्यमंत्री का मनगढ़ंत बयान बना देना क्या जेल जाने के लिए पर्याप्त नहीं है. इनकी हिम्मत पर गौर कीजिए.
एक विचित्र किस्म का अखबार है टेलीग्राफ. प्रयोगधर्मिता, जुमले बनाने और सरकार पर हमले की अपनी जिद में यह किस हद तक गुस्ताख हो चुका है. इसने देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नाम को कोविड में तब्दील कर देने की हरकत की. देश के प्रथम नागरिक के लिए ऐसे अलफाज. और आप बात करते हैं कि अर्नब के सवाल पूछने के तरीके पर. अर्नब ने तो सोनिया गांधी का असली नाम एंतोनियो माइनो ही तो लिया था. कोविंद का कोविड नामकरण तो नहीं कर दिया था.
एक और टुकड़े गैंग का पत्रकार है प्रशांत कनौजिया. पत्रकारिता के क्षेत्र में तो खैर इसने क्या तीर चलाए, सबको पता है. लेकिन इसका कुल खेल विवादित और आपत्तिजनक ट्वीट करके सुर्खियों में बने रहना है. ये आदतन झूठे व्यक्ति हैं. इनके झूठ हर बार खुले हैं. पहले इसने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर खासा विवादित और आपत्तिजनक ट्वीट किया. इस ट्वीट के विषय में बस इतना बता देना काफी होगा कि गोरक्ष पीठाधीश्वर पर यह टिप्पणी बेहद अपमानजनक थी. पुलिस ने इस मामले में गिरफ्तार किया. सुप्रीम कोर्ट तक मामला गया. सुप्रीम कोर्ट इस शर्त पर जमानत दी थी कि वह आगे इस किस्म के ट्वीट या सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों पर ऐसे किसी संदेश को प्रसारित नहीं करेगा. लेकिन कनौजिया तो आदतन झूठा और टुकड़े गैंग का सदस्य है. राम मंदिर के विषय में अगस्त 2020 में उसने फिर फन उठाया. ट्वीट किया कि राम मंदिर में शूद्रों, दलितों और पिछड़ों को प्रवेश की आजादी नहीं होगी. जाहिर है, ये समाज को तोड़ने की साजिश थी. गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करके प्रशांत कन्नौजिया को फिर गिरफ्तार किया गया. प्रशांत कनौजिया असल में सिद्धार्थ वरदराजन जैसे पत्रकारों का घटिया संस्करण है.
अब बात करते हैं आउटलुक की पत्रकार नेहा दीक्षित की. यह टुकड़े गैंग की सुपर स्टार पत्रकार है. घनघोर वामपंथी नेहा दीक्षित की कलम सिर्फ हिंदुओं, हिंदु हितों, हिंदुओं के लिए संघर्षरत संगठनों और हिंदूवादी सरकारों के खिलाफ चलती है. 4 अगस्त 2016 को गुवाहाटी हाईकोर्ट में भारत सरकार के असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एस.सी. गोयल और भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता बिजोन रॉय ने आउटलुक प्रकाशक इंद्रनील राय, सपादक कृष्णा प्रसाद और नेहा दीक्षित के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराया. 29 जुलाई को नेहा दीक्षित ने एक तथाकथित इनवेस्टिगेशन रिपोर्ट प्रकाशित की. स्वयं ही एक स्वयंभू किस्म की तफ्तीश करके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुषांगिक संगठन पर असम से 31 आदिवासी लड़कियों की तस्करी जैसा गंभीर आरोप जड़ दिया. इतना ही नहीं, पूरी खबर हिंदू बोड़ो समुदाय को भड़काने वाले अंदाज और मनमाफिक तथ्यों के साथ परोसी गई. नेहा दीक्षित उस गैंग की सक्रिय सदस्य हैं, जिसका एजेंडा ही हिंदू विरोधी है. उनकी हर खबर से हिंदू घृणा टपकती है. आप जानते ही हैं कि ऐसे एजेंडाबाज पत्रकारों को इस देश के लिबरल्स, तथाकथित बुद्धिजीवी और वामपंथी पत्रकारों के गैंग का किस किस्म का प्रश्रय हासिल होता है. ऐसी ही विचारधारा के तमाम स्वयंभू किस्म के पुरस्कारों की घोषणा भी नेहा दीक्षित पर समय-समय पर होती रहती है. बहरहाल इस मामले में साफ हुआ कि कैसे नेहा दीक्षित जैसे पत्रकार अपनी मर्जी के रिपोर्ट बना लेते हैं. उसे इवेस्टिगेशन का मुलम्मा चढ़ा देते हैं. हाई कोर्ट में नेहा दीक्षित अपनी एकतरफा रची गई रिपोर्टों के अलावा कोई साक्ष्य पेश न कर पाईं. खासी फटकार भी लगी. लेकिन ये कहां सुधरने वाले. समाज में घृणा फैलाने वाली गंभीर आपराधिक धाराओं के मुकदमे में आरोपित नेहा दीक्षित को कैसे आप अरनब गोस्वामी जैसे वरिष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में रख सकते हैं. तो भी नेहा दीक्षित पर कार्रवाई के समय आज जो होठ सिए बैठे हैं, उन्होंने बहुतेरा हो-हल्ला मचाया.
आर्थिक अपराधों की यूनिवर्सिटी एनडीटीवी
इस देश के एक राज्य की सरकार एक चैनल के एक हजार से ज्यादा कर्मचारियों पर एफआईआर कर देती है. एडिटर इन चीफ को गिरफ्तार कर लेती है. चैनल के सीएफओ से लेकर तमाम वरिष्ठ अफसरों से एक फर्जी मामले पर पूछताछ करने लगती है. लेकिन जब आर्थिक अपराधों की यूनिवर्सिटी एनडीटीवी और इसके चांसलर प्रणव राय की बात आती है, लुटियन मीडिया में हंगामा मच जाता है. छाती पीटने लगते हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का शोर मचाते हैं. ऐसे ही अपराध करके विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे घोटालेबाज देश छोड़कर भाग खड़े हुए. लेकिन ये चैनल भी चलता है, प्रणय राय और रवीश पांडेय मिलकर देश को बताते हैं कि क्या गलत है और क्या सही.
एनडीटीवी कभी समाचार संस्थान था ही नहीं. बात शुरू होती है 20 जनवरी 1998 से. आईपीसी की गंभीर धाराओं के तहत सीबीआई ने एनडीटीवी के मैनेजिंग एडिटर प्रणव राय, दूरद्रशन के पूर्व महानिदेशक आर. बासु और दूरदर्शन के पांच अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की. प्रणव राय ने ने दूरदर्शन को 13 करोड़ रुपये का फटका लगाया. ये तो बस शुरुआत थी. 2010 में ओपन मैगजीन ने सनसनीखेज खुलासा किया. इसमें पावर ब्रोकर नीरा राडिया कई वरिष्ठ पत्रकारों, नेताओं, कारपोरेट घरानों के मुखियाओं से कथित तौर पर बातचीत का ब्योरा था. सीबीआई ने बताया कि राडिया के टेप से जुड़ी 5851 रिकार्डिंग उसके पास हैं. इसी में सेक्यूलर खेमे की झंडाबरदार और एनडीटीवी की स्टार पत्रकार बरखा दत्त तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा के साथ साठ-गांठ की बात सामने आई. टूजी घोटाले से जुड़े इस मामले से सीधे जुड़ाव के बावजूद बरखा दत्त 2017 तक चैनल में बनी रही. आज भी माइक कैमरा उठाकर घूमती हैं. और इस कथित लिबरल और वामपंथी गिरोह की आवाज तक नहीं निकलती.
प्रणव राय पत्रकार के चोले में छिपे ऐसे शख्स हैं, जिसने टैक्स, फेमा, कारपोरेट कानूनों के साथ खुलकर खिलवाड़ किया है. द संडे गार्डियन ने इस बात का खुलासा किया कि किस प्रकार आईसीआईसीआई बैंक की चंदा कोचर के साथ मिलकर अपने शेयर को शेल कंपनी के जरिये खरीदने और फिर उन्हें बड़ी रकम पर गिरवी रखने जैसे आपराधिक कृत्य किए. इन शेयरों के खेल में प्रणव राय और उनकी पत्नी ने जो रकम हासिल की, वह खुद को ही कर्ज के रूप में दे दी. 19 नवंबर 2015 को ईडी ने फेमा के उल्लंघन में एनडीटीवी को 20.3 अरब रुपये का नोटिस दिया. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के इस निष्कर्ष भी अपील प्राधिकरण ने मोहर लगा दी कि 2009-10 (यूपीए कार्यकाल) में एनडीटीवी के प्रमोटरों ने अपनी शैल कंपनियों के जरिये 6.42 अरब रुपये का गोलमाल किया. आयकर विभाग का यह भी कहना है कि एनडीटीवी को यूएस टीवी नेटवर्क से 15 करोड़ डॉलर का जो निवेश हासिल किया, वह भी गैर कानूनी है. इन आरोपों के बीच प्रणव राय हर बार मीडिया की आवाज को दबाने की कोशिशों जैसे जुमले अलापते रहे. कहां एनडीटीवी ने हाथ नहीं मारा. कॉमन वेल्थ घोटाले की रेवड़ियां जिस समय बाटी जा रही थीं, उसमें भी एनडीटीवी के हाथ मलाई लगी. सीडब्लूजी की रिपोर्ट में भी इस पर मुहर लगी. पांच जून 2017 को एक बार सीबीआई ने प्रणव राय और राधिका राय के ठिकानों पर छापे मारे. दोनों पर आरोप है कि इन्होंने आईसीआईसीआई बैंक को 48 करोड़ का चूना लगाया. फिर वही मीडिया की स्वतंत्रता का रोना. असल में कांग्रेस द्वारा पुरस्कृत, प्रोन्नत और कृपा पात्र मीडिया हस्तियां और संस्थान देश को लूटते रहे. लेकिन जब इन पर हाथ डाला गया, तो इन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता के हनन के आड़ में छिपने की कोशिश की.