नियंत्रण में मीडिया मालिक!

    दिनांक 01-दिसंबर-2020
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दिल्ली सरकार को जिन पैसों से महामारी को नियंत्रित करना चाहिए उन्हें वह मीडिया मालिकों को दे रही
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लव जिहाद पर मीडिया फिर से अपना असली रंग दिखा रहा है। ऐसा कोई सप्ताह नहीं बीतता जब कन्वर्जन के लिए किसी हिंदू लड़की की हत्या का समाचार न आए। लेकिन इसे रोकने के लिए जैसे ही कुछ राज्य सरकारों ने कानून बनाने की घोषणा की, मीडिया का एक जाना-पहचाना वर्ग सक्रिय हो गया जबकि धोखे से शादी और जबरन कन्वर्जन और न मानने पर हत्या जैसी जघन्य घटनाओं पर यह मीडिया चुप्पी साध लेता है। ऐसे समाचार या तो छापे नहीं जाते और अगर छप भी जाएं तो यह छिपाते हुए कि आरोपी का नाम और हत्या का कारण क्या है। लव जिहाद को लेकर पूरी सचाई सामने आ चुकी है, लेकिन मीडिया अपनी शुतुरमुर्गी मानसिकता से बाहर आने को तैयार नहीं। ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ और ‘एनडीटीवी’ ऐसे मामलों में सबसे आगे रहते हैं। ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ ने संपादकीय में लिखा, ‘‘लव जिहाद कुछ नहीं होता और भाजपा सरकारें प्रेम पर हमला कर रही हैं।’’ प्रश्न उठता है कि अगर यह प्रेम है तो क्या कारण है कि लगभग हर प्रेम विवाह में कन्वर्जन कराया जा रहा है?
लव जिहाद की अपनी एक पूरी अर्थव्यवस्था है। कई बार मीडिया ही लव जिहाद के ‘रेट कार्ड’ दिखा चुका है। प्रेम के नाम पर चल रहे इस अनैतिक कारोबार का एक लाभार्थी मीडिया भी है। तभी लव जिहाद की सचाई पर पर्दा डालने के लिए झूठ का सहारा भी लिया जाता है। कानपुर में लव जिहाद के 14 आरोपों की एसआईटी जांच में 11 मामलों में आपराधिकता साबित हुई है। लेकिन ‘द हिंदू’ और ‘इंडियन एक्सप्रेस’ समेत कई अखबारों और वेबसाइटों ने छापा कि लव जिहाद के आरोप गलत पाए गए हैं। जबकि एसआईटी की जांच में सिर्फ इन 14 केस में विदेशी पैसे के सबूत न मिलने की बात कही गई है। दो आईएएस की शादी में मीडिया ‘अब्दुल्ला दीवाना’ बन जाता है, लेकिन जब उनका तलाक होता है तो कहा जाता है कि यह उनका निजी मामला है। मीडिया का एक वर्ग ‘मुस्लिम लड़के’ और ‘हिंदू लड़की’ की शादी को ‘समाज के लिए मिसाल’ की तरह दिखाता रहा है। लेकिन जब किसी मुस्लिम लड़की से प्रेम करने पर किसी राहुल राजपूत या अंकित सक्सेना की हत्या कर दी जाती है तो चुप्पी छा जाती है। तनिष्क जैसे विज्ञापन भी लव जिहाद की इसी अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं।
देश में फेक न्यूज की सबसे बड़ी फैक्ट्री बन चुकी समाचार एजेंसी पीटीआई ने 19 नवंबर को खबर दी कि भारतीय सेना पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में घुसकर आतंकी ठिकानों को ध्वस्त कर रही है। इसके आधार पर समाचार चैनलों ने ब्रेकिंग न्यूज चलानी शुरू कर दी। थोड़ी ही देर में सेना का खंडन आ गया कि ऐसी कोई कार्रवाई नहीं हुई है। जिस चतुराई के साथ यह रिपोर्ट लिखी गई थी उससे शक पैदा होता है कि यह सोचा-समझा प्रयास था। हो सकता है, यह किसी संभावित कार्रवाई से पहले पाकिस्तान को सचेत करने के उद्देश्य से रहा हो। नगरोटा में आतंकियों से मुठभेड़ के बाद इस झूठी खबर का समय बहुत कुछ इशारा करता है। ऐसा लगता है कि पीटीआई ने योजनाबद्ध तरीके से शाम को 7 बजे से कुछ पहले इस झूठी रिपोर्ट को जारी किया। कई चैनल और वेबसाइट इसके झांसे में आ गए। इस समाचार एजेंसी से उम्मीद की जाती है कि वह पूरी तरह पुष्टि के बाद ही कोई समाचार जारी करेगी, लेकिन पीटीआई इस नियम का त्याग बहुत पहले ही कर चुकी है। हिंदू मतदाताओं के जातिगत रुझान की गहराई के साथ समीक्षा करने वाला मीडिया बिहार चुनाव के परिणामों से आंख चुरा रहा है। बिहार में 5 सीटों पर ओवैसी की पार्टी की जीत का स्पष्ट संदेश है कि मुसलमान जिस क्षेत्र में बहुसंख्यक हों, वहां वे कांग्रेस और उसके साथी सेकुलर दलों को नहीं, बल्कि ‘मुसलमानों की पार्टी’ को वोट देते हैं। यही वह मानसिकता है जिसके कारण 1947 में देश बंटा था। 
दिल्ली में चाइनीज वायरस का संक्रमण फिर से बढ़ रहा है। बीच में जब यह कम हुआ था तो मीडिया ने इसका पूरा श्रेय दिल्ली सरकार को दे दिया था। अब जब महामारी फिर से अनियंत्रित हो गई है तब कहीं भी राज्य सरकार या मुख्यमंत्री की नीतियों पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं दिखेगा। अस्पतालों में बुरी स्थिति है लेकिन अखबारों और चैनलों ने आंख-कान बंद कर रखे हैं। जो पैसे महामारी के नियंत्रण पर खर्च होने चाहिए थे, उनसे मीडिया मालिकों को नियंत्रित किया जा रहा है।