अब अराजकता की तरफ बढ़ रहा है किसान आन्दोलन

    दिनांक 10-दिसंबर-2020
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अमिय भूषण
आन्दोलनकारियों को यह भी समझना चाहिए की समाधान का रास्ता सियासी जिद्द से होकर नहीं गुजरता है. देश के बहुसंख्यक किसानों के हितों के सवाल पर तर्क और तथ्य से विमुख यह आन्दोलन फिलहाल समाधान के बजाए सियासी टकराव के राह बढ़ता हुआ दिख रहा है

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किसान आन्दोलन अब ज़िद्द और जोर का शोर भर होकर रह गया है. आशंकाओं के आधार पर नए कृषि कानून का दम भर विरोध कर रहे,प्रदर्शनकारियों को मानाने और समझाने की केन्द्र सरकार की आधा दर्जन कोशिश अब तक बेनतीज़ा रही है.विरोध का बिगुल बजाए पंजाब- हरियाणा के कमोबेश तीन दर्जन किसान संगठन जहां शोर और ज़ोर के सहारे तीनों नए कृषि कानून की वापसी चाहते हैं वहीँं किसान कल्याण के संकल्पों को बार बार दोहराने वाली प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार सुलह और समाधान के लिए नए कृषि कानून में संशोधन भर के लिए तैयार है. एक ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील और उनकी सरकार की तमाम किसान हितैषी योजनाओं का पीपीटी प्रजेंटेशन है तो दूसरी ओर हठधर्मिता के साथ दिन प्रतिदिन अराजक होता किसान आन्दोलन. देश के बहुसंख्यक किसानों के हितों के सवाल पर तर्क और तथ्य से विमुख पंजाब और हरियाणा का यह आन्दोलन फिलहाल समाधान के बजाए सियासी टकराव के राह बढ़ता हुआ दिख रहा है. नए कृषि कानून में बिन्दुवार संशोधन को तैयार सरकार के सामने कानून की सम्पूर्ण वापसी का एकमेव शर्त रखा जाना संवाद से समाधान की कोशिश को कमज़ोर कर रहा है. पंजाब और हरियाणा के आन्दोलनकारियों को यह भी समझना चाहिए की समाधान का रास्ता सियासी जिद्द से होकर नहीं गुजरता है. सहमती और संवाद के बजाए संग्राम का रास्ता देश के बहुसंख्यक किसानों को मौजूदा संघर्ष के विरोध में गोलबंद कर सकता है.दिल्ली की घेराबंदी का सिलसिला अगर लंबा खींचता है तो मौजूदा आन्दोलन को लेकर जो एक भावना इस वक़्त तैयार हुई है उसे वेदना और आलोचना में तब्दील होने में ज्यादा वक़्त नहीं लगेगा. नए कृषि कानून का विरोध कर रहे आढ़तियों और ज़मींदारों का सबसे बड़ा मसला एमएसपी और एपीएमसी मंडियों से जुड़ा है ,आन्दोलनकारियों के अनुसार केंद्र की सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य मतलब एमएसपी की व्यवस्था को समाप्त करना चाहती है, साथ ही कृषि उपज बाज़ार समिति यानी एपीएमसी को सरकार कमज़ोर करना चाहती है. जबकि हकीकत इस के ठीक विपरीत है.एमएसपी पर नरेन्द्र मोदी सरकार की नीयत को कुछ आंकड़ों के सहारे बेहतर समझा जा सकता है. वित्त वर्ष 2013 -2014 में जहां गेहूं की एमएसपी 1400 रुपया प्रति क्विंटल थी वहां मौजूदा वित्त वर्ष 2020 -2021 में गेंहू की एमएसपी 1975 रूपये प्रति क्विंटल निर्धारित की गई है.केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर की ओर से जारी किए गए आंकड़े के अनुसार 2014 की तुलना में गेहूं की एमएसपी में 41, धान की एमएसपी में 43, मसूर की एमएसपी में 73, उड़द की एमएसपी में 40, मूंग की एमएसपी में 60, अरहर की एमएसपी में 40, सरसों की एमएसपी में 52, चने की एमएसपी 65 और मूंगफली की एमएसपी 32 प्रतिशत से ज्यादा की अब तक बढ़ोत्तरी की गई है. यही नहीं, 2014 की तुलना में गेहूं और धान की खरीद में भी 73 और 114 प्रतिशत की वृद्धि हुई अगर खरीद की बात करें तो 2014 की तुलना में अब तक गेंहूं की खरीद में 73 और धान की खरीद में 114 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है. एक अन्य आंकड़े के अनुसार लॉकडाउन के दौरान एमएसपी पर कृषि उपज की खरीद के लिए सरकार ने 74,300 करोड़ रुपए खर्च किए हैं. ये आंकड़े बताते हैं कि एमएसपी में बढ़ोतरी के संबंध दिए गए राष्ट्रीय किसान आयोग के पुराने और जरूरी सुझाव को मोदी सरकार ने ज़मीनी तौर पर साकार किया है.एमएसपी को मजबूत करने की दिशा में उठाये गए ठोस कदमों के आधार पर ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार ये कहते रहे हैं कि एमएसपी की व्यवस्था कायम रहेगी.हालांकि एमएसपी की मजबूती से इतर एमएसपी के औचित्य और उपादेयता से जुड़े कई और जरूरी तथ्य भी हैं ,जिन पर चर्चा किए जाना जरूरी है. शांता कुमार की अध्यक्षता में साल 2015 में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के पुनर्गठन पर सुझाव के लिए गठित समिति की मानें तो एमएसपी का लाभ देश के सिर्फ 6 प्रतिशत कुलीन किसानों को ही मिल पाता है. शेष 94 फीसदी बहुसंख्यक किसानों को एमएसपी का फायदा तो दूर कायदा भी नहीं मालूम है . देश के कुल 14.5 करोड़ किसानों में से केवल 87 लाख किसान एमएसपी से लाभान्वित है.शेष 13.63 करोड़ किसान हमेशा से एमएसपी के नफ़ा नुकसान से बाहर है .अब सवाल ये उठता है की एमएसपी पर उठे बवाल में संघर्ष का रास्ता केवल पंजाब और हरियाणा ने ही क्यों चुना है..इस का जवाब भी इन आंकड़ों में ही है. एमएसपी पर खरीदारी का राष्ट्रीय औसत जहां 10 फीसदी है वहीँ पंजाब और हरियाणा में एमएसपी पर खरीदारी का औसत 80 फीसदी और 90 फीसदी है. मतलब बहुत साफ़ है जहां देश के तमाम राज्यों के 90 प्रतिशत कृषि उपज की बिक्री एमएसपी से बहुत नीचे किसी भी कीमत पर खुले बाज़ार में होती है वही पंजाब एवं हरियाणा के अधिकतम कृषि उपज की बिक्री एमएसपी पर होती है.साल 2020 में गेहूं और धान की फसल को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीदे जाने के एवज़ में इन दोनों राज्यों को 80,528 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया है.इतना ही नहीं देश के लगभग 7,000 एपीएमसी मंडियों में से 30 फीसदी से ज्यादा लगभग 2,000 से अधिक एपीएमसी मंडी केवल पंजाब में है.
एपीएमसी मंडी में खरीद बिक्री के दौरान,दोनों ही पक्ष से से पंजीयन शुल्क,और तमाम तरीके के सेश के जरिए जहां राज्य सरकार की आमदनी में इजाफा होता है,
2014-15 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार जिन राज्यों में मंडी टैक्स, लेवी, सरचार्ज और कमीशन सबसे अधिक हैं उनमें पंजाब-हरियाणा, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य टॉप पर हैं. उदाहरण के तौर पर लेवी और सरचार्ज जहां आंध्र प्रदेश में 19 फीसदी, पंजाब में 15 फीसदी हैं वहीं यूपी में 9 और राजस्थान में सिर्फ 3.6 फीसदी ही है. एक अन्य आंकड़े के मुताबिक पंजाब सरकार हर साल मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीदे गए गेहूं और धान से लगभग 3500 करोड़ रुपए हासिल करती है. ये पैसा केंद्र सरकार की ओर से प्रोक्योरमेंट इंसीडेंटल्स के रूप में आता है. वही कमीशन के जरिए आढ़तियों (बिचौलियों ) की भी मोटी आमदनी होती है. केवल पंजाब के भीतर मंडियों से जुड़े 25 हज़ार आढ़तिये,इनका कमीशन फ़िलहाल 6 प्रतिशत है. नए कानून के प्रावधानों के मुताबिक किसान और व्यपारी दोनों ही बिना किसी शुल्क अथवा कमीशन के एपीएमसी मंडी से बाहर देश के किसी भी हिस्से में खुले बाज़ार में अपने उपज की खरीद बिक्री कर सकते हैं..इसी प्रावधान को लेकर पंजाब की सरकार तथा हरियाणा पंजाब के ज़मींदार और आढ़ती अपनी कमाई के कम होने की आशंका से भयभीत होकर नए कृषि कानून का विरोध कर रहे है.
( लेखक कृषि मामलों के जानकार हैं )