अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे विपक्षी दल, इसलिए अब किसानों को भड़का रहे हैं

    दिनांक 10-दिसंबर-2020   
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कथित किसान आंदोलन के पीछे एक ही सोच काम कर रही है और वह है अस्तित्व बचाने की आखिरी लड़ाई. कांग्रेस हो या टीआरएस, सपा हो या द्रमुक या फिर वामपंथी. इन सभी दलों के सामने अब अस्तित्व का संकट है. अस्तित्व बचाने की इस लड़ाई में ये दल कभी सीएए और एनआरसी के मुद्दे पर राष्ट्र विरोधी ताकतों की गोद में बैठ जाते हैं. तो अब ये किसानों को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं.
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22 पार्टियां मिलकर कृषि सुधारों को पलीता लगाने के लिए भारत बंद बुलाती हैं और ये फेल हो जाता है. क्यूं! बहुत से कारण हो सकते हैं. लेकिन इनमें सबसे अहम कारण है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लोगों का विश्वास. आप कितना ही जोर से चिल्ला लें, लेकिन आम भारतीय जनमानस कम से कम इस आरोप पर तो विश्वास नहीं कर सकता कि मोदी गरीबों, किसानों के अहित का कोई फैसला ले सकते हैं. अब इसका मुकाबला कीजिए, भारत बंद करने चली पार्टियों की विश्वसनीयता और ईमानदारी से. जरा तोल कर देखिए. एक तरफ मोदी और दूसरी तरफ चालीस चोर. दिल्ली में चल रहे प्रायोजित धरने-प्रदर्शन के अलावा कहीं विरोध नहीं. और विरोध तो छोड़िए, जरा राजस्थान के पंचायत चुनाव पर ही गौर कर लीजिए. विशुद्ध रूप से किसानों के बीच हुए इस चुनाव में भाजपा को जोरदार सफलता मिली है. ये सफलता कृषि सुधारों पर किसान की मोहर है.

किसानों की मसीहा बनने चली कांग्रेस पार्टी और उसके पिछलग्गू गैंग का ट्रैक रिकॉर्ड किसान के पास है. वही किसान, जो कभी यूरिया के लिए लाठी खाता. फिर ब्लैक में खाद खरीदता था. कांग्रेस के महान अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार को किसान भूला नहीं है. 2004 में जब यूपीए की सरकार बनी, तो अटल बिहारी वाजपेयी ने कृषि क्षेत्र में चार फीसद विकास दर की विरासत दी थी. सन 2014 में जब मनमोहन सिंह की मंडली से देश का पीछा छूटा, तो विकासदर नकारात्मक होकर शून्य से भी नीचे जा चुकी थी. यह कृषि और उस क्षेत्र से जुड़े समूचे वर्ग का सबसे अहम सूचकांक है. किसानों की ये दुर्गति करने में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार का अहम योगदान है. जी हां, वह यूपीए के स्टार कृषि मंत्री थे.

कृषि मंत्री बनने से पहले, मंत्री पद पर रहते हुए और उसके बाद भी आज तक, कृषि उत्पादों के दामों के साथ कैसे खेलना है, इसके पवार महारथी हैं. उनके इशारे पर आज भी एनसीडीएक्स के दामों में उठा-पटक चलती है. मनमोहन सिंह और शरद पवार की जोड़ी कितनी किसान हितैषी थी, जरा इन आंकड़ों पर गौर करें. आधिकारिक आंकड़ा एक लाख सत्तर हजार है. हालांकि उत्तर प्रदेश के कृषि अनुसंधान मंत्री सूर्य प्रताप शाही दावा करते हैं कि यूपीए के शासनकाल में कुल दो लाख 66 हजार किसानों ने आत्महत्या की. यह भी जानकर आपको ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि जिस महाराष्ट्र से शरद पवार आते हैं, वहां आबादी के औसत से किसानों की आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा रही. ये तो है कांग्रेस और उसके पिछलग्गू बनावटी किसान हितैषियों का काला सच.

अब जरा इस बात पर भी गौर कीजिए कि तमाम हाय-तौबा के बावजूद किसान क्यों झांसे में नहीं आ रहा है. 25 जून, 2015 को सरकार द्वारा प्रायोजित दुनिया की सबसे बड़ी आवासीय योजना शुरू हुई. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अभी तक 35 लाख गरीबों को पक्का मकान मिल चुका है. 60 लाख से ज्यादा आवास मंजूर किए जा चुके हैं. कुल मिलाकर एक करोड़ दस लाख लोगों के सिर पर पक्की छत के वादे में आधा काम पूरा हो चुका है. उन घरों में रहने वाला कोई व्यक्ति कैसे इस बात पर विश्वास कर सकता है कि उसे पक्की छत देने वाला शख्स उसकी जमीन छीन लेगा, उसकी उपज अमीरों को दे देगा. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2 अक्टूबर 2014 से अब तक देश में कुल 10,69,00,081 शौचालयों का निर्माण करवाया जा चुका है. जो शख्स आपकी बहु-बेटी को खुले में शौच के लिए जाते नहीं देख सकता, उस पर कितना बेजा लगता है ये इलजाम कि वह किसान के साथ धोखा कर देगा. उज्जवला योजना में अब तक आठ करोड़ से ज्यादा गैस कनेक्शन जारी किए गए हैं. इनके अधिकतर लाभार्थी ग्रामीण इलाकों की महिलाएं हैं. आप जब देखते हैं कि तमाम चुनावी सर्वेक्षण फेल हो जाते हैं और भाजपा जीतती है, तो वह इसी वजह से. सरकार घर की रसोई तक पहुंची है. बीपीएल परिवारों को मुख्य खाद्यान्न दिया जा रहा है. हर गांव तक बिजली पहुंचा देने जैसा असंभव काम हो चुका है.

जब आप ग्रेटर हैदराबाद नगर पालिका में भाजपा का चमत्कारी उदय देखते हैं, तो उसके पीछे वह गहरे तक जमती विश्वास की पूंजी है, जो मोदी सरकार ने बहुत मेहनत से कमाई है. इसी कथित किसान आंदोलन के बीच राजस्थान में पंचायत चुनाव हुए हैं. कांग्रेस ने तो पूरा चुनाव ही इस मुद्दे पर लड़ा. नतीजा, किसानों ने कांग्रेस को नकार दिया. राजस्थान विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभा रही भाजपा 21 में से 14 जिलों में बोर्ड बनाने जा रही है. चुनाव आयोग द्वारा जारी फाइनल रिजल्ट के मुताबिक 636 जिला परिषद के सदस्यों में 353 पर भाजपा और 252 पर कांग्रेस सदस्य विजयी हुए हैं. वहीं पंचायत समिति की 4371 सीटों में से कांग्रेस ने 1799, तो भाजपा ने 1932 सीटें जीती हैं.

इस पूरे आंदोलन के पीछे एक ही सोच काम कर रही है और वह है अस्तित्व बचाने की आखिरी लड़ाई. कांग्रेस हो या टीआरएस, सपा हो या द्रमुक या फिर वामपंथी. इन सभी दलों के सामने अब अस्तित्व का संकट है. अस्तित्व बचाने की इस लड़ाई में ये दल कभी सीएए और एनआरसी के मुद्दे पर राष्ट्र विरोधी ताकतों की गोद में बैठ जाते हैं. तो अब ये किसानों को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन जमाना बदल चुका है. हर गांव, नुक्कड़ तक मोबाइल फोन है और किसान को अपने फायदे व नुकसान को समझने के लिए कम से कम किसी कांग्रेसी नेता से ट्यूशन लेने की जरूरत तो बिल्कुल नहीं है