आकाओं को बचाने के लिए तुरंत आते हैं आगे

    दिनांक 11-दिसंबर-2020
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जब भी अपने आकाओं पर खतरा मंडराते देखते हैं कुछ मीडिया घराने उनके बचाव में कूद पड़ते हैं

Narad_1  H x W:

किसानों के नाम पर चल रहे प्रायोजित आंदोलन की सचाई हर कोई देख और समझ रहा है, लेकिन सेकुलर मीडिया शुतुरमुर्ग की तरह अपना सिर रेत में धंसाए बैठा है। पहले दिन से ही आंदोलन में खालिस्तानी छाप साफ दिखाई दे रही है। कई जगह आतंकवादी भिंडरावाला की फोटो दिखी और खालिस्तान के नारे लगाए गए। जब कुछ चैनलों और अखबारों ने इसे रिपोर्ट किया तो तत्काल एक ‘फतवा’ जारी हो गया कि रिपोर्टिंग में ‘खालिस्तानी’ शब्द का प्रयोग न किया जाए। यह फतवा ‘एडिटर्स गिल्ड’ ने जारी किया, जो खुद को भारत में संपादकों की सर्वोच्च संस्था बताती है। कांग्रेस और वामपंथी दलों द्वारा शासित प्रदेशों में पत्रकारों पर आए दिन हो रहे हमलों पर चुप रहने वाली यह संस्था तभी सक्रिय होती है जब कहीं से उसके राजनीतिक आकाओं पर खतरा दिखाई देता है। खुद को स्वतंत्र बताने वाले तमाम मीडिया संस्थानों ने बिना किसी विरोध के इस विचित्र ‘फतवे’ के आगे सिर भी झुका दिया।

एनडीटीवी ने बताया कि कृषि बिल इसलिए बनाए गए हैं ताकि अंबानी और अडानी सारा अनाज खरीद लें और मनमानी कीमतों पर बेचें। जिस आधार पर यह दावा किया गया वह मनगढ़ंत और फर्जी है, लेकिन पूरी तरह से झूठ पर आधारित इस चैनल को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हालांकि उसने खुद आज तक नहीं बताया कि अंबानी के साथ उसकी किस तरह की कारोबारी लेन-देन है, जिसे लेकर लगातार आरोप लगते रहते हैं। जिस चैनल के संपादकों और अधिकारियों पर भेदिया कारोबार के कारण प्रतिबंध लगा हुआ हो उसका किसानों का हितैषी बनना हास्यास्पद है।

मीडिया का एक बड़ा वर्ग किसान आंदोलन के बहाने हो रही राजनीति को महिमामंडित करने में जुटा है, दूसरी तरफ किसानों की असली समस्याओं पर पर्दा डालने के प्रयास भी जारी हैं। छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति के एक किसान ने आत्महत्या कर ली। उसने सरकारी मंडी में 100 क्विंटल धान बेचा था, लेकिन अधिकारियों ने रजिस्टर पर 11 क्विंटल ही दर्ज किया। उतने का ही उसे भुगतान किया गया। जब देश की राजधानी में तथाकथित किसान आंदोलन चल रहा है, इस समाचार की कहीं भी कोई चर्चा नहीं हुई। अखबारों ने या तो इसे छापा ही नहीं या अंदर के पन्नों में छिपा दिया। कारण यह कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है।
अभिनेत्री कंगना रनौत और पंजाबी एक्टर दिलजीत दोसांझ के बीच किसान आंदोलन को लेकर सोशल मीडिया पर कुछ कहासुनी हुई। दोनों तरफ से जो भाषा प्रयोग की गई उसे सभ्य नहीं कहा जा सकता। लेकिन उसी भाषा से दिलजीत दोसांझ ने ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ का दिल जीत लिया। अखबार ने उनकी तारीफ में लंबा-चौड़ा लेख छापा और बताया, ‘‘दिलजीत ने जिस तरह से कंगना को जवाब दिया उससे उन्होंने पूरे भारत का दिल जीत लिया है।’’

चाइनीज वायरस के टीके को लेकर हलचल तेज है। जब यह महामारी शुरू हुई थी तब से कुछ मीडिया संस्थानों की भूमिका बहुत संदिग्ध रही है। एनडीटीवी और न्यूज18 ने सूत्रों के हवाले से खबर दी कि भारत सरकार ने दो कंपनियों की वैक्सीन के आपातकालीन प्रयोग की अनुमति देने से मना कर दिया है। जैसे ही यह जानकारी सामने आई सरकार ने इसका औपचारिक खंडन किया और बताया कि अभी इस विषय पर कोई निर्णय नहीं हुआ है। इसके बाद भी इस फर्जी खबर को फैलाने की कोशिश चलती रही। यहां तक कि ट्विटर ने बिना सचाई की जांच किए इसे अपनी तरफ से प्रचारित और प्रसारित किया।

 लव जिहाद के खिलाफ कुछ राज्यों में कानून बनाने को लेकर मीडिया के अंदर विचित्र सी बेचैनी देखने को मिल रही है। लगातार हिंदू लड़कियों से धोखाधड़ी और यहां तक कि उनकी हत्या तक के समाचार आ रहे हैं। लेकिन अखबारों के संपादकीय पन्नों पर लव जिहाद के समर्थन में कुतर्कों की भरमार मिल जाएगी। यह समर्थन अकारण नहीं है। जो लोग एक-एक लव जिहादी को 5-5 लाख रु. तक बांट सकते हैं, माना जाना चाहिए कि वे मीडिया को भी अपना समर्थन करने के लिए अच्छी-खासी रकम देने की क्षमता रखते होंगे। दैनिक भास्कर, टाइम्स आॅफ इंडिया और इंडिया टुडे जैसे संस्थान लव जिहाद के महिमामंडन में सबसे आगे हैं। यह जनता का काम है कि वे ऐसे मीडिया संस्थानों पर नजर रखें।