आयुर्वेद को मिला आयुष का आशीष

    दिनांक 14-दिसंबर-2020
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गत दिनों भारत सरकार की संस्था ‘भारतीय चिकित्सा परिषद’ ने आयुर्वेद के स्नातकोत्तर चिकित्सकों को 58 प्रकार की शल्यक्रिया (आॅपरेशन) करने की अनुमति दे दी। पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने इसका खुलकर विरोध किया। आईएमए एलोपैथिक चिकित्सकों का संगठन है। यानी एलौपैथिक के चिकित्सकों को यह पसंद नहीं कि आयुर्वेद के चिकित्सक शल्यक्रिया करें। उनका कहना है कि आयुर्वेद में सर्जरी की स्तरीय पढ़ाई नहीं होती इसलिए वे आॅपरेशन नहीं कर सकते। वहीं आयुर्वेदिक चिकित्सकों का कहना है कि वे भी विधिवत सर्जरी की पढ़ाई करते हैं और कई सरकारी अस्पतालों में आॅपरेशन भी करते हैं। पर व्यक्तिगत स्तर पर वे ऐसा इसलिए नहीं कर पाते थे कि कुछ सरकारी बाध्यताएं थीं। अब सरकार ने उन बाध्यताओं को दूर कर दिया है। इस विशेष आयोजन में पूरे प्रकरण को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है

अगर आयुर्वेद के चिकित्सक सर्जरी करने में सक्षम हैं, तो वे अवश्य करें। इस पर आईएमए और एलोपैथी के चिकित्सकों को हाय-तौबा मचाने की आवश्यकता नहीं है। एलोपैथी ने आयुर्वेद की कई चिकित्सा विधियों को अपनाया है। उदाहरण के लिए आप फिस्टुला को ले सकते हैं। आयुर्वेद के क्षार-सूत्र से इसका इलाज बहुत ही कारगर सिद्ध हो रहा है।
— डॉ. एम.सी. मिश्र,  पूर्व निदेशक, एम्स, दिल्ली



बेमानी है यह बहस

डॉ. सुरेन्द्र चौधरी
गत दिनों एलोपैथिक चिकित्सकों ने इस बात पर कई अस्पतालों में कामकाज ठप कर दिया कि आयुर्वेद के चिकित्सकों को आपरेशन करने की अनुमति क्यों दी गई? इन चिकित्सको बेमतलब की बहस में न पड़कर यह समझना चाहिए कि आयुर्वेद ही वह चिकित्सा पद्धति है, जिसमें सर्जरी हजारों वर्ष से हो रही है
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शल्यक्रिया करते आचार्य सुश्रुत (प्रतीकात्मक चित्र)

आजकल देश में आयुर्वेदिक और एलोपैथिक चिकित्सकों के बीच एक बहस चल रही है। बहस इस बात पर हो रही है कि आयुर्वेद के चिकित्सक सर्जरी कर सकते हैं या नहीं। यह बहस बेमानी लगती है। एलोपैथी के चिकित्सकों को यह समझना चाहिए कि आयुर्वेद में भी सर्जरी की विधिवत पढ़ाई होती है। हां, यह बात अलग है कि आयुर्वेद में वैसी सर्जरी नहीं हो रही है, जिसको गंभीर माना जाता है। ऐसा आयुर्वेद को दबाने के कारण हुआ है, जबकि इसमें असीम संभावनाएं हैं। आयुर्वेद के साधकों ने सरकारी उपेक्षा और कम बजट में ही बहुत कुछ कर दिखाया है। अभी देश के अनेक संस्थानों में आयुर्वेदिक चिकित्सक सर्जरी कर रहे हैं। अब भारत सरकार ने जो अधिसूचना जारी की है उससे निजी तौर भी आयुर्वेदिक चिकित्सक सर्जरी कर सकते हैं। पहले ऐसा नहीं हो पाता था।

उपरोक्त बहस के पीछे बहुत सारे कारण हैं। संसद द्वारा 10 अगस्त, 1971 को ‘भारतीय चिकित्सा परिषद’ की स्थापना की गई। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य आयुर्वेद की चिकित्सा में गुणवत्ता और एकरूपता लाना है। इस परिषद के गठन से पूर्व आयुर्वेद शिक्षा के नियमन के लिए कोई एकरूपता नहीं थी। आयुर्वेद शिक्षा प्रदान करने वाली संस्थाएं अपने मनानुसार पाठ्यक्रम और उपाधि का वितरण कर रही थीं। परिषद ने संपूर्ण भारत में एक ही उपाधि बीएएमएस (आयुर्वेदाचार्य) और एक समान पाठ्यक्रम को लागू करने जैसे महत्वपूर्ण निर्णय लिये जिससे आयुर्वेद की सार्वभौमिक स्वीकार्यता का मार्ग प्रशस्त  हुआ।

ष्टांग आयुर्वेद में शल्यतंत्र प्रमुख हिस्सा है। इसमें छेदन, भेदन, लेखन, एशन, विश्रावन, आहरण और शिवन यानी चीर-फाड़ से लेकर सुई से सिलने तक का विवरण है। यह काम आयुर्वेद के शल्य चिकित्सक कर भी रहे हैं। आईएमए आयुर्वेद के शल्य चिकित्सकों का विरोध अपने एकाधिकार के  खत्म होने के डर से कर रहा है।
-डॉ. सुनील जोशी, कुलपति एवं शल्य चिकित्सक, 
उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय, देहरादून


आयुर्वेद को पहले मुगल और फिर अंग्रेजों ने दबाया। आजादी के बाद सरकारों ने यह काम फर्जी सेकुलरवाद के नाम पर किया। इस कारण आयुर्वेद का चलन कम हो गया, लेकिन आयुर्वेद के वैद्य इतने तपस्वी रहे कि उन्होंने इस विधा को सरकार की बुरी नजरों से बचाए रखा। आज दुनिया के अनेक एलोपैथिक चिकित्सक आयुर्वेद को अपना रहे हैं। वे अपने रोगियों को अंग्रेजी दवाओं के साथ आयुर्वेदिक दवा भी दे रहे हैं, वहीं भारत के एलोपैथी डॉक्टर इसका विरोध कर रहे हैं।  
 -डॉ. नितिन अग्रवाल, राष्टÑीय सचिव, विश्व आयुर्वेद परिषद


बरसों से भारत के विभिन्न आयुर्वेदिक शिक्षण संस्थानों में  मेडिसिन आफ सर्जरी (एम.एस.) की पढ़ाई हो रही है। इसमें  स्त्री रोग, ईएनटी और सामान्य सर्जरी की पढ़ाई कराई जाती है। लेकिन कोई चिकित्सक व्यक्तिगत स्तर पर सर्जरी नहीं कर पाता था। ऐसा इसलिए होता था कि कई राज्य सरकारों ने इसकी अनुमति नहीं दी थी। अब भारत सरकार ने जो अधिसूचना जारी की है वह पूरे देश में लागू होगी और आयुर्वेदिक चिकित्सक सर्जरी कर पाएंगे।
-डॉ. महेश व्यास, डीन (पीएचडी), अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान, नई दिल्ली


परिषद ने सभी आयुर्वेद महाविद्यालयों को विभिन्न विश्वविद्यालयों के साथ संबंद्ध करने जैसा महत्वपूर्ण कदम उठाया। इसके अतिरिक्त अष्टांग आयुर्वेद के सभी विषयों में स्नातकोत्तर एवं पीएचडी पाठ्यक्रम भी आरंभ किए गए। आज भारत में आयुर्वेद के 500 से अधिक शासकीय और निजी क्षेत्र के महाविद्यालय आयुर्वेद की शिक्षा प्रदान कर रहे हैं।
आयुर्वेद में स्नातक करने के लिए नामांकन नीट परीक्षा के माध्यम से होता है और चयनित छात्र पांच वर्षीय पाठ्यक्रम को पूर्ण कर एक वर्ष तक चिकित्सालय में अनिवार्य रूप से चिकित्सा अभ्यास करता है। जो छात्र उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें अखिल भारतीय स्तर की प्रवेश परीक्षा देनी होती है और प्राप्त अंकों के आधार पर शिक्षण संस्थान तथा विषय का आवंटन किया जाता है।

300 से अधिक यंत्रों का प्रयोगआचार्य सुश्रुत ने सुरक्षित, साधारण और अति विशिष्ट शल्यक्रिया का विस्तार से वर्णन किया है। सुश्रुत संहिता में वर्णित 300 से अधिक यंत्रों का आज भी प्रयोग हो रहा है। आज से लगभग 2,500 वर्ष पूर्व प्लास्टिक सर्जरी द्वारा युद्ध में घायल सैनिकों की चिकित्सा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

चिकित्सा विज्ञान की प्रवेश परीक्षा सभी के लिए एक होती है और उच्च अंक प्राप्त छात्र आधुनिक चिकित्सा विज्ञान अर्थात् एमबीबीएस करने चले जाते हैं। परंतु गत कई वर्षों से एक नया रुझान सामने आया है कि एमबीबीएस में सरकारी महाविद्यालयों में प्रवेश न कर पाने वाले अधिकांश छात्र निजी मेडिकल कॉलेज में आर्थिक बाध्यता के कारण प्रवेश नहीं ले पाते और आयुर्वेद के सरकारी संस्थानों में आराम से प्रवेश पा जाते हैं। भारत में एमबीबीएस के लगभग 500 मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें आधे से ज्यादा निजी क्षेत्र में हैं। इनका वार्षिक शुल्क 10- 20,00,000 रु. है। यानी एमबीबीएस पूरा करने वाले हर छात्र को 50,00,000 रु. से लेकर 1,00,00,000 रु. तक देने होते हैं। रहने, खाने और अन्य व्यय इसमें सम्मिलित नहीं हैं। दूसरी ओर आयुर्वेदिक कॉलेजों का वार्षिक शुल्क 2-3,00,000 रु. तक होता है। आर्थिक भार के कारण मध्यम वर्ग के छात्र एलोपैथी के निजी मेडिकल कॉलेजों में न जाकर आयुर्वेद की ओर रुख कर रहे हैं। इसका एक सकारात्मक पहलू यह है कि अब आयुर्वेद में आने वाले छात्रों को द्वितीय स्तर का छात्र नहीं कह सकते। 

वर्तमान समय में सफल और सुरक्षित शल्य चिकित्सा के लिए नियम निर्धारित करने वाले विलियम स्टीवर्ट हालस्टेड के सात नियमों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो समझ आएगा कि ये सिद्धांत आचार्य सुश्रुत के द्वारा निरूपित सिद्धांतों पर ही आधारित दिखाई देते हैं। लेकिन आजकल आयुर्वेदिक चिकित्सकों को ही शल्यक्रिया करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। स्वतंत्र भारत में लंबे समय तक आयुर्वेद की न केवल उपेक्षा की गई, वरन इसे दबाने की भरपूर कोशिश की गई।  कोई भी आपरेशन एक टीम द्वारा किया जाता है। इसमें एक सर्जन के अतिरिक्त रोगी को बेहोश करने वाले चिकित्सक, नर्स, सहायक आदि होते हैं। वर्तमान शल्य चिकित्सा समय के साथ नवाचार को अपनाते हुए अपने चरमोत्कर्ष पर है। इसके लिए सभी शल्य चिकित्सक बधाई के पात्र हैं, लेकिन उनके द्वारा आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सक को समाज के लिए घातक और अल्पशिक्षित कहना कदापि उचित नहीं है। 
 (लेखक विश्व आयुर्वेद परिषद, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष हैं)



बेजोड़ है रस-चिकित्सा

वैद्य बालेन्दु प्रकाश


आयुर्वेद विश्व की सबसे पुरानी चिकित्सा पद्धति है। इसकी एक विधा है रस-चिकित्सा। इसमें कैंसर जैसे अनेक असाध्य रोगों के इलाज की क्षमता है। इन दिनों देश के कई भागों में इस पद्धति से चिकित्सा हो रही है

भारत सरकार चाहती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी सर्जरी करने वाले चिकित्सक बढ़ें, लेकिन इतने एलोपैथिक सर्जन नहीं हैं।  इसलिए सरकार ने आयुर्वेद से एमएस की उपाधि लेने वाले चिकित्सकों को सर्जरी करने की अनुमति दी है। यह कदम आम लोगों के लिए तो अच्छा है ही, साथ ही आयुर्वेद के लिए भी बहुत अच्छा है।
— डॉ. टी.एस. दुधमल, एसोसिएट प्रोफेसर एवं प्रभारी
शल्य तंत्र विभाग, आयुर्वेद शिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान, जामनगर


इन दिनों जब आयुर्वेद और एलोपैथी को लेकर अनेक तरह की बातें की जा रही हैं, तब आयुर्वेद की एक विधा की क्षमता की चर्चा करना जरूरी लगता है। वह विधा है रस-चिकित्सा। यह आयुर्वेद की वह विशिष्ट विधा है, जिसका विकास भारत के स्वर्णिमकाल के दौरान आचार्य नागार्जुन द्वारा तक्षशिला विश्वविद्यालय (अब पाकिस्तान) में किया गया था। रस अर्थात् पारा या पारद, जिसे शिव के पर्याय के रूप में भी जाना जाता है, अपने मूलरूप में शरीर के लिए घातक है। लेकिन हमारे पूर्वजों ने ऐसी विधि अपनाई कि इससे भी औषधि बनने लगी। पारे को सोना, चांदी, लोहा, तांबा, रांगा, सीसा, जस्ता आदि धातुओं के साथ मिलाकर औषधि बनाई जाती है। यह औषधि शरीर को रोगमुक्त और दीर्घायु बनाने में अहम भूमिका निभाती है। रस-चिकित्सा का विकास पहली से पांचवीं शताब्दी तक होता रहा। इसके बाद हमारे यहां बाहरी आक्रमण होने लगे और यह विधा कम होने लगी। उन्हीं दिनों कुछ विद्वानों ने इस विधा को  गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से बचाने का प्रयास किया। यह उनके प्रयासों का ही सुफल है कि यह विधा सैकड़ों साल बाद भी आज हमारे बीच है। उक्त सिद्धांत के आधार पर मेरठ निवासी स्वर्गीय वैद्य चंद्र प्रकाश द्वारा 70 के दशक में एक अभिनव प्रयोग प्रारंभ किया गया। पांच दशक  पूर्व प्रारंभ किया यह कार्य एक मूर्तरूप ले चुका है। अनेक असाध्य रोगों, विशेषकर घातक पैन्क्रियाटाइटिस (अग्नाशयशोथ) रोग की चिकित्सा में इसका विशेष लाभ जगजाहिर है। इसका एक उदाहरण आयुष मंत्रालय के अधीन कार्यरत अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान द्वारा प्रकाशित एक पत्रिका में छपा है। उक्त लेख में क्रॉनिक पैन्क्रियाटाइटिस रोग से पीड़ित एक चौबीस वर्षीय युवक के  बारे में बताया गया है। उस युवक को 2005 के प्रारंभ में दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया था। 2010 तक उसका इलाज चलता रहा। इस दौरान उसे अनेक अन्य अस्पतालों में भी दिखाया गया, लेकिन वह ठीक नहीं हुआ। दिनोंदिन उसकी हालत बिगड़ती जा रही थी। उसका वजन 26 किलो तक कम हो गया था। नवंबर, 2010 से उसका आयुर्वेदिक इलाज शुरू किया गया। केवल डेढ़ साल में वह युवक ठीक हो गया। अब वह सामान्य जिंदगी जी रहा है। इसलिए मन से यह बात हटा दें कि केवल एलोपैथी ही कारगर चिकित्सा पद्धति है। 

आयुर्वेद और एलोपैथी का कमाल
कई वैद्य और डॉक्टर आयुर्वेद और एलोपैथी को मिलाकर कई असाध्य रोगों का कारगर इलाज कर रहे हैं। इन लोगों ने आयुर्वेद के रस शास्त्र और एलोपैथी के ज्ञान का आपस में संबंध स्थापित करके प्रमाणिक एवं प्रभावी चिकित्सा क्रम विकसित किया है। इसके जरिए अक्यूट प्रोमयलओसयटिक लुकईमिया (यह रक्त कैंसर का एक प्रकार है), अग्नाशयशोथ सूजन, माइग्रेन (एक प्रकार का सर दर्द), चाइल्डहुड अस्थमा (श्वास रोग, जो बच्चों में बार-बार होता है) न्यूट्रीशनल अनेमिया (रक्त की कमी) तथा  क्रॉनिक अर्टिकरिया (पित्ती उछलना) का इलाज हो रहा है। इस चिकित्सा पद्धति को विकसित करने में इस लेख के लेखक की भी बड़ी भूमिका है। शोध पर आधारित इस चिकित्सा पद्धति को सरकार ने भी माना है। आज एलोपैथी के जो चिकित्सक आयुर्वेद का विरोध कर रहे हैं, उनसे आग्रह है कि एक बार वे अपने सारे पूर्वाग्रहों को त्यागकर आयुर्वेद के बारे में जानने का प्रयास करें। उम्मीद है कि उनका मन बदल जाएगा।   
 
  (लेखक आयुर्वेद के चिकित्सक हैं)


भारत की देन है शल्य चिकित्सा

वैद्य महेश कुमार गुप्ता

शल्य चिकित्सा भारत की देन है। आचार्य सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा की विधि बहुत ही विस्तार से बताई है। यह अलग बात है कि इसका प्रयोग कम होने से यह विधा कम हो गई, पर आज भी इस विधा से सर्जरी हो रही है


आईएमए ने आयुर्वेदिक चिकित्सकों को सर्जरी करने की अनुमति मिलने का विरोध किया है, यह ठीक नहीं है। आयुर्वेद के चिकित्सक तो बहुत पहले से यह काम सरकारी अस्पतालों में कर रहे हैं।  कुछ नियम ऐसे थे, जिनके कारण कुछ लोग निजी अस्पताल में सर्जरी नहीं कर पाते थे। अब ऐसा नहीं होगा।
— डॉ. पी. हेमंत कुमार, अध्यक्ष, शल्य तंत्र विभाग (स्नातकोत्तर)
राष्टÑीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर (राजस्थान)


आयुर्वेद जीवन का शास्त्र है। आयुर्वेद के प्रणेता भगवान धन्वन्तरि माने जाते हैं। इन्होंने सम्पूर्ण आयुर्वेद जीवन शास्त्र को अष्टांग आयुर्वेद के रूप में उल्लिखित किया है। इसमें शल्य तंत्र (जनरल सर्जरी) को प्रमुख स्थान देकर समाविष्ट किया है। यह शल्य तंत्र ही आधुनिक काल की सर्जरी विधा है। भगवान धन्वन्तरि ने अपने सात शिष्यों को शल्य विज्ञान का ज्ञान दिया। इनमें सबसे प्रखर बुद्धि वाले सुश्रुत ने इसको ज्यादा अच्छे से संग्रहीत किया एवं सुश्रुत संहिता का निर्माण किया। इसी कारण से सुश्रुत को ‘शल्य विज्ञान का पितामह’ कहा जाता है। इस तथ्य को आज का आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी मानता है। आयुर्वेद में सर्जरी होती है? यह सवाल हर कोई उठाता है। इसका उत्तर है— हां। प्राचीन काल में आयुर्वेद ही था और इसमें हर बीमारी का इलाज होता था। यह जरूर है कि समय के प्रभाव के कारण आयुर्वेद में सर्जरी कम होने लगी और यह विधि एलोपैथी की तरफ चली गई। आज आधुनिक चिकित्सा पद्धति में सर्जरी बहुत ही उन्नत रूप में है। इसके पीछे विज्ञान और नई तकनीकी है। नित नए अनुसंधान और आविष्कारों ने सर्जरी को बहुत ही आसान बना दिया है। यानी तकनीक ने सर्जरी को आसान बनाया है, न कि एलोपैथिक पद्धति ने। इसलिए इस तकनीक का प्रयोग कर आयुर्वेदिक चिकित्सक भी सर्जरी कर सकते हैं और कर रहे हैं। ऐसा इसलिए हो पाया है कि स्वतंत्र भारत में आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए अनेक शिक्षण संस्थान शुरू हुए। वर्तमान केंद्र सरकार भी आयुर्वेद को बहुत महत्व दे रही है। आयुर्वेद में परिस्थिति के अनुसार चिकित्सा के विविध तरीके उपलब्ध हैं। बालकों में, शस्त्र से डरने वाले लोगों में एवं शस्त्राभाव की स्थिति में शल्य चिकित्सा में अनुशस्त्रों का प्रयोग किया जाता है। क्षार कर्म, अग्निकर्म, रक्तमोक्षण आदि इसके अंतर्गत ही आते हैं।
क्षारकर्म एवं क्षारसूत्र चिकित्सा : शल्य चिकित्सा में क्षार के प्रयोग द्वारा भगन्दर, अर्श, परिकर्तिका, गुदभ्रंश, चर्मकील, घाव  इत्यादि का इलाज किया जाता है। क्षार सूत्र एक औषधियुक्त धागा है। इसका प्रयोग आजकल आयुर्वेद एवं एलोपैथी दोनों पद्धतियों में होता है।
अग्निकर्म : अग्नि का विशिष्ट विधि द्वारा विविध प्रकार के वायु-जन्य रोगों में मात्रावत स्थानिक प्रयोग करना अग्निकर्म है।
रक्तमोक्षण : रक्त के दूषित होने पर रक्तमोक्षण विधि द्वारा चिकित्सा की जाती है। इसमें जोंक द्वारा दूषित रक्त निकाला जाता है। इसके  अनेक प्रकार हैं।
उत्तरबस्ति चिकित्सा : विशिष्ट प्रकार के यंत्रों द्वारा उपयुक्त औषधियों का मूत्रमार्ग से मूत्राशय में प्रवेश कराना उत्तरबस्ति है। इसमें तिल का तेल, शहद, सेंधा नमक, दशमूल क्वाथ औषधि पत्रों का कल्क इत्यादि द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है।
मर्म चिकित्सा : दक्षिण भारत सहित पूरे देश में मर्म चिकित्सा प्रचलित है। मानव शरीर में लगभग 107 मर्म स्थान हैं। इन पर आघात से जान को खतरा हो सकता है। ये मर्म स्थान ऊर्जा का स्थान हैं, जिन्हें चिकित्सकीय दृष्टि से आवश्यकतानुसार उत्प्रेरित करने पर विविध व्याधियों में प्रभावकारी असर दिखाई देते हैं।
ये तो कुछ उदाहरण हैं। आयुर्वेद को इसी तरह बढ़ावा मिलता रहा तो आने वाले समय में दूरदराज के क्षेत्रों में अनेक तरह की स्वास्थ्य समस्याएं समाप्त हो सकती हैं। आयुर्वेद ही इस देश को रोग-मुक्त कर सकता है। इसलिए लोगों को भी आयुर्वेद पर भरोसा रखकर उसे अपनाना चाहिए।
  
(लेखक शल्य तंत्र विशेषज्ञ हैं)



भांग और मानव स्वास्थ्य :
सिक्के के दो पहलू

राहुल महाजन
भांग के पत्ते और बीजों के इस्तेमाल पर भारत के केंद्रीय कानून के मुताबिक प्रतिबंध नहीं है। यही कारण है कि उत्तर और पूर्वी भारत में भांग खुले तौर पर इस्तेमाल की जाती है। इसी तरह से भांग के बीजों की चटनी उत्तराखंड में काफी पसंद की जाती है। कुछ राज्यों में यह सब कानून के खिलाफ नहीं है
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कैनाबिस की पत्तियां जिनसे भांग बनती है
इस आलेख के पीछ यह मंशा बिल्कुल नहीं है कि नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) की तरफ से मुंबई में की जा रही कार्रवाई कानून के खिलाफ है। या इस आलेख के जरिए भांग या इससे निकलने वाले वाले अन्य पदार्थो के सेवन को बढ़ावा देना हमारा मकसद है।

दरअसल इस विषय पर लिखने का तात्कालिक कारण इसी महीने 2 से 4 दिसंबर को नारकोटिक ड्रग्स पर संयुक्त राष्ट्र आयोग के 63वें सत्र में भारत के भांग और उससे निकलने वाले रेजिÞन को 1961 में हुए नशीली दवाओं पर सम्मेलन में तैयार चौथी अनुसूची से बाहर करने के पक्ष में वोट करना और इसके दूरगामी प्रभावों को भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझाना है। इसका मतलब है कि भांग और उससे निकलने वाले रेजिÞन को हीरोइन जैसी खतरनाक नशीली दवाओं की श्रेणी से बाहर करने पर सहमति। साथ ही अब इसे संयुक्त राष्ट्र  में एक दवा का दर्जा हासिल होगा। संयुक्त राष्ट्र के कानून के अनुसार अब केवल भांग के गैर चिकित्सकीय इस्तेमाल को ही प्रतिबंधित माना जाएगा। लेकिन पिछले कुछ समय के घटनाक्रम ऐसे रहे हैं जिनकी रोशनी में भांग और इससे निकलने वाले मादक पदार्थों के सेवन को देखने की जरूरत है।

हाल ही में मुंबई में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने हास्य कलाकार भारती सिंह और उनके पति हर्ष लिम्बाचिया से गांजा (भांग के पौधे की एक नस्ल से ही बना हुआ नशीला पदार्थ) जब्त किया, जिसके बाद दंपती को हिरासत में ले लिया गया। बाद में उन्हं अदालत से जमानत मिल गई। तो आखिर ऐसा क्यों हुआ?

क्या कहता है कानून
गांजा, चरस और भांग तीनों एक ही पौधे को अलग-अलग हिस्सों से बनते हैं। इस पौधे का वैज्ञानिक नाम ‘कैनाबिस’ है। इसी पौधे को मारिजुआना, हेम्प और वीड के नाम से भी जाना
जाता है।
भांग पर नियंत्रण भारत में अंग्रेजी शासन के दौरान शुरू हुआ। ब्रिटिश संसद ने कानून बनाकर भांग, गांजा और चरस के सेहत और मानसिक स्वास्थ्य के नाम पर भारतीयों द्वारा इस्तेमाल करने पर कर लगा दिया। लेकिन अंग्रेजों ने भी इसके इस्तेमाल को अपराध घोषित नहीं किया था।

1985 में पहली बार भांग पर प्रतिबंध लगाया गया। हालांकि कानून में इस प्रतिबंध को जोड़ने से लगभग दो दशक पहले 1961 में भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नारकोटिक ड्रग्स संधि पर हस्ताक्षर कर दिए थे। भारत में कुछ राज्यों में भांग को कानूनी मान्यता है, लेकिन गांजा पूरी तरह से प्रतिबंधित है। भांग से निकलने वाले विभिन्न पदार्थ भारत में स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटांस अधिनियम यानी एनडीपीएस एक्ट)  के तहत प्रतिबंधित हैं। इस कानून को 1985 में बनाया गया और इसमें तीन बार संशोधन हो चुका है। चरस का इस कानून में अलग से उल्लेख किया गया है और इस पर भी सख्त नियंत्रण है। चरस भांग के पौधे से निकलने वाला रेजिÞन है। हशीश या हैश चरस का दूसरा नाम है। भांग या हशीश के तेल को भी नियंत्रित सूची में रखा गया है। एनडीपीएस एक्ट के तहत गांजा, जो कि भांग के फूलों या फल वाले भाग से निकाला जाता है, को भी भांग से निकलने वाले पदार्थ के तौर पर, इस कानून में सूचित किया गया है। यह वह पदार्थ है जिसे आमतौर पर वीड या फिर मारिजुआना कहा जाता है।


भांग और उसके उत्पादों का चिकित्सीय इस्तेमाल
माना जाता है कि शराब, तंबाकू समेत कई तरह के ऐसे अन्य पदार्थों, जो घरों में दवा के डिब्बे में पाए जाते हैं, उनकी तुलना में गांजा और भांग कम नुकसान पहुंचाते हैं। 2014 में ‘बिजनेस इनसाइडर’ में एक लेख छपा था, ‘23 मेडिकल यूजेज आफ मारिजुआना’। इसके मुताबिक-
  •  इसका उपयोग ग्लूकोमा का इलाज करने के लिए किया जा सकता है।
  • यह तंबाकू के कैंसर पैदा करने वाले प्रभावों को रोकने में मददगार साबित हो सकता है।
  • यह एंग्जायटी (घबराहट) को कम करता है।
  • भांग के पौधे में मौजूद टीएचसी अल्जाइमर्स के बढ़ने की गति कम करता है।
भांग के पत्ते और बीजों के इस्तेमाल पर भारत के केंद्रीय कानून के मुताबिक प्रतिबंध नहीं है। यही कारण है कि उत्तर और पूर्वी भारत में भांग खुले तौर पर इस्तेमाल की जाती है, और खासतौर पर होली जैसे त्योहारों के दौरान। इसी तरह से भांग के बीजों की चटनी उत्तराखंड में काफी पसंद की जाती है। ये सब कानून के खिलाफ नहीं है, केवल तब तक जब आप भांग के इस्तेमाल करने को वैध करार देने वाले राज्यों में हैं, क्योंकि कुछ राज्यों में भांग भी अवैध है। मसलन असम में भांग का इस्तेमाल और इसे अपने पास रखना गैरकानूनी है, तो महाराष्ट्र में भांग को उगाना, रखना, इस्तेमाल करना या उससे बने किसी भी पदार्थ का सेवन बगैर लाइसेंस के करना गैर कानूनी है।

भांग के इस्तेमाल की परंपरा
अथर्ववेद में जिन पांच पेड़-पौधों को सबसे पवित्र माना गया है उनमें भांग भी शामिल है। अथर्ववेद इसे ‘प्रसन्नता देने वाले’ और ‘मुक्तिकारक’ वनस्पति का दर्जा देता है। सुश्रुत संहिता के मुताबिक पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने और भूख बढ़ाने में भांग मददगार होती है। आयुर्वेद में भी भांग के पौधे को औषधीय गुणों से भरपूर बताया गया है। आयुर्वेद में इसका इस्तेमाल इतना आम है कि 1894 में गठित भारतीय भांग औषधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इसकी तुलना ‘पेनिसिलीन’ से की थी।

अंग्रेज जब भारत आए तो उन्होंने भांग का इस्तेमाल देखा। तब पश्चिम में यह धारणा थी कि भांग या उसके उत्पाद, जैसे गांजा आदि के सेवन से इनसान पागल हो सकता है। इसकी पुष्टि और भारत में भांग के उपयोग के दस्तावेजीकरण के लिए अंग्रेज सरकार ने भारतीय भांग औषधि आयोग का गठन किया। आयोग को भांग की खेती, इससे नशीली दवाएं तैयार करने की प्रक्रियाएं, इनका कारोबार, इनके इस्तेमाल से पैदा हुए सामाजिक-आर्थिक प्रभाव और इसकी रोकथाम के तौर-तरीकों पर एक रिपोर्ट तैयार करनी थी। आयोग ने पूरे वैज्ञानिक तरीके से एक बड़े आकार के नमूने को आधार बनाकर अपनी रिपोर्ट तैयार की। इसके निष्कर्ष भांग के इस्तेमाल को लेकर बड़े सकारात्मक थे। इसमें कहा गया कि भांग का संयमित सेवन हानिरहित है; शराब भांग से ज्यादा हानिकारक है; और इसलिए भांग पर प्रतिबंध लगाने की कोई वजह नहीं है।

भांग को लेकर मौजूदा स्थिति
भारत में गांजा और भांग के गैरकानूनी होने के चलते इसके लेन-देन में बड़ी संख्या में लगे लोग जेल में कैद हैं। इनके रखरखाव के साथ-साथ धरपकड़ और मुकदमों में पुलिस प्रशासन का बड़ा खर्चा होता है। मादक द्रव्यों के सेवन के विस्तार और स्वरूप पर 2019 में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की तरफ से किए गए एक राष्ट्रीय सर्वे के मुताबिक भारत में लगभग 3 करोड़ लोग भांग का सेवन करते हैं।

विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के मुताबिक 2018 में 81,778 लोगों पर नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटांस अधिनियम (एनडीपीएस एक्ट) के तहत कार्रवाई की गई। इनमें से 59 प्रतिशत मामले निजी इस्तेमाल के थे। इसी अध्ययन में यह भी सामने आया कि मुंबई की जिलाधिकारी अदालत में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटांस अधिनियम (एनडीपीएस एक्ट) के 10,669 मामले आये जिनमें से 99.9 प्रतिशत मामले निजी इस्तेमाल के थे और इनमें से 87 प्रतिशत भांग या उससे निकलने वाले पदार्थों के थे, न कि हीरोइन या स्मैक और कोकेन जैसे खतरनाक नशीले पदार्थों के। 

हाल ही में उत्तराखंड में यमकेश्वर ब्लॉक के युगल नम्रता और गौरव कंडवाल ने भांग की खेती पर केन्द्रित जीपी हेम्प एग्रोवेशन स्टार्टअप शुरू किया है। वे भांग के बीजों और रेशे से दैनिक उपयोग की वस्तुएं तैयार कर रहे हैं। वे औषधियां, साबुन, लुगदी के बैग, पर्स आदि बाजार में उतार चुके हैं। इसकी इजाजत भी सरकार ने दी है। उत्तरप्रदेश और राजस्थान के अलावा कई और राज्यों में भी भांग के ठेकों की नीलामी की जाती है और शराब की तरह ही दुकानों के जरिए सेवन के लिए भांग बेची जाती है। शराब पर प्रतिबंध वाले गुजरात ने 2017 में भांग के इस्तेमाल को कानूनी कर दिया था। ऐसे में सवाल उठता है कि जब देश में कई राज्य सरकारें खुद भांग के ठेकों की नीलामी कर भांग बिकवा रही हैं तो उसके सेवन पर कुछ अन्य राज्यों में रोक क्यों? अगर भारत के संयुक्त राष्ट्र आयोग में दिखे मत को भारत सरकार की सोच माना जाए तो नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटांस अधिनियम (एनडीपीएस एक्ट) में संशोधन की जरूरत है, जिसके अभाव में एनडीपीएस एक्ट ही ऐसा कानून है जिसके उल्लघन पर कानूनी कार्रवाई होनी लाजमी है।     (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)