गेशे जम्पा- सोलहवीं , सत्रहवीं -अठारहवीं -19वीं कड़ी

    दिनांक 14-दिसंबर-2020
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तिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या हमारे भारत देश में है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी।  भारत में रह रहा तिब्बती समुदाय तिब्बत में रह रहे चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। तिब्बत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्न पर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद करता है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव द्वारा लिखा भारत में हिन्दी का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की  सोलहवीं, सत्रहवीं , अठारहवीं - -19वीं कड़ी

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गेशे जम्पा के कक्ष के सामने खड़ी देवयानी मन ही मन सोच रही थी कि कहीं उन्होंने मिलने से मना कर दिया तो कितना अपमान महसूस होगा उसे? चौकीदार ने तो कहा था, मैडम एक बार साहब ने मना कर दिया कि किसी से नहीं मिलना है तो फिर हम कैसे जाकर कह दें कि आप आई हैं!
चौकीदार अपने तर्क में सही था। एक बार देवयानी के मन में आया था कि उल्टे पांव लौट चले। परंतु अगले ही पल उसने पर्स से पेन निकाला और गुलदस्ते के बीच लटक रहे शुभकामना वाले कार्ड पर ‘लोसर की शुभकामनाएं-देवयानी’ लिखकर चौकीदार को पकड़ा दिया।
कक्ष का पर्दा हिला था। लॉन में टहलते हुए एकाएक देवयानी के पांव थम गए। चौकीदार बाहर निकल रहा था। आपको गेला बुला रहे हैं मैडम। चौकीदार ने देवयानी से कहा। देवयानी उसे नजरअंदाज करते हुए भीतर घुसी थी। नमस्कार गेला। उसने जानबूझकर अपनी भाषा में अभिवादन किया। नमस्कार, देवयानी। कैसी हो? ठीक हूं सर। बस, माई से मिलने गई थी। उन्होंने बुलवाया था। कुछ अस्वस्थ हैं वे। मैंने सोचा, आपको मैं लोसर की शुभकामना दे दूं।
गुलाब बहुत सुंदर है। गेशे जम्पा के ओठों पर फूल की तरह हल्की मुस्कुराहट तैर गई थी। जी, आप ही के लॉन से लिया है मैंने। देवयानी ने हल्की-सी झेंप के साथ सफाई दी। चलो, माई के कक्ष से लेकर मुझसे मिलने के बीच तक मेरे प्रति शुभकामना तुम्हारे मस्तिष्क में कौंधती रही होगी, यह मेरे लिए सुख है। किसी भी व्यक्ति के जीवन में इसी तरह के शुभाकांक्षा के क्षण जुड़-जुड़कर सौभाग्यकाल निर्मित करते हैं। गेशे जम्पा ने एक आध्यात्मिक मोड़ दे दिया था बातों को। जी, धन्यवाद मेरी भावनाओं की इतनी सुंदर व्याख्या के लिए। देवयानी धीरे से हंस पड़ी।
इधर आओ, देवयानी। पीछे मुड़ते हुए उन्होंने देवयानी को आदेश दिया। जी? वह कुछ ठिठकी थी। लोसर की शुभकामना देते समय हमारी कुछ प्रथाएं हैं, जिन्हें पूर्ण करना आवश्यक होता है। गेशे जम्पा बताते हुए अपने बड़े से कक्ष के एक कोने की ओर मुड़ रहे थे। देवयानी उनके पीछे-पीछे चल रही थी। एक मेज के ऊपर आयताकार लकड़ी के पात्र में सत्तू जैसी कोई चीज रखी थी। उसी के बीचोंबीच लंबा तीर के आकार का केक खड़ा करके इस तरह रखा गया था जो दूर से भी दिखाई पड़े। सत्तू वाले पात्र के आगे ही छह-सात बहुत छोटे गमलों में गेहूं के हरे पौधे लहरा रहे थे। देवयानी मंत्रमुग्ध-सी सब कुछ देख रही थी।
इसमें से थोड़ा सा छेमर लेकर ऊपर की ओर उछालो। गेशे जम्पा ने चुटकी में सत्तू उठाकर ऊपर आकाश की ओर उछालते हुए बताया। जी। देवयानी ने वैसा ही किया। यह ईश्वर के लिए हमारा समर्पण होता है। गेशे जम्पा बता रहे थे। अच्छा? देवयानी की उत्सुकता बढ़ रही थी। तुम्हें इस मौके पर पढ़ा जाने वाला मंत्र तो याद नहीं होगा। नहीं गेला। पूरा नहीं। बस तीन पंक्तियां-टाशी देलेक फुन्सुम छोक।
एमा पातरो कुड्खम् सड्।
तेनदु देवा थोप-पर शोग।

ये बोलते हुए वह मुस्कुरा उठी। ठीक है, बस थोड़ा-सा उच्चारण शुद्ध करना होगा। सर, बहुत अच्छा लग रहा है यह सब देखकर। कुछ जानना चाहती हूं। उसकी प्रश्नवाचक  दृष्टि गेशे जम्पा के चेहरे पर टिक गई थी।
ये क्या है? उसने गमले में लहरा रहे गेहूं के पौधों की ओर संकेत किया। लो फुद्। लो फुद् कहते हैं इसे। इसके द्वारा हम लोसर पर सभी की समृद्धि की कामना करते हैं। गेशे जम्पा की आवाज में गंभीरता थी। और छेमर में रखी इस चीज को क्या कहते हैं? देवयानी ने सत्तू के बीच रखे लंबे केक की ओर संकेत किया। इसे चेप-टो कहते हैं। यह भी एक प्रतीक है हमारे उल्लास और समर्पण का। यह पात्र, जिसमें देमर रखा है उसको तिब्बती में बो कहते हैं। गेशे जम्पा ने उसकी सभी उत्सुकताओं का एक साथ समाधान कर दिया।
लोसर हर घर में वैसे ही मनाया जाता है जैसे तुम लोगों के यहां होली मनाई जाती है। लोसर पर हर तिब्बती परिवार में खब-से जरूर बनता है और सबको प्रसाद की तरह खिलाया जाता है।
बहुत कुछ हमारे रीति-रिवाजों से मिलता-जुलता है सर। इस बात पर गेशे जम्पा मुसकरा उठे। पिछले तीन-चार वर्षों से हो यहां तुम। कभी लोसर में भाग नहीं लिया? नहीं सर। अपने मठ में ऐसा कोई आयोजन हुआ ही नहीं। ये तो आज मैं अपने मन का निर्णय मानकर यहां न चली आती तो यह सब ज्ञात भी न होता। वह हंसी थी। कभी-कभी मन अच्छा निर्णय भी करता है। गेशे जम्पा ने कॉलबेल दबाते हुए कहा। क्यों? क्या इस बात से इनकार करेंगे आप कि कभी-कभी मन चंचल और अतार्किक इसलिए भी हो उठता है कि हम उसे अपनी जकड़न से मुक्त ही नहीं करना चाहते। देवयानी ने अपना तर्क प्रस्तुत किया। गेशे जम्पा ने आंखें खोल दी थीं और ध्यान से उसका चेहरा देखने लगे। जी गेला? वही चौकीदार आकर खड़ा हो गया था। चाय ले आओ। उन्होंने आदेश दिया था।
यदि तुम्हारा कोई गंतव्य है और घोड़े की सवारी है तो तुम उसे सहज भटकने के लिए कैसे छोड़ सकती हो? अंकुश लगाकर ही उसे मनचाही दिशा में मोड़ा जा सकता है। पर कभी-कभी किसी तरफ मोड़ने के लिए लगाम ढीली भी छोड़नी होती है। देवयानी शुद्ध तार्किक ढंग से अपनी बात रख रही थी। तुमने मेरी ही बात की संपुष्टि कर दी। मन कभी-कभी अच्छा निर्णय ले लेता है। गेशे जम्पा के ओठों पर बच्चों की-सी निर्मल हंसी खिल पड़ी।
तुमने बुद्ध को कितना पढ़ा है? अपनी हंसी पर एकाएक नियंत्रण करते हुए गेशे जम्पा ने बात बदल दी। बस पढ़ाने-भर। उसने बताया। मैं एक पुस्तक दे रहा हूं। बुद्ध के जीवन के बहुत-से अनछुए पहलू हैं इसमें। पढ़कर मुझे अपनी प्रतिक्रिया देना। उन्होंने उठकर अलमारी से वह पुस्तक निकाली थी। चाय आ गई थी।
सर, क्या यह समय की विडंबना नहीं कही जाएगी कि एक तरफ पूरे विश्व में परमाणु अस्त्र-शस्त्र हैं, तमाम संधियों के बनने-बिगड़ने की टकराहट है, युद्ध है और दूसरी ओर बुद्ध हैं, उनकी करुणा है, प्रेम का संदेश है। दोनों, दो छोर। समन्वय या शांति की बातें रेत-महल जैसी नहीं लगतीं? चाय की चुस्की लेते हुए देवयानी ने बात शुरू की।
नहीं देवयानी, आज नहीं तो कल, दुनिया को युद्ध और शांति में से किसी एक को चुनना होगा। हमें पूरी उम्मीद है कि दुनिया शांति की ओर ही झुकेगी। गेशे जम्पा की दृष्टि में एक उम्मीद की आशा थी। लेकिन मैं तो समझती हूं युद्ध और शांति में वही संबंध है जो यथार्थ और कल्पना में है। युद्ध हमारा यथार्थ है जिसे हम अपनी खुली आंखों से आज तक देखते आए हैं और शांति हमारी कल्पना है जिसकी चाहना एक सुंदर पृथ्वी के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।
इसी शांति की चाहना को यथार्थ बनाने के लिए बुद्ध ने करुणा का संदेश दिया। मानव मात्र में जब इसका अभ्युदय हो जाएगा तो शांति यथार्थ बन जाएगी। गेशे जम्पा को देवयानी का तर्क बौद्धिक लगा था। क्या यह संभव है? विवेकशील प्राणी के लिए तो क्षण-भर के लिए सोचा जा सकता है, परंतु क्या संसार में अधिकांश विवेकी हैं? फिर? देवयानी के संक्षिप्त प्रश्न वैश्विक हो उठे थे।
यह प्रश्न गंभीर तो है पर असंभव नहीं। गेशे जम्पा का स्वर आशावादी था। जहां तक मैं समझती हूं सर कि जिसे हम सामान्य रूप में करुणा समझ लेते हैं, अक्सर वह हमारा अहंकार या किसी को उपकृत करने का भाव होता है। एक प्रच्छन्न आकांक्षा होती है कि हमारा यश बढ़ेगा इससे। मेरे विचार से यह करुणा का वास्तविक स्वरूप नहीं है। करुणा समभाव है जो गरीबों पर दया करने वाले भाव से सर्वथा भिन्न है। बिल्कुल सही देवयानी। करुणा में परायेपन का भाव ही नहीं होता। एकत्व की अनुभूति ही करुणा है। बताते हुए गेशे जम्पा की आंखों में एक चमक-सी कौंध रही थी। उन्हें देवयानी का इस तरह तर्क करना अच्छा लग रहा था।
यह तो समभाव के साथ संसार से जुड़ने की भी बात कही जा सकती है सर। लेकिन संसार की वास्तविकता समझने के लिए हमें तटस्थ होना पड़ता है जिसे हम ध्यान की अवस्था कह सकते हैं, जब हम साक्षी भाव से अपने भीतर झांक रहे होते हैं। जीवन क्या है, इसे जानने के लिए हमें तटस्थ होना पड़ता है। जैसे मछली जल के बारे में उतना नहीं जान सकती, क्योंकि उसका संपूर्ण जीवन ही जलमय है, परंतु मेंढक किनारे पर रहकर जान सकता है कि जल क्या है? बुद्ध ने इसी बात पर तो बल दिया। प्रत्येक मनुष्य में अपनी चरम अवस्था प्राप्त करने की योग्यता होती है। इसके लिए उसे स्वयं प्रयास करना पड़ता है। हां, मार्ग बुद्ध ने इंगित किए। अब यह मनुष्य के अपने ऊपर निर्भर करता है कि वह अपने विचारों और कर्मों के द्वारा अपना ध्येय कब तक प्राप्त करता है। गेशे जम्पा बोल रहे थे। यहां तो गीता के कर्मवाद की झलक मिलती है सर। मोक्ष के लिए आत्मज्ञान और कर्मों के फल में निरासक्ति। देवयानी ने कहा।   
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गेशे जम्पा ने देखा, देवयानी के चेहरे पर कहीं कोई कृत्रिमता न थी। सहज ढंग से उसने बात रख दी थी। अधिकारी और अधीनस्थ के भाव की बजाय पृथक देशों के तार्किक पक्ष एक दूसरे के सम्मुख बैठे थे। गेशे जम्पा ने हल्की मुस्कुराहट के बीच कहा-देवयानी, एक झेन कथा  है जो मुझे अच्छी लगती है। रयोकन नाम के एक झेन गुरु हुए थे। वे पर्वत की तलहटी में एक झोंपड़ी बनाकर साधना किया करते थे। एक रात उनके घर में चोर आया, पर झोंपड़ी में कुछ भी चुराकर ले जाने लायक न था। रयोकन ने उसे जाने से रोका और कहा कि, तू इतनी दूर से मुझसे मिलने आया और खाली हाथ वापस जाए, यह ठीक नहीं है। तू मेरे कपड़े भेंट-स्वरूप ले जा।


चोर को आश्चर्य हुआ, परंतु वह कपड़े लेकर चला गया। रयोकन आनंदमग्न बैठे चांद को देखते रहे। फिर धीरे-से बुदबुदाए-‘बेचारा आदमी! मेरा बस चलता तो मैं उसे यह सुंदर चांद दे देता’। पर कुछ ऐसी वस्तुएं होती हैं जिन्हें किसी को दिया नहीं जा सकता। मातृभूमि वैसी ही चीज है। अपनी बात समाप्त कर गेशे जम्पा उठ खड़े हुए। अभी तो सिर्फ यही है मेरे पास देने को। गेशे जम्पा ने पुस्तक देवयानी की ओर बढ़ाई। देवयानी ने कहा-यह मेरे लिए बहुत कीमती होगी सर। चांद की आवश्यकता नहीं। गेशे जम्पा शांत कदमों से बाहर की ओर बढ़े थे। लोसर समारोह से लौटते हुए देवयानी ने बच्चों को माई दोलमा को सौंपा और स्वयं रिक्शे पर बैठ घर की ओर चल पड़ी थी। लेकिन हॉस्टल के वार्डन मिस्टर ग्यासो ने उसे आग्रहपूर्वक रोक लिया। अभी क्यों जा रही हैं देवयानी मैडम? मेरा गाना नहीं सुनेंगी क्या? हां, हां, क्यों नहीं? मुझे तो मालूम ही न था कि आप गाते भी हैं। वह पुन: बैठ गई।

आप भी हिंदी फिल्मी गाने ही गाते हैं? देवयानी ने उत्सुकता से पूछा। हां, हां, तिब्बती फिल्में कितनी बनती हैं जो हम उनके गीत गुनगुनाएं? वैसे भी यहां रहते-रहते हमें हिंदी अच्छी लगने लगी है। देवयानी की दृष्टि पंडाल में चारों ओर निरीक्षण करने लगी। अधिकतर कुर्सियां तिब्बती बच्चों और युवकों से भरी थीं। लड़कियों में कुछ ने ही पारंपरिक तिब्बती पोशाक पहनी थी। मि. ग्यासो एक रोमांटिक हिंदी गीत गा रहे थे मंच से। देवयानी मंत्रमुग्ध-सी सब कुछ देख रही थी।

मि. ग्यासो ने अपना गाना खत्म करते हुए माइक से देवयानी का भी नाम पुकार लिया। देवयानी अचकचा उठी थी। वीडियोग्राफर ने अपने कैमरे का मुंह उसकी ओर घुमा दिया था। मि. ग्यासो मंच से आकर धीरे से देवयानी से बोले-यह आवश्यक है मैडम। देवयानी चौंकी थी। ग्यासो ने बात जारी रखी-यहां की हमारी तिब्बती उच्चाधिकारी समिति, यहां के निदेशक, तिब्बती मंदिर के बड़े लामा, आपके संस्थान के अध्यक्ष गेशे जम्पा जी, सभी लोग जरूरत पड़ने पर देखते हैं रिकार्डिंग। देवयानी के होंठों पर एक मुस्कुराहट बिखर गई थी।

मंच पर पहुंचकर देवयानी ने लोसर की शुभकामनाएं देते हुए एक कविता की चार पंक्तियां गुनगुनाई-
अपनी भू पर पांव टिके हों, हो अपना आकाश खुला बस मेरा मुझको मिल जाए, चाहूं जग से क्या और भला!
चारों तरफ एक मौन-सा छा गया था। सन्नाटा छा गया था चारों ओर कुछ देर के लिए। मेम साहब, दाहिने मुड़ना है या बाएं?

रिक्शावाला पूछ रहा था। देवयानी चैतन्य हो गई। घर आ गया था। एकाएक उसे चिंता हुई थी। यदि दीपेश नहीं रहा होगा घर में तो मां ने यह सब व्यवस्था कैसे की होगी? आ गई देवयानी तू? सूर्यप्रकाश चाचा भीतर वाले कमरे से बाहर आ रहे थे। उनके पीछे दीपेश भी था। अरे चाचा, आप? देवयानी ने झुककर पांव छुए थे उनके। आओ तुम्हारा परिचय करवा दूं। ये हैं हमारे क्षेत्र के विधायक जी। इस समय सत्ता में आपकी तूती बोल रही है। हंसते हुए चाचा ने बिस्तर पर लेटे उस सज्जन से परिचय करवाया तो देवयानी ने औपचारिकता में हाथ जोड़ अभिवादन किया।

मैं आप लोगों के लिए चाय वगैरह..। अन्य दोनों से बिना परिचित हुए ही वह अंदर जाने लगी। सूर्यप्रकाश चाचा का बिना सूचना दिए इन लोगों को लेकर आ धमकना उसे अप्रिय लगा था। बाहर खड़ी गाड़ी देखकर वह यह अनुमान नहीं लगा पाई थी कि ये लोग होंगे।

नहीं, नहीं, हम लोग चाय-वाय पी चुके हैं। आइए, आप बैठिए। दो घड़ी बातें कर लें आपसे, फिर विदा लें। विधायक जी के स्वर में लापरवाही थी। 

आज तुम्हें देर क्यों गई देवयानी। सूर्यप्रकाश चाचा ने इस तरह पूछा मानो वे सभी के सामने देवयानी को अग्निपरीक्षा में खरी उतारना चाहते थे। देवयानी को भृकुटि थोड़ी-सी टेढ़ी हो गई। उसने कुछ रुखे होकर जवाब दिया-जब नौकरी है तो देर-सवेर होना स्वाभाविक है। सूर्यप्रकाश चाचा कुछ अपमानित से हो उठे।

विधायकजी ने अपना विचार रखा-वैसे महिलाओं के लिए नौकरी करना कठिन तो है ही। घर-बाहर दोनों जग में तालमेल बैठाने में ही बेचारी परेशान रहती हैं। क्यों, कठिन क्यों है? आराम से सामंजस्य बैठा लेती हैं दोनों जगह। देवयानी ने अपने स्वर को थोड़ा कोमल बनाने का प्रयास किया तो विधायकजी का साहस बढ़ा। आप कहां पढ़ाती हैं? उन्होंने पूछा। यहीं एक संस्था है। उसी में तिब्बती बच्चों को। विधायकजी की उत्सुकता बढ़ी। वे संभलकर बैठ गए थे। उन्होंने अगला प्रश्न दागा-तिब्बती भाषा या हिंदी में? जी दोनों। दोनों जानती हूं मैं।

रयोकन नाम के एक झेन गुरु हुए थे। एक रात उनके घर में चोर आया, पर झोंपड़ी में कुछ भी चुराने लायक न था। रयोकन ने उसे जाने से रोका और कहा कि, तू इतनी दूर से मुझसे मिलने आया, खाली हाथ वापस जाए, यह ठीक नहीं। तू मेरे कपड़े ले जा। चोर को आश्चर्य हुआ, परंतु वह कपड़े लेकर चला गया।

बहुत खूब। कितने होंगे कुल मिलाकर?

हर संस्था में अलग-अलग हैं। वैसे पूरे भारत में तो लाखों की संख्या है। देवयानी ने एक स्थूल आंकड़ा दिया।
देखिए, अब अपने देश की जनसंख्या खुद ही दिन दूनी-रात चौगुनी बढ़ रही है, उस पर से इन लोगों के ऊपर भी खर्च हो रहा है सरकार का। विधायकजी ने अपनी चिंता प्रकट की।

कभी आप लोगों ने इनकी समस्याओं को अपना चुनावी मुद्दा तो बनाया नहीं। समस्याएं दूर कैसे होंगी? देश की जनसंख्या बढ़ रही है तो तुष्टीकरण की नीति के चलते ही। किसी को धर्म के नाम पर छूट है तो कोई अल्पसंख्यक का राग अलापकर अपनी आबादी दिन-रात बढ़ाने की फिक्र में है। हमारे नेता लोग वोट की राजनीति में इन सभी समस्याओं से मुंह फेर, बस एक दूसरे की बखिया उधेड़कर सत्ता हथियाने का जुगाड़ करते हैं।

अरे भाई, आप तो बिल्कुल विपक्षी पार्टी की तरह भाषण दे रही हैं। विधायकजी हंसे थे।

मेरे भाईसाहब जीवित थे तो कहा करते थे कि देवयानी को नेता बनाऊंगा। सूर्यप्रकाश चाचा ने बात बदल दी। मैं आप लोगों के लिए कुछ खाना-वाना तैयार कर दूं। देवयानी ने उठने का उपक्रम किया। नहीं, खाने-पीने के चक्कर में न पड़िए। आपसे मिलना था, सो मिल लिया। अब चलूंगा। गाड़ी है, दो घंटे में घर पहुंच जाऊंगा। विधायकजी सावधान होकर बैठ गए थे।

चाचा ने आगे बताया-देवयानी, वो गांव से बनारस आते समय जो रास्ते में पेट्रोल पम्प है राधे सर्विस, वह विधायक जी का ही है। इन्हीं के छोटे भाई राधेकांतजी के नाम से। वही देखते हैं उसे। अभी शादी नहीं हुई है। देवयानी की छठी इन्द्रिय सजग हो उठी थी। कहीं पिछली बार की तरह फिर कोई रिश्ता लेकर तो नहीं आ गए चाचा? विधायकजी के जाने के बाद देवयानी ने सीधे चाचा से कहा-मेरा विचार जिससे न मिले, उस घर में जाकर क्या करूंगी मैं? देवयानी ने तर्क दिया। अब लो! पहले विचार मिला लोगी तब शादी होगी? चाचा ने अपना माथा पीट लिया। देवयानी को उनकी नासमझी बुरी लगी। हर बात के दो अर्थ होते हैं चाचाजी। आप मेरी बात को इस तरह न मोड़ें। हां, हां, अब तुम लोगों जितना समझदार तो मैं नहीं हूं। माफ करना, बहुत बड़ी गलती की जो अपना समझकर रिश्ते की बात चला बैठा।

नहीं, हम भी आपको कहां बेगाना समझ रहे हैं भैयाजी, बस, पहले से परिवार में बातचीत कर लेनी चाहिए थी। इस तरह एकाएक अपनी लड़की को नहीं दिखा देना चाहिए किसी को। मां ने धीमे स्वर में प्रतिवाद किया। चाचा गुस्से में बाहर निकल गए थे। दीपेश उनके पीछे बाहर तक छोड़ने गया था।
 
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मैं अंदर आ जाऊं सर? देवयानी ने गेशे जम्पा के कक्ष का पर्दा एक ओर हटाते हुए पूछा। आज संस्थान आते ही गेट के बारह खड़े चौकीदार ने सूचना दी थी-मैडम, आपको साहब ने याद किया है।
हां, आ जाओ देवयानी। एक मिनट देवयानी, मैं अभी बात करता हूं। कोई बात नहीं सर।
गेला, कोई विशेष बात? पूछते हुए भिक्षुणी लोये दोलमा कक्ष में प्रवेश कर चुकी थीं। आइए माई। बैठिए। गेशे जम्पा ने भिक्षुणी का स्वागत किया। अरे, देवयानी मैडम तुम? भिक्षुणी को आश्चर्य हुआ था। देवयानी सकुचा उठी। कोई उत्तर देने से पहले ही गेशे जम्पा ने स्पष्ट कर दिया-मैंने ही आप दोनों को बुलाया है। दरअसल कुछ आवश्यक कार्य से मुझे धर्मशाला जाना है। कोई विशेष बात गेला? भिक्षुणी उत्सुक थी।
हां, अभी तो बस इतना ही पता है कि काशग की आपातकालीन बैठक बुलाई गई है। जेनेवा तथा कैनबरा कार्यालय के भी कुछ वरिष्ठ पदाधिकारी इस बैठक में भाग लेने आ रहे हैं। गेशे जम्पा का मुखमंडल गंभीर था।
ये काशग आपकी निर्वासित सरकार की है सर? देवयानी अपनी उत्सुकता रोक न सकी। हां, और मैं उसका एक छोटा सा कार्यकर्ता। वे मुस्कुरा उठे। देवयानी ने अगला प्रश्न पूछ लिया-काशग की चुनाव प्रक्रिया क्या है?
पूरी तरह जनतांत्रिक। पांच वर्ष के लिए। राष्टÑाध्यक्ष परम पावन दलाई लामाजी होते हैं। मुख्यालय कहां है? देवयानी ने पूछा तो गेशे जम्पा पुन: गंभीर हो उठे। अभी तो फिलहाल भारत के हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला, कांगड़ा में ही है। अंतरराष्टÑीय कार्यालय भी हैं हमारे कई देशों में, जैसे स्विट्जरलैंड, न्यूयार्क, नेपाल, जापान, रूस, आस्ट्रेलिया, फ्रांस...और भी कई। जब कभी हमें किसी गंभीर विषय पर विचार करना होता है तो हम बैठक बुलाते हैं। जरूरी नहीं कि सभी पदाधिकारी एक ही बैठक में सम्मिलित हो सकें। जैसे इस बार आस्ट्रेलिया के कैनबरा कार्यालय और स्विट्जरलैंड के जेनेवा से पदाधिकारी आ रहे हैं। गेशे जम्पा ने देवयानी की जिज्ञासा शांत कर दी।
क्या भविष्य में भी, जब तिब्बत के पास अपनी आजादी होगी, सरकार का यही स्वरूप रहेगा? देवयानी का अगला प्रश्न सचमुच टेढ़ा था। गेशे जम्पा ने उसका भी स्पष्ट उत्तर देने का प्रयास किया-दरअसल देवयानी, परम पावनजी का एक अपना विचार है स्वतंत्र तिब्बत की सरकार को लेकर। वे एक सदन की संसद और सदन में जनता का पूर्ण प्रतिनिधित्व देखना चाहते हैं। सभी बिंदुओं को समाहित करते हुए अपना एक आंतरिक संविधान बनाने की उनकी योजना है जो निश्चित ही तिब्बत की प्राचीन अर्द्धसामंतवादी पद्धति से पृथक है और एक नई व्यवस्था का संकेत है।
सपनों के लिए भी आधार तो चाहिए होता है और वह आधार तुम लोग हो। तुम लोगों का प्यार, सहयोग और त्याग ही हमारा संबल है। गेशे जम्पा की गहरी दृष्टि देवयानी पर टिक गई थी। देवयानी ने अपनी पलकें झुका लीं। 
माई, इस एक हफ्ते में आप मठ और संस्थान की संरक्षिका रहेंगी। देवयानी आपके साथ होंगी। कभी-कभी किसी पर मन अनायास ही भरोसा करने लगता है। मेरी इस यात्रा को यदि आवश्यक हो तभी उजागर करिए। जी, समझ गई सर। देवयानी ने प्रत्युत्तर किया।
संस्थान की गतिविधियों पर दृष्टि रखना देवयानी। दरवाजे की ओर बढ़ते हुए उन्होंने अंतिम बार उसे पुन: चेताया।
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हम रात भर भूखे-प्यासे चलते रहे थे। दूर-दूर तक जीवन का कोई चिन्ह नहीं दिखाई देता था। दीदी मुझे डर लग  रहा है, सोनम की आवाज डर के मारे थरथरा रही थी। मैं रातों-रात सक्य गांव से बहुत दूर निकल आना चाह रही थी जहां वे मेरी परछाई भी न ढूंढ सकें। रिक्शे में देवयानी के साथ बैठी भिक्षुणी दोलमा बता रही थी। उसके चेहरे पर अतीत के चित्र बन मिट रहे थे। लामा सोनम डक्पा कितने छोटे हैं आपसे? देवयानी ने पूछा। पूरे छह वर्ष छोटा है मुझसे। जब से देवयानी ने अपने मकान मालिक सोनम डक्पा की गंभीर बीमारी का हाल भिक्षुणी को बताया था तब से वे कई टुकड़ों में अपना और सोनम का अतीत फिर से जी चुकी थीं। देवयानी को यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ था कि लामा सोनम डक्पा माई दोलमा के सगे छोटे भाई थे। मैं कल तुम्हारे साथ ही चलूंगी देवयानी। सोनम को देखकर वापस आ जाऊंगी। और दूसरे दिन माई दोलमा देवयानी के संग सोनम डक्पा को देखने चल दी थीं।
आपको अंधेरे में मकान दिखा तो क्या किया आपने? देवयानी को भिक्षुणी के अतीत में धंसना अच्छा लग रहा था। उसी के घर के मालिक ने हमारी मदद की थी। हमने सारी बातें सच-सच कह सुनार्इं उसे। उसने हमें अपने घर में दो दिन शरण दी। तीसरे दिन बहुत-सी खाने-पीने की सामग्री और खच्चर की व्यवस्था करके उस देवतुल्य इंसान ने हमें भारत की सीमा में भेजने का प्रबंध किया। हम लोग भूटान होते हुए भारत में प्रवेश कर पाए थे। भारत आने के बाद एक शांति और आश्वस्ति सी मिली थी। भिक्षुणी की दो गोल-गोल आंखें जैसे अतीत में धंसी हुई थीं।
क्या आपको लामा सोनम डक्पा का इतने दिनों के संन्यास  के बाद गृहस्थ जीवन में वापस आ जाना बुरा लगा था। देवयानी ने अचानक पूछ लिया। भिक्षुणी दोलमा ने उत्तर दिया-बुरा भी लगा था और अच्छा भी। क्यों? क्योंकि उसने इतने वर्षों की तपस्या भंग कर दी अपनी। हमारे यहां भिक्षु बनना सौभाग्य सूचक है देवयानी। अच्छा इसलिए लगा कि एक बेसहारा और जरूरतमंद स्त्री का हाथ थामा जो आश्रय न मिलने पर टूट सकती थी।
आइए माई, उतरिए। जरा संभलकर। देवयानी ने गेट के सामने रिक्शे से भिक्षुणी दोलमा को सहारा देकर उतारते हुए कहा। लामाजी, देखिए कौन आया है मेरे साथ? देवयानी ने कमरे के सामने पहुंचकर आवाज दी तो लोब्जंग बाहर निकल आई थी।
अरे दीदी, आप? वह खिल उठी थी।
कौन है? अंदर से लामा सोनम डक्पा का दुर्बल स्वर गूंजा था।
दीदी हैं लामाजी, लोये दीदी। देवयानी मैदम के साथ आई हैं। दीदी, टाशी डेलेक। लामा सोनम डक्पा ने उठने की प्रयास किया।
लेटे रहिए लामाजी। डॅक्टर ने मना किया है उठने से। दीदी, बैठिए। एक साथ दोनों से लोब्जंग ने कहा। देवयानी चुपचाप लामा सोनम डक्पा के चेहरे का उतार-चढ़ाव देख रही थी। वे बलात् अपनी भावनाओं पर काबू पाने का प्रयास कर रहे थे। यही हाल भिक्षुणी दोलमा का भी था। आंखें डबडबाई थीं।
देवयानी, जरा इधर आना। अपने कमरे से मां ने आवाज दी थी।
मैं आती हूं माई, सुनकर। देवयानी ने आज्ञा ली। ठीक है देवयानी। मुझे शाम होने से पहले मठ तक पहुंचा देना। भिक्षुणी दोलमा का स्वर भर्राया था। आज यहीं रुक जाओ न दीदी। लोब्जंग ने भिक्षुणी के जाने की बात सुनकर कहा।
नहीं लोब्जंग! रुक नहीं सकती। मठ में बच्चे अकेले हैं। भिक्षुणी ने छलक आई आंखों को बहाने सहित पोंछा था।
क्या है मां? देवयानी ने कमरे में दरवाजे पर खड़ी अपनी मां से पूछा। इधर आ। यह कहकर मां भीतर मुड़ गई थीं। दीपेश कहां है? अंदर आते हुए देवयानी ने पूछा। दूसरे वाले कमरे में है। मां चौकी पर बैठ गई थीं। कुछ देर पहले दीपेश को एक लड़के ने आकर सूचना दी है कि पेमा और उसके साथी थाने में बंद हैं। मां ने बताया। क्यों? क्या बात है? देवयानी के चेहरे पर आश्चर्य के साथ एक अनजाना भय भी फैल गया था।
लॉन में जो खंडहर है, उसी में दोस्तों के साथ हेरोइन वगैरह पी रहा था। दरोगा ने रंगे हाथों पकड़ लिया है। तब तो बहुत मुश्किल हुई। देवयानी बुदबुदाई थी। लामाजी को पता है या नहीं? देवयानी ने पूछा। लोब्जंग को बुलाकर बता दिया है मैंने। उसी ने मुझसे मना किया कि लामाजी को पता न चलने पाए, अन्यथा उनकी तबीयत और खराब जो जाएगी। बेचारी, पति को लेकर चिंतित थी ही, अब लायक सुपुत्र ने भी दे दिया एक झंझट। हूं:।                                                        
 
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 मां बड़बड़ा रही थीं और देवयानी चिंतित थी। एक ही मकान में रहने के कारण उस परिवार की समस्याएं भी उसकी अपनी लग रही थीं।
तुम्हें क्या लग रहा है कि वे कहेंगी नहीं? अभी भिक्षुणी दोलमा चली जाएंगी तो वे जरूर कहेंगी। अभी उनके सामने कुछ कहना नहीं चाह रही हैं बेचारी। देवयानी ने लोब्जंग की ओर से कहा।
नहीं देवयानी मैदम, पेमा को छुड़ाने के लिए आप लोग जरा भी मत सोचिए। सड़ने दीजिए उसे जेल में। कहता था, कम्प्यूटर सीख रहा हूं। मैं भी विश्वास करती रही। लेकिन उसने मुझे धोखा दिया। अपने कुकर्मों का फल भोगने दीजिए। पीछे से आकर खड़ी हुई लोब्जंग सिसक पड़ी थी।
नहीं लोब्जंग जी, रोइए नहीं। उसे एक और मौका दीजिए सुधरने का। देवयानी ने लोब्जंग के कंधों पर थपकी देते हुए सान्त्वना दी। नहीं देवयानी मैदम, वह नहीं सुधरेगा। लोब्जंग अपने स्कार्फ से अपनी आंखें पोंछ रही थी। एक निवेदन है देवयानी मैदम, लामाजी और लोये दीदी को एकदम मत बताइएगा, नहीं तो...।
आपके मना करने से पहले ही मां ने मुझे समझा दिया है। आप निश्ंिचत रहिए। देवयानी ने आश्वस्त किया लोब्जंग को।
आइए देवयानी मैदम, आपको लोये दीदी बुला रही थीं। मैं आपको बुलाने ही आई थी। लोब्जंग वापस मुड़ गई थी। देवयानी ने देखा कि लोब्जंग का छुपा कई जगह से घिसकर फट गया था। तुम चिंता न करो सोनम। अभी मैं हूं न? यह जंतर बड़े लामाजी से बनवाकर लाई हूं। इसे पहने रहना, कुछ ही दिन में सब ठीक हो जाएगा। लोब्जंग के साथ अंदर घुसते ही देवयानी ने देखा था कि भिक्षुणी दोलमा एक सफेद धागे में गुंथा जंतर लामा सोनम डक्पा की बांह पर बांध रही थीं।
हां लामाजी, आपकी बड़ी दीदी का भी आशीर्वाद इसमें है न, इसलिए और जल्दी लाभ पहुंचेगा। पेमा कहां गया है लोब्जंग? वही मुझे छोड़ आता मठ तक। भिक्षुणी ने चारों तरफ दृष्टि घुमाई।
मैं चली चलूंगी आपको छोड़ने या दीपेश छोड़ आएगा। शायद पेमा किसी काम से दिल्ली गया है। है न, लोब्जंगजी? देवयानी ने बात को संभालने का प्रयास किया। नहीं मैडम, वो कहीं नहीं गया होगा। आवारागर्दी कर रहा होगा कहीं।
दावा को मैं अपने पास मठ में ही रख लूं? भिक्षुणी दोलमा ने उनकी समस्या सुनकर प्रस्ताव रखा। उसे संस्थान तक रोज मैं लेती जाऊंगी और अपने साथ ही ले भी आऊंगी। हंसते हुए देवयानी ने वातावरण को हल्का बनाया था।
आप लोगों का बहुत सहारा है मैडम। कहते हुए लामाजी ने अपनी आंखें बंद कर ली थीं।
काशाग की बैठक चल रही थी। लगभग सभी पदाधिकारी आकर अपनी जगहों पर बैठ चुके थे। तिब्बत की परंपरागत शैली की बुद्ध की तस्वीर और निर्वासित सरकार का ध्वज कक्ष में ठीक सामने लगा हुआ था। सभा के अध्यक्ष अपना वक्तव्य दे रहे थे-तिब्बत की स्थिति दिनोंदिन दयनीय होती जा रही है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक शोषण के साथ ही अब उसकी धार्मिक परंपराओं पर भी अपने ही देश में कुठाराघात हो रहा है। तिब्बती मठों और विहारों में भिक्षुओं की संख्या कम कर दी गई है। धर्मोपदेश पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। पंचेन लामा के नियोजन के संदर्भ में भी चीन का कृत्य आश्चर्यजनक एवं अंतर्विरोधी है। वह भी अब विस्तारवाद और पुनर्जन्म में विश्वास कर रहा है और अंतर्विरोधी इसलिए कि तिब्बत को जिस समझौते के तहत उसने धार्मिक आजादी दी, उसी का उल्लंघन वह स्वयं कर रहा है। वह कहता है कि पंचेन लामा के चयन में जो कर्मकांड होना चाहिए वह नहीं हुआ, अत: परमपावन दलाई लामाजी द्वारा स्वीकृत पंचेन गलत हैं। जबकि पूरे विश्व को ज्ञात है कि पंचेन लामा के देहावसान से लेकर नए पंचेन की खोज तक तिब्बतियों की अपनी परंपरा है, जो अपने-आपमें अनूठी है। इस पर अंतिम निर्णय भी परम पावनजी का होता है, क्योंकि वे हमारे राष्टÑाध्यक्ष होने के साथ-साथ तिब्बतियों के पथ-प्रदर्शक एवं धर्मगुरु भी हैं। पंचेन लामा की चीन द्वारा नई नियुक्ति होते ही तिब्बत में खलबली मच गई। यहां तक कि शासकों को कर्फ्यू भी लगाना पड़ गया। यह उद्वेलन नि:संदेह आजादी की आवाज बुलंद करने का परिचायक है।
परंतु आज जिन कठिनाइयों की ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिए यह बैठक आयोजित है, उसमें एक तो है, तिब्बत में ही प्रशिक्षित हो रहे तिब्बत-विरोधी हमारे अपने ही कुछ लोग और दूसरा, हमारे निर्वासित जनतंत्र में दिग्भ्रमित होते कुछ लोग। यह एक दु:खद सूचना है कि तिब्बती जनप्रमुखों को समाप्त करने की कोई हिटलिस्ट जारी हुई है, जिसमें हमारे तिब्बती भाई ही संलग्न हैं। यहां से उतनी दूर रह रहे हमारे भाई-बहनों में राष्टÑीयता की भावना का समावेश किस तरह हो, इस दिशा में भी हमें सोचना है। दूसरी तरफ, हम जहां-जहां शरणार्थी के रूप में हैं, वहां-वहां अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के लिए युवक-युवतियों को शिक्षित कर रहे हैं। बौद्ध धर्म, संस्कृति, इतिहास, ज्योतिष और आयुर्वेद को पुनर्जीवित करने में तत्पर हैं। साहित्य-सर्जन में अनुवाद, पुनरुद्धार और संपादन का कार्य अबाध गति से हो रहा है, परंतु पश्चिमी प्रभाव में कुछ लोग दिग्भ्रमित हो रहे हैं। इस पर भी विचार किया जाना चाहिए।
जब भी कोई तिब्बती अपनी मुक्ति-साधना के लिए बहुत सक्रिय होता है तो उसे तिब्बत बुला लेने का कोई न कोई भावनात्मक बहाना ढूंढ लिया जाता है और वहां उसकी सक्रियता समाप्त करने की पूरी व्यवस्था कर दी जाती है। न टूटने की स्थिति में उसे भी समाप्त करने में कोई हिकिचाहट नहीं होती। उन्हें घोर यातनाएं दी जाती हैं।
अध्यक्ष द्वारा यह रहस्योद्घाटन बैठक में भाग ले रहे गेशे जम्पा को भीतर से झकझोर गया था।
इस संदर्भ में गेशे जम्पा जी का विचार भी इस पटल पर रखना चाहूंगा। अध्यक्ष महोदय ने कहा तो गेशे जम्पा ने स्वयं को संयत करते हुए बड़ी विनम्रतापूर्वक अपने स्थान पर उठकर उत्तर दिया- अध्यक्ष महोदय, इस संदर्भ में कुछ भी कहने के लिए मुझे थोड़ा सा समय चाहिए। यह कहकर बैठ गए थे वे। अब मैं कैनबरा कार्यालय के अध्यक्ष श्री छेरिंग तोपग्याल को आमंत्रित करता हूं।
 लगभग पचपन-साठ वर्षीय एक व्यक्ति ने बोलना प्रारंभ किया था-अपने सक्रिय सदस्यों को तिब्बत भेजा जाए या न भेजा जाए? यह एक उलझा हुआ बिंदु है। मेरा मानना है कि अब हमारी लड़ाई निर्णायक दौर में पहुंच चुकी है। उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है विगत वर्षों में भारत से जाने वाले तिब्बतियों के समूह को चीनी सरकार के विरोध प्रकट करने पर भारत की सीमा पर ही रोक दिया जाना। हर देश की अपनी विदेश नीति होती है। हम उसकी सुरक्षा खतरे में डालकर अपना कार्य सिद्ध करने के पक्ष में नहीं हैं। मेरा विचार है कि यह एक अत्यंत सुनहरा मौका है, वापस तिब्बत जाकर वहां क्रांति की मशाल जलाने का। विश्व जनमत हमारे साथ है। अमेरिकी देश, अफ्रीका आदि हमारी मदद कर रहे हैं। परम पावनजी को संसार का सर्वोच्च सम्मान नोबल पुरस्कार मिलना हमारी मुक्ति-साधना को विश्व द्वारा स्वीकार करने का परिचायक है। आज भी चीन में तिब्बती जनता का मनोबल अदमनीय है। सैकड़ों जन-प्रदर्शन हुए हैं, जिनमें हजारों तिब्बतियों की जानें गर्इं। अनगिनत को जेलों में डाल दिया गया, जिनके बारे में कोई सूचना नहीं।
सर, ये पत्र! झुककर फुसफुसाते हुए एक अर्दली ने पत्र की प्रतिलिपि गेश जम्पा के सामने रख दी थी। गेशे जम्पा को पत्र की लिखावट पिताजी की लग रही थी। अंत में लिखे हुए नाम थुप्तेन ने सारी शंका समाप्त कर दी-ल्हासा, टेलो 18वीं तारीख अप्रैल
‘मेरे हृदय के टुकड़े जम्पा! प्यार! इतने दिन कैसे बीते, लिख नहीं सकता। बस इतना ही कहूंगा कि आ जाओ बेटा। तुम्हारी मां कुछ दिनों की मेहमान है। यहां के अधिकारी अब इस शर्त पर भी मान गए हैं कि यदि तुम यहां आकर शांतिपूर्वक जीवन बिताओ तो वे हमें जेल से मुक्त कर देंगे और चैन की जिंदगी जीने देंगे। अपने जीवन के बचे-खुचे दिन तुम्हारे साथ बिताना चाहता हूं। शायद मां भी कुछ दिन और जी सके। आ जाओ वापस’।
तुम्हारा पिता/ थुप्तेन  
        (जारी...)