हुड्डा समिति के पन्ने तो पलटिए

    दिनांक 14-दिसंबर-2020
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निर्मल यादव
जो कांग्रेसी इन दिनों केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानूनों पर शोर मचा रहे हैं, वे पहले हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेन्द्र सिंह हुड्डा की अध्यक्षता में बने एक कार्यबल की रपट तो पढ़ें। उसमेें इन्हीं कानूनों की जरूरतों पर बल दिया गया है

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किसानों को संबोधित करते भूपेन्द्र सिंह हुड्डा। इन्हीं ने 2010 में सिफारिश की थी कि किसानों को मुक्त बाजार देना चाहिए और जब ऐसा ही हुआ तो उसके विरोध में खड़े हैं।


खेती को सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त करने और कॉर्पोरेट कृषि के जिन उपायों के विरोध में इन दिनों किसान आंदोलन चल रहा है, उन्हीं प्रावधानों को लागू करने की कभी कांग्रेस की सरकारों और नेताओं ने जमकर पैरवी की थी।

कृषि सुधार के उपायों को लेकर यह विडंबना ही है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों ने मंडी तंत्र के एकाधिकार को खत्म करने सहित जिन अन्य उपायों को तत्काल लागू करने की 10 साल पहले पैरवी की थी, कांग्रेस आज उन्हीं प्रावधानों का विरोध कर रही है। गौरतलब है कि पंजाब के किसानों का विरोध झेल रहे तीनों कानूनों में संविदा कृषि को अनुमति देने और कृषि उत्पादों की मंडी से इतर कहीं भी बिक्री की अनुमति देने सहित सुधार के अन्य प्रावधान किए गए हैं। वहीं, कृषि मंत्रालय के दस्तावेजों के अनुसार 2010 में किसानों को उपज का उचित मूल्य दिलाने के उपाय सुझाने के लिए गठित हुड्डा समिति ने इन्हीं प्रावधानों की वकालत की थी।

कांग्रेस की अगुआई वाली पूर्ववर्ती संप्रग सरकार ने हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा की अध्यक्षता में कृषि उत्पादों पर कार्यबल का गठन किया था। कार्यबल में एनसीपी नेता शरद पवार भी थे। हुड्डा और पवार ने 15 दिसंबर, 2010 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कार्यबल की रपट सौंपी थी। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था, ‘‘कृषि उत्पादों के बाजार को तत्काल प्रभाव से सभी प्रकार के बंधनों एवं प्रतिबंधों से मुक्त करने की जरूरत है।’’ रपट के अनुसार कृषि उत्पादों की ढुलाई, खरीद-फरोख्त, भंडारण, निर्यात और वित्तीय लेनदेन पर मौजूदा कानूनों के तहत लगाए गए प्रतिबंधों से तत्काल मुक्त करने की जरूरत है। इतना ही नहीं, कार्यबल ने मंडी व्यवस्था (एपीएमसी) और लाइसेंस प्रणाली के एकाधिकार को भी अनुमति नहीं देने की वकालत की थी।

इसमें दलील दी गई थी कि एपीएमसी और कॉर्पोरेट लाइसेंस सहित किसी अन्य ऐसी एकाधिकारवादी व्यवस्था को छूट नहीं दी जानी चाहिए, जो कृषि उत्पादों के बाजार को सीमित करती हो। स्पष्ट है कि हुड्डा और पवार ने कृषि उत्पादों के बाजार को किसी भी प्रकार से सीमित न करने की तत्कालीन सरकार से सिफारिश की थी।

कार्यबल ने रपट में कहा था, ‘‘किसान बाजार की उस संकल्पना को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जहां किसान उपभोक्ताओं को अपने कृषि उत्पाद उन्मुक्त भाव से बेच सकें। साथ ही आवश्यक वस्तु अधिनियम का इस्तेमाल भी आपात स्थितियों में ही किया जाना चाहिए और इस कानून के इस्तेमाल से पहले राज्य सरकारों से परामर्श लेना भी जरूरी होगा।’’

रपट के अनुसार कृषि मंत्रालय ने 2003 में कृषि विपणन कानून का एक मॉडल राज्य सरकारों द्वारा स्वीकार किए जाने के लिए जारी किया था। कानून के इस मसौदे में किसानों को कृषि बाजार के विकल्पों की शृंखला मुहैया कराने का भी प्रावधान था। इसमें एपीएमसी के समानांतर निजी बाजारों एवं किसान उपभोक्ता बाजारों की स्थापना के भी प्रावधान किए गए थे। इसमें ई ट्रेडिंग, एकल बाजार शुल्क, संविदा कृषि और प्रत्यक्ष बाजार प्रणाली को बढ़ावा देने की पुरजोर वकालत की गई थी। कार्यबल ने राज्यों द्वारा इन सुधारों को अपनाने की जरूरत पर बल देते हुए मॉडल कानून के प्रावधानों से भी आगे जाकर कृषि सुधारों को लागू करने की बात कही थी, जिससे किसानों को बंधन-मुक्त और प्रतिस्पर्धी बाजार मुहैया कराए जा सकें।

फौरी तौर पर अगर देखा जाए तो मोदी सरकार ने हुड्डा समिति की सिफारिशों को 10 साल बाद बदली हुई परिस्थितियों के अनुकूल प्रावधानों के साथ ही लागू किया है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि अब हुड्डा और पवार सहित अन्य विपक्षी दलों के नेता अपने ही सुझाए प्रावधानों का विरोध कर रहे हैं। यह बात सही है कि भारत में सियासत की गहरी जड़ों को देखते हुए सरकार के हर फैसले को सियासी चश्मे से ही देखा जाता है। मगर देश-काल की जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को देखते हुए कम से कम किसान कल्याण की खातिर राजनीतिक दलों को सियासत से परे सोचना चाहिए।    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)