वामपंथी ढोल का तंत्र-विरोधी खोल

    दिनांक 15-दिसंबर-2020
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एस. वर्मा
जर्मनी और इटली में फासीवादी शासन के पतन के बाद एंटीफा जैसे संगठन अस्तित्व में आए। इनकी कार्यप्रणाली इनके वास्तविक मंतव्यों को प्रकट करती है। इतिहासकार मार्क ब्रे के अनुसार, एंटीफा एक ‘ढीला-ढाला’ आंदोलन है। आइए जानें, क्या है एंटीफा और कितना वामपंथी खाद-पानी मिलता है इसे
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अमेरिका में एंटीफा का प्रदर्शन।  दुनिया के कई देशों में स्थानीय तंत्र विरोधी हिंसक आंदोलनों को हवा देता रहा है वामपंथी सोच से भरा ‘एंटीफा’  (फाइल चित्र)

‘‘शासकों को शक्ति नागरिकों की सहमति से प्राप्त होती है; अहिंसक कार्रवाई इस सहमति को वापस लेने की एक प्रक्रिया है।’’-द पॉलिटिक्स आॅफ नॉनवायलेंट एक्शन (1973) में जीन शॉर्प का यह कथन साधारण-सा लग सकता है, जो अहिंसक कार्रवाई द्वारा लोकतांत्रिक परिवर्तन को बढ़ावा देने की हिमायत करता प्रतीत होता है। परन्तु इसके कहीं गहरे निहितार्थ हैं। जीन शॉर्प की यह अवधारणा आज कुछ संशोधनों के साथ दुनियाभर के धुर वामपंथी और अराजकतावादियों का ध्येय वाक्य बन चुकी है और विश्व में अहिंसक आन्दोलनों की आड़ में स्थापित सरकारों को गिराने और व्यापक तख्तापलट के लिए किये जाने वाले सशस्त्र संघर्षों की घटनाएं अब बड़े पैमाने पर देखने में आ रही हैं।


एंटीफा एक ऐसा उग्रवादी राजनीतिक आंदोलन है जो खुद को फासीवाद विरोधी के रूप में प्रदर्शित करता है। इसके सदस्य खुद को पूंजीवाद-विरोधी और सरकार-विरोधी विचारों वाले क्रांतिकारी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यूरोप में शुरू हुआ यह आन्दोलन मूलत: द्वितीय विश्व युद्ध के युग में फासीवादी तानाशाही का विरोध करने के लिए संगठित यूरोपीय कार्यकर्ता समूह के रूप में अस्तित्व में आया था


हाल ही में अमेरिका में इस तरह के आन्दोलनों का प्रभाव अत्यधिक तेजी से बढ़ता दिखाई देता है। मई 2020 में जॉर्ज फ्लॉयड की संदेहास्पद मृत्यु को सरकार विरोधी आन्दोलन की धुरी बना दिया गया और श्वेत बनाम अश्वेत के अतीत में विद्यमान घृणास्पद विभेद को पुनर्जीवित करने की कोशिश की गई। इसके कुछ ही महीनों बाद सितम्बर 2020 में घटी एक नई घटना ने एक बार फिर इस आग को हवा दे दी। अमेरिका की कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ मुठभेड़ में 48 वर्षीय माइकल फॉरेस्ट रीनोहेल की मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद  एक बार फिर ‘श्वेत सर्वोच्चता’ और ‘अत्याचारी शासन के उन्मूलन’ जैसे मुहावरों का इस्तेमाल शुरू कर दिया गया। इस घटना में जॉर्ज फ्लॉयड के मामले की तरह मृतक के संदेहास्पद अतीत को पूरी तरह से छुपाया गया। उल्लेखनीय है कि ‘निरीह’ रीनोहेल, ओरेगन के पोर्टलैंड में एक ट्रम्प समर्थक आरोन जे. डेनियलसन की हत्या का आरोपी था, जिसे 29 अगस्त को परस्पर विरोधी प्रदर्शनकारियों के मौखिक विवाद का अंत हत्या के द्वारा करने को ‘विवश’ कर दिया गया था। इस घटनाक्रम के बाद बड़े पैमाने पर सरकार विरोधी आन्दोलन प्रारंभ हो गये, जिनका नेतृत्व एक धुर वामपंथी संगठन ‘एंटीफा’ के हाथ में है। ऐसा नहीं कि एंटीफा कोई नया संगठन है परन्तु डोनाल्ड ट्रम्प के हालिया राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार बनने के बाद इसकी गतिविधियों में उल्लेखनीय तेजी देखी गई थी।

एंटीफा की पृष्ठभूमि
‘एंटीफा’ सर्वप्रथम इटली में बेनितो मुसोलिनी के शासन के विरुद्ध एक प्रतिरोधी संगठन के रूप में जानकारी में आया। मरियम-वेबस्टर शब्दकोश के अनुसार, ‘एंटीफा’ शब्द का पहला ज्ञात उपयोग नाजी जर्मनी के दौरान हुआ था और वर्तमान अर्थों में इसे जर्मन एंटीफा से लिया गया है, जो जर्मन शब्द ‘एंटीफासिस्टिस्क’ का संक्षिप्त रूप है।’ यह एक ऐसा उग्रवादी राजनीतिक आंदोलन है जो खुद को फासीवाद विरोधी के रूप में प्रदर्शित करता है और इसके सदस्य खुद को पूंजीवाद-विरोधी और सरकार-विरोधी विचारों वाले क्रांतिकारी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यूरोप में शुरू हुआ यह आन्दोलन जो मूलत: द्वितीय विश्व युद्ध के युग में फासीवादी तानाशाही का विरोध करने के लिए संगठित यूरोपीय कार्यकर्ता समूह के रूप में अस्तित्व में आया था, और जर्मनी और इटली में नाजीवाद एवं फासीवाद के अंत के बाद भी समाप्त नहीं हुआ बल्कि इसने अपने प्रसार के नए क्षेत्र चुने। अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग के अश्वेतों के अधिकार के लिए चलाये गए आंदोलन के समानांतर 1970 और 1980 के दशक में ‘श्वेत वर्चस्व’ और ‘स्किनहेड’ का विरोध करने के नाम पर ये पूरे अमेरिका में फैल गए। हालांकि इनका नाम कई हिंसक गतिविधियों और सरकार विरोधी नीतियों के चलते चर्चा में आता रहा, परन्तु 2000 तक आते-आते यह संगठन शीतनिद्रा में चला गया। फिर जब रिपब्लिकन्स की ओर से डोनाल्ड ट्रम्प को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया, यह संगठन दोबारा सक्रिय हुआ और वर्तमान में अपनी कार्यपद्धति के कारण समाचार माध्यमों में छाया हुआ है।

कार्यपद्धति
जर्मनी और इटली में फासीवादी शासन के पतन के बाद इन संगठनों का अस्तित्व और कार्यप्रणाली इनके वास्तविक मंतव्यों को प्रकट करती है। एंटीफा की प्रकृति पर परस्पर विरोधी रुख विद्यमान हैं। इतिहासकार और ‘एंटीफा: द एंटीफासिस्ट हैंडबुक’ के लेखक मार्क ब्रे के अनुसार, एंटीफा एक ‘विकेन्द्रीकृत-क्रांतिकारी-आत्मरक्षात्मक’ प्रकृति का एक ढीला-ढाला आंदोलन है। जबकि दूसरी ओर अमेरिकी अटॉर्नी जनरल विलियम बर का कहना है कि अमेरिकी न्याय विभाग, जो लगातार एंटीफा की निगरानी कर रहा है, के द्वारा दी गई जानकारी इस बात की पुष्टि करती है कि यह संगठन देशभर में हुई हिंसा के केंद्र में है। ब्रे की बातों पर विश्वास करें तो इतनी संगठित और कुशल समन्वय के साथ अंजाम दी गई हिंसक गतिविधियां, एक कथित रूप से ढीले-ढाले संगठन द्वारा निष्पादित की ही नहीं जा सकतीं। पीछे छुपकर अपने मंसूबों को अंजाम देना वामपंथी अतिवादी संगठनों की विरासत है, और इसे पूर्व सोवियत संघ और आज के चीन में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जहां दिखावे के सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन किस तरह दुनियाभर में साम्यवादी विचारधारा फैलाने के लिए  न केवल प्रचारक बल्कि हिंसक उत्पीड़क के रूप में कार्य करते आये हैं। दरअसल, एंटीफा कहने को अनेक समान विचारधारा वाले संगठनों का ढीला-ढाला गुट है परन्तु वामपंथियों की यह पुरानी रणनीति रही है कि वे अपनी वास्तविक पहचान छुपाकर, किसी ‘फ्रंट आॅर्गनाइजेशन’ का सहारा लेते रहे हैं।

कल और आज

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यह संगठन लोकतांत्रिक देशों में जनता द्वारा चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने और हिंसक तख्तापलट का समर्थक रहा है। अमेरिकी प्रवर्तन एजेंसियों के अनुसार पिछले वर्षों में एंटीफा के सदस्य विरोध के लिए कई तरह की रणनीतियों  का इस्तेमाल करते रहे हैं, जो इनके जरिए  दक्षिणपंथी माने जाने वाले समूहों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों को बलपूर्वक बाधित करने तक जाते हैं। इन धुर वामपंथी गुटों का हिंसक साधनों का इस्तेमाल करना आम बात है और अमेरिका के कई प्रान्तों की पुलिस के रिकॉर्ड से पता चलता है कि इनके सदस्यों का मिर्च स्प्रे, चाकू, ईंटें और जंजीर जैसे साधनों का प्रयोग करना आम बात है। एक अमेरिकी आनलाइन रिपोर्ट के अनुसार एंटीफा ‘फासीवादी ताकतों का मुकाबला करने के लिए हिंसक साधनों के इस्तेमाल का बचाव करता आया है और इसे ट्रम्प की ‘अभूतपूर्व स्तर की निगरानी, अतिक्रमण, निर्वासन, तथा पुलिस की बर्बरता और अमेरिकी जनता के खिलाफ हत्या’ के खिलाफ उचित बताता है। लेकिन विडम्बना है कि पूर्व सोवियत संघ और चीन में ‘ग्रेट पर्गे’ और ‘कल्चरल रिवोल्यूशन’ के नाम पर लाखों निरीह लोगों को मौत के घाट उतारने पर इन संगठनों की आवाज तक नहीं निकलती। जबकि वास्तविकता यह है कि फासीवाद का विरोध करते करते ये वामपंथी एक तरह का ‘हाइब्रिड संस्करण’ बन गये। ये वामपंथ की आड़ में एक नए एजेंडे को आगे बढाने में लग गये, जिसे देखने के लिए न केवल स्टालिन और माओ बल्कि मुसोलिनी और हिटलर भी यदि जीवित होते तो शायद वे भी आश्चर्यचकित होते।

भारत में एंटीफा!
पिछले कुछ वर्षों से भारत में कुछ वर्गों के अन्दर एक विशेष प्रकार की व्याकुलता तेजी से फैलती जा रही है जिसका एक प्रमुख कारण उनके ‘राजनैतिक कैनवस’ का सिकुड़ना है। और चूंकि ये जानते हैं कि भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में केवल राजनैतिक मोर्चे पर मुकाबला करना उनके लिए ज्यादा अनुकूल परिणाम नहीं दे पायेगा तो ऐसे में  ‘एंटीफा’ के मॉडल का अनुसरण करना उनके लिए अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। इस धुर वामपंथी संगठन में  ‘एक्टर्स’ का विकेंद्रीकृत मिश्रण शामिल है। इस संगठन के अन्दर घोर अराजकतावादी और सरकार और व्यवस्था के घनघोर विरोधी शामिल हैं जिन्होंने एक लंबे समय से सरकार, पूंजीवादी और वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं के खिलाफ षड्यंत्रों की रचना की है और हमलों को अंजाम दिया है। इसके लिए उन्होंने कुछ छद्म संगठनों की आड़ ली है जैसे अमेरिका में अनेक पर्यावरण और पशु अधिकार समूह, जैसे कि अर्थ लिबरेशन फ्रंट और एनिमल लिबरेशन फ्रंट, जिनके पीछे रहकर ये बड़े व्यापारिक निगमों, सिविल सोसाइटी और सरकारों के खिलाफ हमले करते आये हैं।   

अराजकता कभी भी किसी शासन प्रणाली का विकल्प नहीं हो सकती।  एक   ‘असंगठित व्यवस्था’  की  जगह ‘संगठित अव्यवस्था’  कभी भी  ले  हो सकती, और अगर  ऐसा  होता  है  तो  राष्ट्रों  का  पतन  अवश्यम्भावी  है,  जो  'एंटीफा' और  इस  जैसी  विचारधाराओं  का लक्ष्य है। यही  कारण  है, कि   ‘राष्ट्रवाद’  इन्हें  मर्मान्तक पीड़ा  देता  है

  अब यही प्रक्रिया भारत में अपनाई जा रही है। पहले मुसलमानों की तथाकथित ‘मॉब लिंचिंग’, कथित दलित उत्पीड़न, सीएए के विरोध में देश में कथित ‘मजहबी आधार पर भेदभाव’ का विरोध और अब किसान कानूनों से देश में तथाकथित पूंजीपतियों के वर्चस्व को रोकने के नाम पर चलने वाला आन्दोलन वास्तव में पूर्णत: मिथ्या और गढ़े हुए तथ्यों पर आधारित हैं, जिनका यर्थाथ से कोई लेना-देना नहीं है। यह सोवियत संघ के वर्चस्व के उन दिनों की याद  दिलाता है जब दुनिया भर में फैले उसके कमअक्ल अनुयायी पोलित ब्यूरो के आदेशों के अंधानुकरण को तत्पर रहा करते थे और सोवियत संघ के स्वयं के लाभ के लिए अपनी नीतियों से 180 डिग्री पलटने के बाद भी उतनी ही श्रद्धा से विपरीत नीतियों का पालन किया करते थे। भारत विविधताओं से भरा देश है, यहां धार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विविधताएं दुनिया के किसी भी देश से अधिक मात्रा में हैं और सदियों से परस्पर सामंजस्य से रहती आई हैं। परन्तु इन देश विरोधी तत्वों के लिए ये विविधताएं उन ‘ट्रिगर्स’ की तरह हैं जो इस सामंजस्य को छिन्न-भिन्न करने के लिए उपयुक्त साधन साबित हो सकती हैं।

 आज वामपंथ जनता का हितैषी होने का दम भरता है और दुनियाभर के गरीबों, किसानों और मजदूरों का रहनुमा होने का ढोल पीटता है, परन्तु इनके हाथ इन्हीं किसानों और मजदूरों के खून से रंगे हुए हैं। अगर हम साम्यवादी हिंसा से पीड़ित लोगों के आंकड़ों को देखें तो यह विश्व युद्ध में हताहत हुए लोगों की संख्या से स्पर्धा करते दिखाई देते हैं। लेकिन इनकी निर्लज्जता असीम है और यह किसी सीमा के बंधन को स्वीकार नहीं करती। यही कारण है कि ये उत्पीड़क आज स्वयं को रक्षक के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। और बात यहीं तक सीमित नहीं है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में यदि विपक्ष अपने ‘राजनीतिक हिसाब’ को निपटाने के लिए ऐसे तत्वों के साथ हाथ मिला ले तो यह स्थिति लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।

अराजकता कभी भी किसी शासन प्रणाली का विकल्प नहीं हो सकती। एक ‘असंगठित व्यवस्था’ का स्थानापन्न ‘संगठित अव्यवस्था’ कभी भी नहीं हो सकती, और अगर ऐसा होता है तो राष्ट्रों का पतन अवश्यम्भावी है, जो ‘एंटीफा’ और इस जैसी विचारधाराओं का लक्ष्य है। यही कारण है कि ‘राष्ट्रवाद’ इन्हें मर्मान्तक पीड़ा देता है।