इस्लामी नाम : मिटे मुगल दासता की निशानी

    दिनांक 15-दिसंबर-2020
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संजय तिवारी
कोई ‘अल्लाहाबाद’ का मूल नाम प्रयागराज उसे वापस करता है तो उसे ‘हिन्दू-मुस्लिम विभाजक’ घोषित कर दिया जाता है। क्यों? कहा जाता है कि ये भारत की ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ को नष्ट करना है। कैसे? सवाल उठता है कि यह तहजीब है क्या और इसकी भारत में प्रासंगिकता क्या है
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एक लंबे समय से हो रही है बख्तियारपुर का नाम बदलने की मांग (फाइल चित्र)
उत्तर प्रदेश में अधिकांश जिलों में रसूलपुर नाम का गांव मिल ही जाएगा आपको। पश्चिम में मुजफ्फरनगर से लेकर पूरब में गाजीपुर तक, हर जिले में रसूलपुर है, कई जिलों में तो दो-चार रसूलपुर मिल जाएंगे। सवाल यह है कि ये ‘रसूल’ कौन है जिससे उ.प्र. वालों को इतनी मुहब्बत हो गयी है कि हर जिले में उसके नाम से गांव हैं, कस्बे हैं? इस्लाम में ‘रसूल’ का शाब्दिक अर्थ है अल्लाह का संदेशवाहक। क्योंकि इस्लाम में ये संदेशवाहक मुहम्मद हैं इसलिए मुगलकाल में मुस्लिम शासकों ने अपने पैगंबर को सम्मान देने के लिए इन गांवों/कस्बों का नाम ‘रसूल’ रखा होगा। उस समय इन गांवों के नामकरण का विरोध हुआ या नहीं, यह तो नहीं कह सकते लेकिन बीते सालों में उत्तर प्रदेश में ये नाम सेकुलिरज्म की गारंटी-से बन गये।
उत्तर प्रदेश देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां के जिलों के सर्वाधिक नाम अरबी या फारसी में हैं। प्रदेश के 75 जिलों में 13 जिलों के नाम अरबी या फारसी नामों पर रखे गये हैं जिसमें प्रमुख हैं-मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, अलीगढ़, आजमगढ़, फैजाबाद, फर्रुखाबाद, फिरोजाबाद, जौनपुर, मिर्जापुर, गाजीपुर, सुल्तानपुर आदि। इनमें योगी आदित्यनाथ की सरकार ने दो जिलों के नाम अभी तक के कार्यकाल में बदल दिये हैं। इलाहाबाद का नाम पुन: प्रयागराज कर दिया गया और फैजाबाद को अयोध्या में समाहित कर लिया गया। लेकिन जब ऐसा किया गया तब समाज का एक वर्ग इसके विरोध में यह कहते हुए खड़ा हो गया कि ‘योगी भारतीय संस्कृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं’।
सवाल उठता है कि आखिर भारत की संस्कृति क्या है और उस संस्कृति में ये अरबी-फारसी नाम कैसे समाहित हो गये?


दिल्ली से औरंगजेब का नाम मिटाने की मांग

दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड कर दिया गया। इस पर काफी हो-हल्ला मचा। मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले औरंगजेब के चहेतों ने इसका भीषण विरोध किया। उस रोड से एक लेन निकलती है जो आगे जाकर पृथ्वीराज रोड में मिलती है। इस लेन का नाम औरंगजेब लेन है। सड़क का नाम तो बदला लेकिन गलियारे का नाम वही है।

नदियों-पहाड़ों के नाम पर हों
लुटियन दिल्ली की सड़कों के नाम

लुटियन दिल्ली में आज भी बाबर रोड है, हुमायूं रोड है, अकबर रोड है, तुगलक रोड है। सवाल यह है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बाबर, हुमायूं और तुगलक किस भारत का परिचय दे रहे हैं? क्या वे भारतीय संस्कृति के वाहक हैं जो उनके नाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में होने जरूरी हैं? बिल्कुल नहीं। उसकी बजाय एक विस्तृत नीति बनाकर अगर लुटियन जोन में सड़कों के नाम भारत की पर्वतमालाओं और नदियों के नाम पर कर दिये जाएं तो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र एक लघु भारत में परिवर्तित हो जाएगा और पूरे देश के लोगों का जुड़ाव भी महसूस होगा।

उत्तर भारत करीब 700 साल तक इस्लामी आक्रमण झेलता रहा। ये आक्रमण अरब, तुर्क, मंगोल, फारसी और अफगान आक्रमणकारियों ने किये थे। उत्तर भारत का यह कालखंड  इन्हीं मुगल आक्रमणकारियों से लड़ते हुए गुजरा। इस दौरान इन आक्रमणकारियों ने भारत को हर प्रकार से दार-उल-हर्ब (इस्लामिक राज्य) बनाने का प्रयास किया, जबरन कन्वर्जन, कत्लेआम करके इस्लामी संस्कृति के नाम पर अपने रिवाजों का विस्तार किया। इस्लामिक आक्रमणकारियों ने हर वह प्रयास किया जिससे भारत की मूल पहचान को मिटाया जा सके। इससे भारत के दो हिस्से कटकर अलग इस्लामिक देश बने। लेकिन इतने के बावजूद भारत को मिश्रित सभ्यता वाला देश इसलिए बनाकर रखा गया ताकि आजादी के बाद भारत में जिस सांस्कृतिक क्रांति की जरूरत थी, उसे रोका जा सके।
भारत में एक सामान्य सी अवधारणा रही कि यथास्थितिवाद बनाए रखा जाए। इसके पीछे की साजिश यह थी कि हिन्दू अपनी मूल संस्कृति से कटे रहें। इसलिए अगर कोई ‘अल्लाहाबाद’ का मूल नाम प्रयागराज उसे वापस करता है तो उसे ‘हिन्दू-मुस्लिम विभाजक’ घोषित कर दिया जाता है। कहा जाता है कि ये भारत की ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ को नष्ट कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि यह तहजीब है क्या और इसकी भारत में प्रासंगिकता क्या है? क्या बिना अरबी और फारसी के शब्दों के भारत में हिन्दू-मुस्लिम मिल-जुलकर नहीं रह सकते?
असल में गंगा-जमुनी तहजीब के नाम पर इस्लामिक गुलामी को स्वीकार कराने का षड्यंत्र रचा जाता है। पाकिस्तान का स्वप्न देखने वाले अल्लामा इकबाल ने 1930 के अपने इलाहाबाद के भाषण में बहुत स्पष्ट रूप से कहा था कि ‘वे एक अलग इस्लामिक राज्य इसलिए चाहते हैं जहां हिन्दुस्तानी इस्लाम की झलक दिखाई जा सके। हम अरब की नकल करने वाली कौम के रूप में अपनी पहचान नहीं चाहते’। इकबाल ने मुस्लिम लीग के जिस जलसे में ये भाषण दिया था वहीं यह निकली अलग मुस्लिम राज्य की मांग आगे चलकर पाकिस्तान की मांग में बदल गयी थी।
सेकुलर हिन्दुओं की एक अजीब मानसिकता है कि वे अपने अपमान के लिए गढेÞ गये शब्दों में भी ‘सम्मान’ खोज लेते हैं। मसलन, इस्लाम में गाजी की उपाधि उन मुजाहिदों को दी जाती है जो ‘काफिर के नरमुंड’ सजाते थे। उन्हीं काफिरों के नरमुंडों पर खड़े होकर कोई मुजाहिद अपने आपको गाजी घोषित करता था। आज भी अगर कोई मुस्लिम इस्लाम के नाम पर किसी गैर मुस्लिम को मारता है तो उसे मौलाना गाजी की उपाधि देते हैं, क्योंकि इस्लाम के नजरिये से उसने एक ‘महान’ काम किया है। लेकिन अकेले उ.प्र. में दो जिलों के नाम ‘गाजी’ से हैं और दिल्ली की मशहूर सब्जी मंडी जिस गांव में विकसित हुई वह भी गाजी के ही नाम पर है। निश्चय ही गाजीपुर हो या गाजियाबाद, ये नाम शून्य से नहीं प्रकट हुए। अतीत में जरूर यहां बड़ी संख्या में हिन्दुओं का नरसंहार हुआ होगा, जिनको याद रखने के लिए इन जगहों के नाम में गाजी शब्द जुड़ा होगा।
तुर्क सेनापति बख्तियार खिल्जी ने 1193 में न सिर्फ हजारों हिन्दू-बौद्ध साधकों की हत्या करवा दी थी बल्कि नालंदा विश्वविद्यालय में आग लगवाकर वहां की 9 लाख पांडुलिपियां जला दी थीं। भारतीय धर्म-दर्शन को लगी यह ऐसी गहरी चोट थी जिससे उत्तर भारत शायद ही कभी उबर पाये। लेकिन उस हत्यारे बख्तियार के सम्मान में बिहार में पटना के पास ‘बख्तियारपुर’ है। पटना का बख्तियारपुर हो या फिर गुजरात का अमदाबाद, महाराष्ट्र का औरंगाबाद या तेलंगाना का हैदराबाद। ये सब हिन्दुओं के सीने में ठोंकी गयी अपमान की कीलें हैं। समय आ गया है कि केन्द्र और राज्य सरकारें हिन्दुओं के सीने में गड़ी अपमान की इन कीलों को निकाल बाहर करें।