वामपंथी-कलुष : फासीवाद का तिलिस्म और ‘हिन्दू फोबिया’

    दिनांक 15-दिसंबर-2020
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कर्नल (से.नि.) मूल भार्गव

वामपंथी और इस्लामिक जिहादी फासीवाद का हौवा खड़ा कर अपनी खतरनाक करतूतों पर परदा डालने का प्रयास करते हैं। रा.स्व.संघ जैसे राष्ट्रवादी संगठन और राष्ट्रवादी राजनीतिक दल इनकी राह की सबसे बड़ी बाधा हैं, इसीलिए वे इन्हें फासीवादी करा
र देकर आम जनमानस को डराना चाहते हैं

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वामपंथी और इस्लामिक जिहादी दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा।


आॅस्ट्रेलियाई सांसद जेनेट राइस ने अभी हाल इस्लामिक जिहादी और वामपंथियों द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम का हवाला देते हुए अपने देश की संसद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘फासीवादी संगठन’ कहा। विस्तारवादी जिहादी और वामपंथी ताकतें दुनियाभर में राष्ट्रवादी संगठनों व राष्ट्रवादी राजनीतिक दलों के विरुद्ध जनमानस को डराने के लिए बार-बार इस स्वघोषित शब्द का प्रयोग करती हैं। फासीवाद का संस्थापक बेनितो मुसोलिनी 1922 में इटली में सत्ता पर काबिज हुआ, पर 1945 में मित्र सेनाओं ने फासीवाद का समूल नाश कर दिया। मुसोलिनी को तो उसी के देश के लोगों ने गोली मार कर उलटा लटका दिया था। सवाल यह है कि जिहादी और वामपंथी मरे हुए घोड़े को बार-बार हंटर क्यों मारते हैं? क्यों ये हर मंच से फासीवाद का राग अलापते हैं?

दरअसल, फासीवाद की आड़ में इस्लामिक जिहादी और वामपंथी अपने खूनी अतीत और वर्तमान पर परदा डालना चाहते हैं। फासीवाद की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है, लेकिन कथित वामपंथी बुद्धिजीवियों ने अलग-अलग समय में या देशों में अपने हिसाब से इसकी परिभाषा, अर्थ और व्याख्या प्रस्तुत की है। सच्चाई यह है कि फासीवाद के अधिकांश उदाहरण कम्युनिस्ट और इस्लामिक देशों में ही मिलते हैं। इसमें एक पार्टी के सहारे एक तानाशाह राज-काज चलाता है। क्या चीन जैसे वामपंथी देश से भी बड़ा दुनिया में इसका कोई उदाहरण है? पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह जिया उल हक और परवेज मुशर्रफ, जिन्होंने चुनी हुई सरकार के नुमाइंदों को फांसी पर लटका कर सत्ता हथियाई, या वामपंथ का सबसे बड़ा झंडाबरदार व्लादिमीर लेनिन, जिसने अपनी राजनीति की नींव रूस के अंतिम जार निकोलस द्वितीय, उसकी पत्नी और उसके बच्चों की लाशों पर रखी। फासीवाद का इससे बड़ा उदाहरण कहां मिलेगा? अपनी इन्हीं करतूतों पर परदा डालने के लिए जिहादी और वामपंथी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों को सर्वोच्च मानने वाले नेताओं को फासीवादी कहते हैं।

मुसोलिनी का फासीवाद या हिटलर का नाजीवाद तो ज्यादा दिन नहीं चला, लेकिन इस्लामिक आतंकवाद 1,000 वर्ष से मानवता के लिए कैंसर बना हुआ है। वामपंथ पिछले 100 साल से विश्व के अनेक देशों में गरीबों को भड़का कर करोड़ों लोगों का कत्ल कर चुका है जो आज भी जारी है

फासीवाद एक उग्र विचारधारा है जो हिंसा और युद्ध का समर्थन कर विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा उत्पन्न करती है। यह स्वतंत्रता, समानता, सामाजिक न्याय, भ्रातृत्व आदि लोकतांत्रिक मान्यताओं की विरोधी है और आधुनिक जगत में इस्लामिक नेताओं का सबसे बड़ा हथियार है। पूरी दुनिया में वे एक ही राग अलाप रहे हैं कि ‘इस्लाम खतरे में है’, ‘मुसलमानों के साथ अत्याचार हो रहा है’, या मुसलमान स्वयं इस्लामिक मूल्यों से पीछे हट रहे हैं।’ अरब के शाही घराने हों या ईरान के मजहबी उपदेशक या चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग या उत्तरी कोरिया के तानाशाह, सब जगह कमोबेश फासीवादी राज कायम है। इन वामपंथी और इस्लामिक देशों में दूसरे राजनीतिक विचारों मत-पंथ के अनुयायियों की निर्मम हत्या की जा रही हैं। वामपंथ और कट्टरपंथी इस्लामी ताकतों ने मिलकर फासीवाद की नई परिभाषाएं गढ़ी हैं ताकि वे अपने विरोधियों पर झूठे आरोप लगा कर अपने कुकर्मों से दुनिया का ध्यान भटका सकें। एक वामपंथी विचारक स्टैनले पायन ने तो हर उस व्यक्ति को फासीवादी करार दिया जो कम्युनिस्ट विरोधी हो। ठीक उसी तरह, जैसे कट्टर इस्लामी हर गैर-मुस्लिम को ‘काफिर’ कहते हैं। इसलिए इनके द्वारा घोषित ‘फासीवादी’ या ‘काफिर’, उसके परिवार व बच्चों को कत्ल करने को ‘मानवता’ के हित में जायज ठहराया जाता है।  

मुसोलिनी का फासीवाद या हिटलर का नाजीवाद तो कम समय में ही समाप्त हो गया, लेकिन इस्लामिक आतंकवाद 1,000 वर्ष से मानवता के लिए कैंसर बना हुआ है। वामपंथ पिछले 100 साल से विश्व के अनेक देशों में गरीबों को भड़का कर करोड़ों लोगों का कत्ल कर चुका है और यह आज भी जारी है। लेकिन वामपंथी और इस्लामिक जिहादी रा.स्व.संघ जैसे शांतिप्रिय संगठन के विरुद्ध दुष्प्रचार कर रहे हैं, जिसका इतिहास नौ दशक से ज्यादा पुराना है और देश की किसी भी अदालत में इसके विरुद्ध हिंसक गतिविधि का मामला तक दर्ज नहीं है। ये कभी स्टालिन का नाम लेते हैं, जिसने अपने ही देश के करोड़ों लोगों का कत्ल किया पर दुनियाभर में कत्लेआम मचाने वाले 150 से अधिक इस्लामिक आतंकी संगठनों का भी जिक्र नहीं करते। ये गांधी वध पर तो चिल्लाते हैं (जिसका रा.स्व.संघ से कोई संबंध नहीं है), पर नक्सलियों द्वारा निर्दोष लोगों की हत्या पर कुछ नहीं बोलते।

जेनेट राइस जैसे दोगले जिहादी वामपंथी संसद में कभी अबू बकर अल बगदादी के विरुद्ध आवाज नहीं उठाते, जिसने इस्लामिक विचारधारा में पीएचडी होने के बावजूद इस्लाम के नाम पर सिर कलम करने, सामूहिक बलात्कार और दास प्रथा जैसे घिनौने कार्य 21वीं सदी में किए। वामपंथी व कट्टरपंथी मुसलमान पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह मुशर्रफ के विरुद्ध भी मुंह नहीं खोलते, जिसने लंबे समय तक पाकिस्तान में लोकतंत्र का गला घोंट कर रखा और खुलेआम ओसामा बिन लादेन जैसे खूंखार आतंकी को अपना नायक बताया। ये उस पाकिस्तानी मंत्री को भी फासीवादी नहीं कहते, जिसने भारत पर परमाणु हमले की धमकी देते हुए कहा था कि इससे केवल हिन्दू मारे जाएंगे। जिहादी और वामपंथी विचारधारा के समर्थकों को लोकतंत्र से चिढ़ है, इसलिए वे लगातार इसे कमजोर करने के प्रयास में जुटे रहते हैं। दुनिया के किसी भी देश पर निगाह डालिए, ये दोनों घिनौनी ताकतें वहां लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने में जुटी दिखेंगी। मानवाधिकार का लबादा ओढ़ कर मानव अधिकारों का हनन करने में ये महिर हैं।

सच्चाई यह है कि फासीवाद से ज्यादा खतरा इस्लामिक आतंकवाद से है, जो हाथों में खूनी खंजर लिए सिडनी, पेरिस, लंदन, मुंबई और दिल्ली की सड़कों पर घूम रहा है। ऐसा ही खूनी खेल चीन से लेकर ब्राजील, मेक्सिको या मध्य भारत में वामपंथियों द्वारा खेला जा रहा है। जेनेट राइस जैसे राजनीतिक अपने देश की संसद में झूठ बोलकर इनके खतरनाक इरादों को छिपाने की कोशिश करते हैं तथा शांतिप्रिय हिन्दू संगठनों व राष्ट्रवादी राजनीतिक दलों को दुनियाभर में बदनाम करने का प्रयास करते रहते हैं। राइस जैसे राजनीतिकों के ज्ञान की खिड़की बहुत छोटी है, जो केवल जिहादी वामपंथी गठजोड़ के शोरूम में ही खुलती है। लेकिन विश्व अब आगे बढ़ चुका है और बॉबी फेरेल और स्कॉट मॉरिसन जैसे परिपक्व नेता उनके इस कुत्सित खेल को समझते हैं। लोकतांत्रिक देशों में वामपंथी और कट्टरपंथी इस्लामिक ताकतों को लगातार मुंह की खानी पड़ रही है, क्योंकि भारत, आॅस्ट्रेलिया या इंग्लैंड जैसे देशों में लोग मजबूती से शांतिप्रिय विकासवादी नेताओं के साथ खड़े हैं। जेनेट राइस जैसे नेता जीत तो पर्यावरण और विश्व शांति जैसे मुद्दों व लुभावने वादों के सहारे दर्ज करते हैं, पर अंतत: अपने असली एजेंडे पर आ जाते हैं। 

समय आ गया है जब ऐसे नेताओं और इनके दूषित इरादों की हर स्तर पर पोल खोली जाए और विश्व को बताया जाए कि फासीवाद के भूत को बार-बार जिंदा करके ये केवल अपने मित्र संगठनों के खूनी इरादों पर परदा डाल रहे हैं।