भाग्यनगर ऐसे बना हैदराबाद

    दिनांक 15-दिसंबर-2020
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पिछले कई साल से हैदराबाद का नाम बदलकर भाग्यनगर करने की चर्चा चल रही है। अनेक संगठन और लोग इसके पक्ष में तर्क दे रहे हैं, तो कुछ लोग विरोध भी कर रहे हैं। आइए जानते हैं भाग्यनगर से जुड़े कुछ ऐतिहासिक तथ्य
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ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव का प्रचार करने से पहले भाग्यलक्ष्मी मंदिर में पूजा-अर्चना करते केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह    (फाइल चित्र)

वास्तव में देखा जाए तो विभिन्न निजाम और 1948 के बाद कांग्रेसी सरकारों द्वारा इतिहास से इस शहर का हिंदू नाम मिटाने के सभी प्रयासों के बावजूद इसका ‘भाग्यनगर’ नाम मिटाया नहीं जा सका है। यह हमेशा लोगों की याद में बना रहा। पुराने हैदराबाद राज्य में वर्तमान तेलंगाना, आज के कर्नाटक के तीन जिले और वर्तमान महाराष्ट्र के पांच जिले शामिल थे और इसके कई कस्बों के नाम मुस्लिम नामों में बदले गए थे। फिर भी, उन कस्बों के लोग उन्हें उनके पुराने नामों से पुकारते रहे, जो उनकी सच्ची विरासत है। भारतीय इतिहास की बहुत-सी दूसरी बातों की ही तरह, यहां भी मौखिक परंपराएं प्रबल थीं। उदाहरण के लिए, इंदूर शहर, जिसे निजामाबाद नाम दिया गया था, को इंदुर के रूप में संदर्भित किया जाता है; और पलामूर को भी निजामशाही के दौरान दिए गए आधिकारिक नाम महबूबनगर के बजाय उसी नाम से पुकारा जाना जारी है।

कई इतिहासकारों ने दशकों से भागमती/भाग्यमती के नाम पर बने शहर भाग्यनगर की सजीव स्मृति को भुलाने की कोशिश की है, लेकिन जनश्रुति में यह ज्यों का त्यों बना हुआ है। कई शोधकर्ताओं ने पुराने ऐतिहासिक अभिलेखों से पर्याप्त और निर्णायक सबूत निकाले हैं, जिनसे यह विवाद समाप्त हो जाना चाहिए। और, न केवल हैदराबाद का नाम बदलकर भाग्यनगर करना चाहिए, बल्कि दक्षिण में मुस्लिम आक्रमण से बहुत पहले संपन्न शहरों में रहे पुराने हैदराबाद राज्य के अन्य सभी शहरों का भी नाम परिवर्तन करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए। आइए, शोधकर्ताओं और इतिहासकारों द्वारा खोजे गए कुछ सबूतों को देखें।

भाग्यनगर के संवित केंद्र के डॉ. राहुल ए. शास्त्री ने आधुनिक शहर की स्थापना पर एक आधिकारिक शोधपत्र में लिखा है, ‘‘भागमती एक शाही दरबार से जुड़ी महिला थी, जबकि सामने आए अन्य सबूतों से पता चलता है कि उसकी शादी कुली कुतुब शाह से हुई थी और इसलिए वह रानी थी। उसकी वास्तविक स्थिति जो भी रही हो, इसमें कोई संदेह नहीं है कि भागमती और राजधानी भाग्यनगर हमेशा एक वास्तविकता थे।’’

हैदराबाद की स्थापना 1591-92 ईस्वीं में चारमीनार के निर्माण के साथ मुहम्मद कुली कुतुब शाह ने की थी। उसके पिता इब्राहिम कुली कुतुब शाह ने विजयनगर में सात साल (1543-50 ई.) निर्वासन में बिताए थे, जबकि उसका भाई गोलकुंडा का शासक था। कहा जाता है कि विजयनगर में उसका विवाह एक राजकुमारी भागीरथी से हुआ था। अपने निर्वासन के दौरान, इब्राहिम कुली को तेलुगू भाषा से प्रेम हो गया और उसने अपने दरबार में कई तेलुगू विद्वानों जैसे-अद्दनकी गंगाधर, कोंडुकुरु रुद्र और पोन्नगंती तेलंगाना— को आमंत्रित किया। अद्दनकी का कहना है, उसके दरबार में वेदों, पुराणों और संज्ञानात्मक विज्ञान में निपुण पुरुषों का आना-जाना लगा रहता था (शेरवानी 1968-75)। उसने हिंदुओं और तेलुगू लोगों को उच्च श्रेणी के पद दिए थे। ये विद्वान शाह पर अपना स्नेह लुटाते थे और उसे ‘मलकीभरामा’ और ‘अभिराम’ कहते थे। वे लोग तब भी शाह के साथ रहे जब वह भी अन्य सुल्तानों के साथ विजयनगर को नष्ट करने के अभियान में शामिल हुआ था। कुतुब शाहियों ने खास तौर पर तेलुगू भाषी क्षेत्रों को अपने राज्य में मिलाने का प्रयास किया था। इन्हीं परिस्थितियों के बीच मोहम्मद कुली कुतुब शाह का जन्म हुआ था। उसके पिता ने 1578 ई. में मुसी नदी पर एक पुल (पुराना पुल) बनवाया था। इस पुल से परे, ‘मुख्यत: ब्राह्मण’ बस्ती चिचलाम है, जहां शाह चिराग नाम के सूफी ने डेरा डाला था। (शेरवानी 1967-74)। इस ब्राह्मण बस्ती के पास या आस-पास अन्य सामाजिक समूह और काफी आर्थिक गतिविधियां रही होंगी, क्योंकि शेरवानी का तर्क है कि मोहम्मद कुली को ‘क्षेत्र की बढ़ती आबादी के बारे में जरूर बताया गया होगा।’ (वही)।

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भागमती की शादी की एक समकालीन कुतुब शाही पेंटिंग, जिसके नाम पर भाग्यनगर का नाम पड़ा

भाग्यनगर का साक्ष्य
जिस जगह पर चारमीनार बनाई गयी थी और हैदराबाद की स्थापना की गई थी, वहां की आबादी पहले से ही बढ़ रही थी, कई सामाजिक समूहों की उपस्थिति थी और काफी आर्थिक गतिविधि थी। शहर का कालक्रमानुगत नाम फारसी में ‘फरखुंदा बुनियाद’ रखा गया था जिसका अर्थ है तेलुगू और संस्कृत का शब्द ‘भाग्य’ (लूथर 2016)। स्थानीय लोकश्रुतियों के अनुसार मोहम्मद कुली को भाग्यमती नाम की देवदासी से प्रेम हो गया था जो भाग्यलक्ष्मी मंदिर में देवदासी थी। उस पर मुग्ध होकर उसने नए शहर का नाम भाग्यनगर रखा। उसी काल में 1594 ई. के आसपास फैजी द्वारा सम्राट अकबर को लिखे गए एक पत्र में भी जनश्रुतियों को प्रतिध्वनित किया गया था, जिसमें कहा गया था, ‘‘अहमद कुली (एसआईसी) शिया मजहब में डूबा हुआ है, और उसने अपनी पुरानी प्रेमिका (माशूका-ए-कदीमी) देवदासी (फाहिशा-ए-कुह्ना) भागमती के नाम पर एक शहर भागनगर बनाया है।’’(शेरवानी)। सन् 1610 में फरिश्ता ने अपनी पुस्तक ‘दकन का इतिहास’ में मोहम्मद कुली के बारे में लिखा है, ‘‘अपने पिता की मृत्यु पर यह राजकुमार 12वें साल में गोलकुंडा पर शासनारूढ़ हुआ ... गोलकुंडा की आबोहवा उसके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं थी, सो उसने लगभग आठ मील की दूरी पर एक शहर बसाया, जिसे उसने अपनी प्रेमिका और दरबार की मशहूर नर्तकी भाउग के नाम पर भाउगनगर नाम दिया था; लेकिन बाद में अपनी दीवानगी पर शर्मिंदा होकर उसने इसका नाम हैदराबाद कर दिया था।’’(स्कॉट 1784: 409)।


भाग्यलक्ष्मी और भाग्यनगरभाग्यलक्ष्मी प्राचीन समय में ग्राम देवी का एक छोटा सा मंदिर था जिसके आसपास बसाहट हिन्दुओं की थी। मंदिर पर अगाध श्रद्धा के कारण स्थानीय युवतियों के नाम देवी भाग्यलक्ष्मी के नाम पर भागमती, भाग्यदेवी, भागलेखा, भाग्यसुंदरी आदि रखे जाते थे। भागमती (देवदासी) का विवाह कुली कुतुब शाह से हुआ था परंतु वह कन्वर्ट नहीं हुई थी। कुतुबशाह ने भागमती से अपने अनन्य प्रेम के चलते इस पूरे स्थान का नाम भागनगर/भाग्यनगर रखा था।



संभवत: 1614 में लिखी गई पुस्तक ‘रिलेशंस आॅफ गोलकुंडा’ में हैदराबाद की स्थापना के दो दशक बाद गोलकुंडा की एक अजीब परम्परा का वर्णन है। इसमें कहा गया है, ‘‘हर साल अप्रैल के महीने में पूरे राज्य की देवदासियों को बागनगढ़ की यात्रा करनी होती है, जहां उन्हें पहले मुस्लिम राजा की मृत्यु के उपलक्ष्य में नृत्य के लिए बुलाया जाता है। यह बात मुझे बहुत अजीब लगती है।’’(लूथर 2016 में)। किसी मुस्लिम शासक के अधीन प्रचलित यह प्रथा केवल तभी समझ में आती है जब हैदराबाद का नामकरण मूल रूप से देवदासी भाग्यलक्ष्मी के नाम पर किया गया हो। भाग्यनगर नाम खत्म करके इसे हैदराबाद नाम देने का एक कारण यह भी हो सकता है कि भाग्यमती ने सुल्तान के साथ अपने संबंध के बावजूद कन्वर्जन नहीं किया था। अगर उसने कन्वर्जन करके हैदर या कोई और नाम रख लिया होता, तो उसके नाम पर शहर का नामकरण करने में कोई शर्म की बात नहीं होती। इस प्रकार ऐसा लगता है कि भाग्यमती अपने शाही प्रेमी के बावजूद मृत्युपर्यंत हिंदू रही। वास्तव में, कांस्टेबल ने बर्नियर को लिखे फुटनोटों में खफी खान को उद्धृत करते हुए लिखा है कि भाग्यमती की मृत्यु के बाद ही शहर का नाम बदलकर हैदराबाद रखा गया था। (बर्नियर 1916 : 19-2)।

1585 ई. में युवा मुहम्मद कुली को अधिक रूढ़िवादी मुसलमानों के समर्थन की आवश्यकता थी और उसने हाल ही में ईरान से आए मीर मुमीन आस्त्राबादी को पेशवा के रूप में नियुक्त किया था। संभवत: मीर मुमीन के अच्छे संपर्कों के चलते ही ईरान के शाह अब्बास ने 1603 ई. में दूतावास खोलने पर सहमति दे दी थी। लेकिन ईरानियों के ऐसे सुल्तान से प्रभावित होने की संभावना नहीं थी, जिसकी राजधानी का नाम किसी हिंदू देवदासी के नाम पर रखा गया हो। इसीलिए 1584 के बाद कुतुब शाहियों द्वारा जारी किया जाने वाला पहला सिक्का 1603 ई. में ‘दारउस्सल्तनत हैदराबाद’ से जारी किया गया था। इसी वर्ष यहां ईरानी दूतावास खुला था। भाग्यनगर आधिकारिक रूप से बिसरा दिया गया। लोकधारणा है कि मीर मुमीन ने भाग्यमती की कहानी को दबा दिया। भाग्यनगर नाम राजनीतिक रूप से सुविधाजनक नहीं था। सिक्कों, फरमानों और आधिकारिक संदेशों में उसे इस्तेमाल नहीं किया गया। लेकिन लोग शहर को भाग्यनगर कहते रहे। ‘भाग्यनगर’ नाम का कोई आधिकारिक खंडन भी नहीं किया गया था, क्योंकि इसकी वजह से लोगों के मन में इसके प्रति स्नेह कम हो सकता था और दूसरी बात कि शायद सुल्तान अपने पहले प्यार के प्रति वफादार था। शहर के पहले नाम फारसी के ‘फरखुंदा बनियाद’ से भी इस बात का पता लगता है। फारसी में फरखुंदा का अर्थ संस्कृत और तेलुगू में भाग्य है। ¹

राज्य अभिलेखागार में 1637 का एक विरासत दस्तावेज मिला है जिसे भागनगर के काजी जहीरुद्दीन ने जारी किया था (लूथर 2016)। 1672 में अब्बे कैरे ने इस शहर को बागनगर कहा था (वही)। इसके अलावा 1656-1668 के अपने यात्रा वृत्तांत में फ्रांस्वा बर्नियर ने मीर जुमला के एक पत्र का अनुवाद किया है जिसका उद्देश्य सुल्तान से विश्वासघात करके औरंगजेब से सम्पर्क करना था। उस पत्र में सुल्तान के निवास स्थान का उल्लेख करते हुए लिखा गया, ‘‘बागनगोर में, जहां तक उनके बागनगोर का महल है जहां वह आमतौर पर रहते हैं, के इर्द-गिर्द कोई दीवाल नहीं है, कोई खाई नहीं है और कोई किलेबंदी नहीं है।’’(बर्नियर 1916 : 19-20)। अंत में प्रामाणिक माना जाने वाला घोरपडे का पत्र है (क्रुत्जर 2008: 289), जिसमें ‘भागनगर’ को संदर्भित किया गया है, और जो शिवाजी तथा कुतुब शाहियों के बीच हुए समझौतों का उल्लेख करता है। इस पत्र का काल 1670 हो सकता है। थेवेनॉट ने 1665-66 ई. में लिखा था, ‘‘इस राज्य (गोलकुंडा) की राजधानी को बागनगर कहा जाता है; फारसी इसे ऐदर आबाद कहते हैं।’’
भाग्यनगर और भाग्यमती की कहानी आसिफ जही काल में पुनर्जीवित हुई। 1884 में सैयद हुसैन बिलग्रामी और विल्मोट ने कहा, ‘‘यह शहर राजा की हिंदू प्रेमिकाओं में से एक के नाम पर भागनगर कहा जाता था..और उसकी मृत्यु के बाद मुहम्मद कुली ने इसका नाम बदलकर हैदराबाद कर दिया था, फिर भी आज तक यहां के मूल निवासी, विशेष रूप से हिंदू, शहर को भागनगर कहते हैं।’’(लूथर 2016)। इसी तरह ग्रिबल (1896 : 209) भी इस बात की गवाही देते हैं कि हैदराबाद का पुराना नाम भागनगर था, जिसे सदी के अंत में मोहम्मद कुतुब शाह ने अपनी पसंदीदा पत्नी या प्रेमिका भागमती के नाम पर रखा था।

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सुल्तान कुली

चित्रात्मक और दस्तावेजी प्रमाण

कुतुब शाह और उनकी हिंदू पत्नी भागमती की शादी के जुलूस की एक समकालीन कुतुब शाही पेंटिंग है, जिसके नाम पर भाग्यनगर का नाम है। यह हिंदू तौर-तरीके का विवाह था जिसमें महिलाएं आरती (तेलुगू में हारती) कर रही हैं। यह चित्र 1650 ई. में उनके पोते ने बनवाया था। (पेंटिंग का स्रोत: एशमोलियन संग्रहालय)

कुतुब शाही वंश की स्थापना सुल्तान कुली कुतुब मुल्क (1470 ई.-1543 ई.) ने की थी। वह ईरान के हमादान से भारत आया था। भारत उस समय बेशुमार दौलत और असीम अवसरों का देश था। जब उसने पहली बार भारत के पश्चिमी तट पर स्थित बंदरगाह शहर चौल में भारतीय भूमि पर कदम रखा, तो उसने वहां की काली मिट्टी का एक टुकड़ा उठा कर प्रतिज्ञा की थी कि वह पूरे भारत में शिया मजहब की स्थापना करेगा।

सुल्तान कुली ने अपने कार्यकारी जीवन की शुरुआत बहमनी राजा शहाबुद्दीन महमूद की सेवा से की थी। यहां उसकी तेजी से तरक्की हुई और उसे तेलिंग देश का राज्यपाल बना दिया गया था। सन् 1518 में बहमनी सुल्तान की मृत्यु के बाद सुल्तान कुली ने खुद को गोलकुंडा के स्वतंत्र शासक के रूप में स्थापित किया। सेकुलर इतिहासकार हमें विश्वास दिलाते रहे हैं कि गोलकुंडा किले का निर्माण सुल्तान कुली ने 16वीं शताब्दी में करवाया था और इसके 500 वर्ष पूरे होने के समारोह भी आयोजित किए गए थे। किंतु गोलकुंडा का किला सुल्तान कुली से बहुत पहले से मौजूद था, इसे काकतीय साम्राज्य के लोगों ने बनवाया था। वास्तव में, मुगल इतिहास जैसे कि मासीर-ए-आलमगिरी और मुन्तखब अल लुबाब में स्वीकार किया गया है कि यह किला पहले हिंदू राजाओं के हाथ में था और बाद में मुस्लिम राजाओं के हाथ लगा। पुरातत्वविद् मनिका सरदार के अनुसार गोलकुंडा  का किला कम से कम 13वीं शताब्दी का है। इसकी आंतरिक दीवारें और ‘बाला हिस्सार’ (चोटी) उस काल के हैं।

जब सुल्तान कुली ने गोलकुंडा पर कब्जा कर लिया, तो उसने वहां कई ‘बदलाव’ किए। उसने थोड़ी-बहुत किलेबंदी करवाई। गोलकुंडा की जामा मस्जिद में आज भी हिंदू मंदिर के निशान देखे जा सकते हैं। वहां काकतीय शैली के मंदिरों की सजावट है। उसके द्वार मार्ग पर स्तंभ, रत्न तथा वल्लिजम साखा देखे जा सकते हैं। पहाड़ी के मंदिर को बाद में तारामती मस्जिद में बदल दिया गया था। अक्कन्ना मदन्ना मंदिर को औरंगजेब ने नष्ट कर दिया था। किले के अंदर स्थित जगदम्बा गुफा मंदिर आज भी है।

सुल्तान कुली की हत्या उसके बेटे जमशेद कुली ने उसी मस्जिद के अंदर की थी जो उसने हिंदू मंदिर के स्थान पर बनवाई थी। जमशेद का भाई इब्राहिम कुली गोलकुंडा से भागकर विजयनगर चला गया था जहां हिंदू राजा रामराय ने उसे शरण दी थी। वहां उसने सात साल बिताए और बाद में उसे जागीर दी गई थी।

राजा रामराय मुसलमानों के साथ अच्छा व्यवहार रखते थे, इसलिए इब्राहिम कुली को रामराय के राज्य में काफी सहज अनुभव होता था। उसका विवाह भागीरथी नाम की विजयनगर की एक राजकन्या से हुआ था। सात साल बाद जमशेद कुली की मृत्यु हो गई और इब्राहिम ने गोलकुंडा वापस जाकर राज्य ग्रहण कर लिया। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि उत्तराधिकार के युद्ध में, इब्राहिम कुली को रामराय के तत्वावधान में जबरदस्त हिंदू समर्थन मिला। गोलकुंडा के रास्ते में कोइलकोंडा किले में, हिंदुओं ने उनके प्रति निष्ठा और समर्थन का वादा किया, ‘‘हम इब्राहिम कुली को समर्थन देते हैं। हममें से जो भी वादा तोड़ेगा, वह गायों और काशी के ब्राह्मणों की हत्या के बराबर पाप का भागी होगा।’’ इब्राहिम कुली को बाद में उन्हें मलकीभा (राम) कहते हुए उसकी तुलना (मलिक) भगवान राम के साथ की गई। इस तरह के समर्थन के साथ, इब्राहिम ने स्वाभाविक रूप से सिंहासन हासिल किया और राजा बन गया। हालांकि, उसी इब्राहिम ने बाद में दक्कन के अन्य मुस्लिम सुल्तानों के साथ हाथ मिलाया और 1565 में खुद को शरण देने वाले रामराय के खिलाफ तल्लिकोटा में युद्ध करते हुए विजयनगर साम्राज्य पर हमला किया! तल्लिकोटा युद्ध में रामराय की गिलानी बंधुओं के नेतृत्व वाली मुसलिम रेजिमेंट ने गद्दारी करते हुए हमलावर सुल्तानों से हाथ मिला लिया था। इससे रामराय युद्ध हार गया और युद्ध के मैदान में ही उसका सिर काट लिया गया था। इसी के साथ शक्तिशाली विजयनगर साम्राज्य का पतन हो गया। युद्ध के बाद दक्कन के सुल्तानों ने विजयनगर को छह महीने तक झकझोरा। उन्हें जो कुछ भी मिला, उसे लूटा और जलाया। रामराय के ‘फरजंद/बेटे’ इब्राहिम ने अपने बहनोई और एक मंत्री को खजाने और धन की तलाश में लगाया था। विजयनगर को नष्ट करके कुतुब शाही द्वारा लूटी गई सम्पत्तियां इतनी अधिक थीं कि लगभग 30 साल बाद उस लूट का एक हिस्सा हैदराबाद का निर्माण शुरू करने के लिए काफी था। हां, मुहम्मद कुली ने हैदराबाद का निर्माण विजयनगर में अपने पिता द्वारा लूटी गई सम्पत्तियों से किया था।

इब्राहिम कुली का उत्तराधिकारी उसका बेटा मुहम्मद कुली था और उसने भागमती से शादी की जिसके नाम पर नए शहर का नाम भाग्यनगर पड़ा। उसकी मृत्यु के बाद ही इसका नाम हैदराबाद रखा गया। कुली ने खुद कहा है कि भागमती से शादी के समय वह हिंदू थे। इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि भागमती ने कभी कन्वर्जन किया। इसी से पता चलता है कि उसकी कोई कब्र क्यों नहीं है और शादी में हिंदू रीति-रिवाज क्यों दिखाए गए हैं। भागमती का जबरदस्त प्रभाव रहा होगा। उसके साथ 1,000 सैनिकों की टुकड़ी रहती थी। कुली ने उसे ‘हैदर महल’ (बहादुर प्रिय) नाम भी दिया था। हैदराबाद और भागनगर दोनों ही नाम उसके नाम पर है।

शेरवानी और फारुकी जैसे कुछ इतिहासकारों ने भागमती की ऐतिहासिकता को नकारने के लिए धोखाधड़ी की है। फ्रांसीसी यात्रियों का हवाला देते हुए, उन्होंने दावा किया कि भागनगर में ‘भाग’ का अर्थ बगीचों से है। वास्तव में, वहां कोई बाग नहीं था, क्योंकि पानी की कमी के कारण, बागान विकसित करने के कुली के प्रयास विफल हो गए थे। बहुत बाद में, बशीरबाग (बाग-ए-आम) और हुसैन सागर के पास बाग लगाए गए। वास्तव में, फ्रांसीसी यात्री ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि कुली ने शहर का नाम भागनगर अपनी पत्नी के अनुरोध पर रखा था। भाग्यनगर का नाम भाग्यमती के नाम पर रखा गया था न कि बागों के नाम पर। इस तथ्य से भी सिद्ध होता है कि सिक्कों पर हैदराबाद का वर्णानुक्रम नाम ‘फरखुंदा बनियाद’ है। फारसी में फरखुंदा का अर्थ है भाग्य, न कि ‘बाग’। भागमती के अस्तित्व के बारे में समकालीन मुगल साक्ष्य भी हैं। अपने जीवनकाल के दौरान, अबुल फजल का भाई 1591 में हैदराबाद आया था। उसकी गवाही भागमती के अस्तित्व को साबित करती है और उन लोगों के लिए एक तमाचा है जो उसकी ऐतिहासिकता को नकारते हैं। निजामुद्दीन नाम के एक अन्य समकालीन इतिहासकार ने भी अपने जीवनकाल में 1594 में भागमती के बारे में लिखा था। उनका दावा है कि हैदराबाद/भाग्यनगर का नाम भाग्यमती के नाम पर रखा गया था।
(लेखक सेंटर फॉर साउथ इंडियन स्टडीज में सीनियर एसोसिएट हैं)