महाभारत में ‘भूमण्डल’

    दिनांक 17-दिसंबर-2020
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प्रो. भगवती प्रकाश

महाभारत एवं पद्मपुराण जैसे 5,000 साल पुराने ग्रंथों में पृथ्वी के स्वरूप का उल्लेख मिलता है। 11वीं सदी में रामानुजाचार्य द्वारा निर्मित पृथ्वी का पहला मानचित्र आज के महाद्वीपों वाली पृथ्वी के मानचित्र के समान है। महाभारत में संजय ने ही सबसे पहले पृथ्वी के गोलाकार होने की बात कही थी
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महाभारत के श्लोक के अनुरूप एक खरगोश और दो पत्तों का चित्र
बाएं चित्र को उलटा करने पर यह पृथ्वी के मौजूदा  मानचित्र जैसा दिखता है

पृथ्वी की धुरी अथवा अक्ष परिवर्तन एवं अयन गति के वैदिक सन्दर्भों की चर्चा की जा चुकी है। अन्तरिक्ष से पृथ्वी के विहंगम चित्र का 5,000 वर्ष प्राचीन ग्रन्थ महाभारत एवं पद्म पुराण आदि में आए वर्णन के अनुरूप 11वीं सदी में रामानुजाचार्य द्वारा एक चित्र बनाया गया, वह पृथ्वी का सबसे पहला और शुद्ध मानचित्र है। इस मानचित्र को प्रथम बार आदि शंकराचार्य ने तथा उसकी एक जीर्ण प्रति से रामानुजाचार्य ने 11वीं सदी में फिर से बनाया था।  
महाभारत एवं पद्म पुराण के श्लोक महाभारत में संजय के सन्दर्भ से स्पष्ट लिखा है कि दर्पण में एक विशाल खरगोश और दो पीपल के पत्तों की उलटी छवि जैसी यह पृथ्वी चन्द्रमण्डल से देखने
पर दिखलाई देती है। वह श्लोक निम्नानुसार है-
सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन।
परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थित:।। (महाभारत 6/5/13)
यथा हि पुरुष: पश्येदादर्शे मुखमात्मन:।
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले।।     (महाभारत 6/5/16)
द्विरशस्तु तत: प्लक्षों द्विरंश: शाल्मलिर्हान।
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।।  (भीष्म पर्व, महाभारत 6/5/17)

अर्थ- संजय धृतराष्ट्र को कहते हैं कि, हे कुरुनन्दन! सुदर्शन नामक यह द्वीप अर्थात् पृथ्वी एक चक्र की भांति गोलाकार स्थित है और जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखाई देता है। इसके दो अंशों (भागों) में पिप्पल और दो अंशों में विशाल शश (खरगोश) दिखाई देता है।


पद्म पुराण और कुछ अन्य पुराणों में भी ऐसे उद्धरण हैं-
अचिंत्या: खलु ये भावास्तान्न तर्केण साधयेत्।
सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु मुनिपुंगवा:।। 12 ।।
परिमंडलो महाभागा द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थित:।
नदीजलपरिच्छिन्न: पर्वतैश्चाब्धिसन्निभै:।। 13 ।।
पुरैश्च विविधाकारै रम्यैर्जनपदैस्तथा।
वृक्षै: पुष्पफलोपेतै: संपन्नो धनधान्यवान्।। 14 ।।
लवणेन समुद्रेण समंतात्परिवारित:।
यथा हि पुरुष: पश्येदादर्शे मुखमात्मन:।। 15 ।।
एवं सुदर्शनो द्वीपो दृश्यते चक्रमंडल:।
द्विरंशे पिप्पलस्तस्य द्विरंशे च शशो महान्।। 16 ।।     (पद्म पुराण 3/12)

विवेचन व सटीक चित्रण
उपरोक्त संरचना को कागज पर बनाने पर पृथ्वी का आज के महाद्वीपों की आकृतियों से युक्त सही मानचित्र बन जाता है। श्लोक में परिमण्डल अर्थात् पृथ्वी के गोलाकार होने की बात भी तब 5,000 वर्ष पूर्व ही संजय ने कह दी थी। (देखें चित्र 1 की दर्पण में छवि आज के विश्व मानचित्र के अनुरूप है, जो चित्र क्रमांक 2 में है।)
रामानुजाचार्य द्वारा 11वीं सदी में बनाए गए उपरोक्त चित्र से कुछ लोग असहमत हों, तब भी महाभारत के इस 5,000 वर्ष प्राचीन श्लोक में पृथ्वी के गोल होने और वर्तमान प्रचलित मानचित्र के अनुरूप होने का विवरण भारतीय हिन्दुओं के प्राचीन ज्ञान, महाभारत आदि ग्रन्थों की प्रामाणिकता और संजय की दिव्य दृष्टि की पुष्टि करता है। 

सन्दर्भ
धृतराष्ट्र को सम्पूर्ण महाभारत युद्ध की यथावत जानकारी दने के लिए कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जी ने धृतराष्ट्र के निजी सचिव और सारथी संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी। संजय को यह दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाने पर धृतराष्ट्र ने कौतूहलवश संजय से पूछा कि तुम्हें ऊपर आसमान से यह पृथ्वी कैसी दिखलाई देती है। इस प्रश्न के उत्तर में संजय ने उपरोक्त श्लोकों में यह जानकारी दी। वस्तुत: सम्पूर्ण भूमण्डल का विहंगम दृश्य पृथ्वी से कम से कम 2.50 लाख किलोमीटर ऊपर जाने पर ही दिखाई दे सकता है। पृथ्वी से चन्द्रमा की औसत दूरी भी 3.84 लाख किलोमीटर और न्यूनतम दूरी 3.63 लाख किलोमीटर है। इसीलिए संजय चन्द्रमण्डल की ऊंचाई से पृथ्वी के स्वरूप का वर्णन करता है, जो सर्वथा खगोल विज्ञान सम्मत कथन है।

इन श्लोकों से स्पष्ट है कि वेद व्यास जी से संजय को दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई थी। संजय द्वारा चन्द्रमण्डल का सन्दर्भ देने से स्पष्ट हो जाता है कि उसे तब पता था कि पृथ्वी का विहंगम दृश्य चन्द्रमण्डल जितनी ऊंचाई तक जाने पर ही दृष्टिगोचर हो सकता है। संजय ने उस दिव्य दृष्टि से जो पृथ्वी का वर्णन किया, वह हमारे भूमण्डल का आज का सटीक दृश्य है। इस प्रकार हमारे प्राचीन इतिहास ग्रन्थों यथा महाभारत और पुराणों के उद्धरण तथ्यात्मक तथा विज्ञानसम्मत हैं।
 (लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)