डॉ. अरुण प्रकाश अवस्थी की जयंती (17 दिसंबर) पर विशेष : इन्द्रधनुषी लेखनी में पगा जीवन

    दिनांक 17-दिसंबर-2020
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डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी

साहित्य की विविध विधाओं (कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, संस्मरण, रेखाचित्र, निबंध) में स्तरीय एवं साधिकार लेखन के बावजूद डॉ. अरुण प्रकाश अवस्थी की छवि एक कवि के रूप में ही रही। काव्य के विविध रूपों- गीत, गजल, दोहा, मुक्त छंद, छंदबद्ध कविताओं की रचना द्वारा उन्होंने सम्मान अर्जित किया

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प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. अरुण प्रकाश अवस्थी को साहित्यिक संस्कार अपनी जन्मभूमि से प्राप्त हुए। उनका जन्म 17 दिसम्बर, 1938 को मौरावां, उन्नाव (उ़ प्ऱ) में हुआ था। जन्मभूमि से प्राप्त उनके इस साहित्यानुराग को कोलकाता के साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश ने न केवल पुष्पित-पल्लवित किया, अपितु समुचित दिशा देकर अवस्थी जी को साहित्य-सृजन की ओर प्रवृत्त किया।

1962 में स्व. अवस्थी ने डॉ. रामकुमार त्रिपाठी के साथ मिलकर कलकत्ता में ‘ज्योत्स्ना’ नामक साहित्यिक संस्था की स्थापना की। इस संस्था के तत्वावधान में होने वाली मासिक काव्य-गोष्ठियों के माध्यम से डॉ. अवस्थी की काव्य-प्रतिभा को पुष्ट आधार प्राप्त हुआ। परवर्ती काल में ‘विश्वमित्र’ दैनिक के ‘काव्य-कला’ शीर्षक साप्ताहिक स्तंभ में काव्य-रचनाओं द्वारा तथा उसके बाद ‘सन्मार्ग’ दैनिक के ‘चकल्लस’ स्तंभ में नियमित काव्य-प्रस्तुतियों के माध्यम से डॉ. अवस्थी ने काव्य-प्रेमियों के बीच अपनी पहचान बनाई। इस बीच दैनिक समाचार पत्रों में साहित्यिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं सामयिक विषयों पर सुचिंतित आलेखों द्वारा उन्होंने पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया। प्रभावी भाषा, मोहक शैली तथा गहन अध्ययन से प्रसूत अभिव्यक्तियों के कारण वे लेखक एवं कवि के रूप में पहचाने जाने लगे। 29 नवंबर, 2013 को कोलकाता में उनका देहावसान हुआ।

उनके द्वारा रचित मौलिक, अनूदित तथा संपादित कृतियों की संख्या 18 है, जिसमें 12 मौलिक, 4 संपादित तथा 2 अनूदित हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अवस्थी जी द्वारा रचित निबंध तथा कहानियों की संख्या शताधिक है। उनके द्वारा रचित व्यंग्य प्रधान कहानियों में ‘लखनऊ  के हज्जाम’, ‘भ्रम के भूत’ तथा ‘कनौजिया दामाद जिंदाबाद’ खूब चर्चित हुर्इं।

डॉ. अवस्थी के तीन खंड-काव्य प्रकाशित-पुरस्कृत हुए हैं- ‘रावी-तट’, ‘क्रांति का देवता  चंद्रशेखर आजाद’ तथा ‘महाराणा का पत्र’। ‘राम श्याम युगल शतक’ में श्रीराम एवं श्रीकृष्ण पर केंद्रित 100-100 दोहे समाहित हैं। ‘पलकों पर इंद्रधनुष’ (काव्य-संग्रह) अवस्थी जी की अंतिम प्रकाशित कृति है। उन्होंने ‘सिंधु शार्दूल दाहिर सेन’ तथा ‘सबसे ऊपर कौन’ उपन्यासों की रचना भी की थी। आध्यात्मिक अभिव्यक्तियां ‘अंसुवन जल सींचि-सींचि’ में समाहित हैं। ‘यह देश नहीं देवालय है’ कृति में भारत के तीर्थों तथा मंदिरों पर ललित निबंध हैं। भारतीय नारी के प्रति अपनी अशेष श्रद्धा प्रकट करते हुए उन्होंने ‘वंदनीया युगे-युगे’ वृहत् ग्रंथ का लेखन भी किया।

राष्ट्र की वंदना और माटी की महिमा की अनुपम अर्चना के कारण वे काव्य-मंचों पर राष्ट्रीय-चेतना के ओजस्वी कवि के रूप में सम्मानित रहे हैं। भारत-माता के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए कवि ने एक गीत लिखा है जो पर्याप्त चर्चित-प्रशंसित हुआ। इस लंबे गीत का एक अंश-

जहां क्रांति का बिगुल बजाते भगतसिंह आजाद
जलियांवाला बाग दिलाता बलिदानों की याद
जहां स्वयं आकाश कर रहा अर्पित इन्हें प्रणाम
अपनी आग दीप्त हम करते, लेकर इनका नाम
जहां स्वप्न में भी कायरता करती नहीं प्रवेश
वही हमारी जन्मभूमि है, वही हमारा देश॥
ऐसी पुण्य-भूमि की अर्चना का आह्वान करते हुए कवि

कहता है-
ये अर्चना की भूमि है/ ये वंदना की भूमि है
ये सर्जना की भूमि है/ ये कल्पना की भूमि है
तुम इसे नमन करो/ तुम इसे चमन करो
राष्ट्र के तमिस्र का/ समग्र आचमन करो।

डॉ. अवस्थी का सर्वाधिक चर्चित मुक्तक लीला पुरुषोत्तम श्री कृष्ण पर केंद्रित है। इसमें श्रीकृष्ण के विविध रूपों का प्रभावी वर्णन किया गया है-

हमीं वृन्दाविपिन में श्याम बन मुरली बजाते हैं
हमीं बृजवीथियों में रास की लीला रचाते हैं
मगर जब राष्ट्र के सम्मान पर आघात होता है
हमीं गीता सुनाकरके सुदर्शन भी उठाते हैं॥

उनके द्वारा रचित समाज की विसंगतियों पर तीखे प्रहार करने वाली आक्रोशभरी अभिव्यक्तियां हों या व्यंग्य की पैनी मार से विचलित करने वाली काव्य-पंक्तियां, पाठकों पर वे सीधा असर डालती हैं। एक गज़Þल की पंक्तियां हैं -
काग चलते हंस की अब चाल कोई क्या करे
स्वस्तिवाचन कर रहे बैता, कोई क्या करे।
मान मिलता अब न ‘राणा’ या ‘शिवा’ को आजकल
मीरजाफर के गले जयमाल, कोई क्या करे।

1965 के भारत-पाक युद्ध पर केन्द्रित ‘रावी-तट’ खंड काव्य में ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर करने के उपरान्त तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के असामयिक निधन पर कवि की संवेदना से पूरित पंक्तियां अत्यंत मर्मस्पर्शी हैं-

उस संधिपत्र पर हस्ताक्षर, जब जन-नेता ने कर डाला
पावन स्वदेश का क्षण भर में, उसने इतिहास बदल डाला
वह सहमा-सहमा ठगा-ठगा, ताकने निशा में लगा गगन
स्मरण शहीदों का आया, जल उठा लाल का अंतर्मन।।

   आगे की पंक्तियों में कवि सीधी-सरल भाषा में मानो दिवंगत प्रधानमंत्री की अंतर्व्यथा को वाणी दे देता है- ‘जो लहू बहा सीमाओं पर उनको अब कौन सुमन दूंगा/ उनकी पत्नी मां-बहनों को बोलो क्या आश्वासन दूंगा।’
इस लंबी रचना में शास्त्री जी के देहावसान की मार्मिक पृष्ठभूमि का विवेचन तो है ही, समापन की इस पंक्ति में संपूर्ण देश की वेदना व्यक्त हो गई है- ‘गया बहादुर लाल देश का/ टूटा एक सितारा’।

राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति अवस्थी जी का अपार सम्मान भाव रहा है। सेंट्रल बैंक आॅफ इंडिया में ‘राजभाषा अधिकारी’ के पद को सुषोभित करने के बहुत पहले से ही वे हिन्दी हित में साहित्यिक-सामाजिक मोर्चे पर सक्रिय रहे हैं। ‘जय हिन्दी जय भारती’ शीर्षक 104 पंक्तियों की लंबी कविता में उनका हिन्दी प्रेम प्रखरता के साथ अभिव्यक्त हुआ है। कुछ पंक्तियां -

पराधीनता विदा हो गयी भारत के आंगन से।
अंग्रेजी को छोड़ न पाये, फिर भी हम निज मन से॥
राजनयिक आजादी हमने पायी तो क्या पाया?
अपनी भाषा कहो अभी तक, क्या हमने अपनाया?
तुम केवल मां हो, मां तुमसे कौन बड़ा है॥

    (लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं)