प्रकाश की गति के वैदिक विवेचन

    दिनांक 02-दिसंबर-2020
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प्रो. भगवती प्रकाश

आधुनिक विज्ञान के अनुसार रोमर ने सबसे पहले 1676 में प्रकाश की गति की गणना की थी। पर इसका उल्लेख सायणाचार्य 14वीं सदी में ही ऋग्वेद के सायण भाष्य में कर चुके थे। इसी तरह, ऋग्वेद में लिखा है कि चन्द्रमा और पृथ्वी सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं, जबकि ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है कि अंतरिक्ष में सूर्य न तो कभी उगता है और न ही अस्त होता है
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विगत अंक में पृथ्वी आदि ग्रहों द्वारा सूर्य की परिक्रमा के वैदिक उद्धरणों व सूर्य से पृथ्वी तक 8 मिनट में प्रकाश के पहुंचने आदि के वैदिक वाक्यों का विवेचन किया गया था। इस अंक में वेद-वेदांगों में सौरमंडल के कुछ अन्य उद्धरणों सहित प्रकाश की गति की सटीक वैदिक गणना की चर्चा की जा रही है।

सूर्य के प्रकाश से चन्द्रमा व पृथ्वी प्रकाशमान होते हैं: ऋग्वेद के श्लोक 1/35/7 व 1/84/1 में सूर्य को अपने प्रकाश से पृथ्वी व चन्द्रमा को प्रकाशित करने वाला बताते हुए कहा गया है कि क्रम से भूमंडल से सभी भागों को आलोकित करने में इसके द्वारा कभी व्यतिक्रम नहीं किया जाता है।

वि सुंपर्णाे अन्तरिक्षाण्यख्यद्गभीरवेंपा असुंर: सुनीथ:।
क्वें3दानीं सूर्य: कष्चिकेत कतमां द्यां रश्मिरस्या तंतान॥      (ऋग्वेद 1/35/7)
अत्राह गोरेमन्वत नाम त्वष्टुंरपीच्यंम्।
इत्था चन्द्रमंसो गृहे॥        (ऋग्वेद 1/84/1)


सूर्य न अस्त होता  है, न उदय
ऋग्वेद की ही शकल शाखा के ब्राह्मण भाग ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ में लिखा है कि अंतरिक्ष में सूर्य कभी न उदित होता है, न अस्त ही होता है। अल्पज्ञ लोग ही ऐसा मानते हैं। सूर्य जब भूमंडल के एक भाग को प्रकाशित करता है, तब दूसरे में अंधकार होता है। यानी पृथ्वी का जो भाग सूर्य के सम्मुख होता है, वहां दिन होता है और घूम कर उलटा ओर जा चुके भाग में रात्रि होती है। सूर्य हर क्षण उदित है।

स वा एष न कदाचनास्तमेति नोदेति।
तं यदस्तमेतीति मन्यन्तेऽह्न एव तदन्तमित्वाऽथाऽऽत्मानं विपर्यस्यते रात्रीमेवावस्तात्कुरुतेऽह: परस्तात्।
अथ यदेनं प्रातरुदेतीति मन्यन्ते रात्रेरेवतदन्तमित्वाऽथाऽऽत्मानंविपर्यस्पतेऽहरेवावस्तात्कुरुतेरात्रिं परस्तात्।
स वा एष न कदाचन निम्रोचति।

न ह वै कदाचन निम्रोचत्येतस्य ह सायुज्यं सरूपतां सलोकतामश्रुते य एवं वेद य एवं वेद॥     (ऐतरेय ब्राह्मण 3.44)
यही बात आर्यभट्ट ने अपने ग्रंथ आर्यभटियम् के गोलाध्याय में कही है कि सूर्य सदा ही विराजमान रहते हैं। जब सूर्य के सामने लंका वाला भाग होता है, तब वहां दिन और धरती के दूसरे गोलार्द्ध में रात्रि होती है।

सूर्याे विराजति सदेत्यर्थमार्यभटोऽब्रवात्-‘उदय यो लंकाया।     (आर्यभटियम् गोलपादे 2/13)
यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि सूर्य स्वयं भी स्थिर न हो कर अपनी कक्षा में 7.75 लाख किलोमीटर प्रति घंटा की गति से एक अति भारित कृष्ण विवर (एक सुपर मेसिव ब्लैक होल) की परिक्रमा कर रहा है। इसे भी देवी भागवत पुराण में इस प्रकार लिखा है कि सूर्य भी एक महा सूर्य की परिक्रमा कर रहा है। उसमें दी गति योजन प्रति घटी आदि एवं चतुर्युगियों के अनुपात आदि से संबंध का विवेचन आगे कभी किया जाएगा।

प्रकाश की वैदिक गति
आधुनिक विज्ञान के अनुसार, सर्वप्रथम प्रकाश की गति की गणना रोमर ने 1676 में की थी। विज्ञान के मतानुसार यह 1,86,000 मील प्रति सेकंड थी। लेकिन उससे पूर्व 14वीं सदी में ऋग्वेद के सायण भाष्य में सायणाचार्य ने ऋग्वेद की ऋचा क्रमांक 1/50/4 की व्याख्या में आदि शंकर की व्याख्या को जोड़कर प्रकाश की गति का उल्लेख किया है, जिसे उन्होंने आदि शंकराचार्य के सन्दर्भ से ही उद्धृत किया है। यही उल्लेख भविष्योत्तर पुराणान्तर्गत सूर्य हृदय स्तोत्र व भविष्य पुराण (ब्राह्म पर्व) अध्याय 53 के श्लोक क्रमांक 44-47 व कई अन्य पुराणों में भी है। यथा-

तरणिर्विष्वदर्षतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य।
विष्वमा भासि रोचनम्॥      (ऋ. 1/50/4)
(सायण)-हे सूर्य त्वं तरणि: तरिता अन्येन गन्तुमशक्यस्य महतोऽवनो गन्ता असि।
तथा च स्मर्यते-योजनानां सहस्रे द्वे द्वे शते द्वे च योजने।
एकेन निमिर्षााेन क्रममाणा नमोऽस्तु ते।

अर्थ- हे सूर्य! एक निमेष के आधे भाग में आपका प्रकाश 2202 योजन गति करता है, उसे नमस्कार है। एक निमेष लगभग 0़212 सेकंड का होता है। अतएव आधा निमेष 0़106 सेकंड का होगा। एक योजन मे औसत 9 मील की दूरी मानी गई है। इस प्रकार, एक सेकंड में 9.4339 अर्द्ध निमेष हुए। इसलिए 2202 ७9७9.4339 =1,86,961 मील प्रति सेकंड आती है। वैसे योजन के मान में यांत्कंचित अन्तर भी हो सकता है।

सूर्य से मानसून उत्पत्ति
सूर्य की उष्मा से जहा वायुमंडल में अल्प दाब का केंद्र बनता है, उससे मानसून आने का संकेत भी ऋग्वेद में है। वैदिक वृष्टि विज्ञान का विस्तृत विवेचन आगे किया जाएगा। यहा पर एक मंत्र उद्धृत किया जा रहा है:
इन्द्राय गिरो अनिशितसर्गा:, अप: प्रेरयं सगरस्य बुनात्।
यो अक्षेणेव चक्रिया शचीभिर्विष्व तस्तम्भ पृथिवीमुत द्याम्॥     (ऋक् 1.89.4)

अर्थात् ‘इंद्र एवं सूर्य के प्रकाश की ऊष्मा की ही महत्ता है कि वह समुद्र से जल ग्रहण करके आकाश में ले जाकर बरसाता है। (जैसे अक्ष पर घूमता पहिया होता है, उसी प्रकार अपने अक्ष पर घूमते हुए पृथ्वी और द्युस्थित लोकों को वह सूर्य अपनी शक्ति (आकर्षण शक्ति) से थामे हुए है।)

पृथ्वी आदि ग्रह सूर्य के आकर्षण बल से टिके हैं व सतत घूमते हैं: ऋग्वेद 1/164/13 में सूर्य को एक चक्र के मध्य में आधार रूप में बताया गया है एवं पृथ्वी आदि को उस चक्र के चारों ओर स्थित बताया गया है। वह चक्र स्वयं घूम रहा है एवं बहुत भार वाला अर्थात् जिसके ऊपर सम्पूर्ण भुवन स्थित है, सनातन अर्थात कभी न टूटने वाला बताया गया है।

ऋग्वेद के ही मन्त्र 1/35/2 एवं 1/35/9 में सूर्य को सौरमंडल के ग्रहों सहित पृथ्वी को अपने आकर्षण से स्थित रखने वाला बताया गया है।

ऋग्वेद 1/35/2 मंत्र में भी लिखा है कि सूर्य ने अपनी आकर्षण शक्ति से पृथ्वी आदि लोकों को धारण किया हुआ है।
हिरंण्यपाणि: सविता विचंर्षणिरुभे द्यावापृथिवी अन्तरींयते।
अपामीवां बाांते वेति सूर्यंमभि ष्णेनु रजंसा द्यामृंणोति॥        
    (ऋग्वेद 1/35/9)
आ ष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेंन सविता रथेना देवो यांति भुवंनानि पश्यन्॥
    (ऋग्वेद 1/35/2)

भूगर्भ की ऊष्मा व खनिज सम्पदा
पृथिवी को ‘अग्निगर्भा’ कहकर स्पष्ट किया गया है कि इसके अन्तस् में (भूगर्भ) अत्यधिक ऊष्णता है। वही ऊष्णता यदा-कदा ज्वालामुखी के रूप में फटकर भी बाहर निकलती है। इस तथ्य की जानकारी वैदिक साहित्य में ‘आग्नेयी’ और ‘अग्निगर्भा’ कहकर स्पष्ट रूप से दी है। सामवेद के ब्राह्मण भाग (ताण्ड्य ब्राह्मण) में ‘आग्नेयी पृथिवी’ (ताण्ड्य ब्राह्मण 15़4़8), ‘अग्निगर्भा पृथिवी’ (शत.ब्रा. 14.9.4़21)। गोपथ ब्राह्मण में तो ‘अयस्मयी पृथिवी’ (गो़.उ. 2.7)=‘पृथिवी अयस् अर्थात् लोहा, सीसा, ताम्र, यषद, सोना, चांदी आदि अयस्क से युक्त है अर्थात् ये धातुएं पृथ्वी के अंदर विद्यमान हैं।
इन धातुओं को चिह्नित करने के भूवैज्ञानिक विवेचन भी वृहत् संहिता आदि में विस्तार से किए गए हैं। अन्तरिक्ष के विवेचन के उपरान्त आगे इनका भी विवेचन किया जाएगा।
 (लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)