लव जिहाद : कानून हो कड़ा, सजा हो बड़ी

    दिनांक 21-दिसंबर-2020
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प्रणय कुमार

उत्तर प्रदश सहित कई अन्य भाजपा शासित प्रदेशों की सरकारों द्वारा लव जिहाद पर कड़ा रुख अपनाने और इस पर एक कानून लाने की बात पर कथित बुद्धिजीवियों को सेकुलरिज्म ध्यान आ रहा है। वे बेतुके तर्क देने लगे हैं, इसे ‘हिन्दूवादी एजेंडा’ बताते हैं।लेकिन वक्त की जरूरत है यह कानून

16_1  H x W: 0 मेरठ (उ.प्र.) में शमशाद अपनी पहचान और मजहब छुपाकर प्रिया और उसकी बेटी के साथ 5 साल रहा, राज खुलने पर मां-बेटी की हत्या कर दी   (फाइल चित्र)


उत्तर प्रदेश सरकार ‘विधि विरुद्ध मत परिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश, 2020’ लेकर आई है। प्रदेश की योगी सरकार का कहना है कि ‘बीते दिनों पुलिस-प्रशासन के सामने 100 से ज्यादा ऐसी घटनाएं  आर्इं, जिनमें जबरन कन्वर्जन का मामला बनता था।’ इस नए अध्यादेश की धारा-3 में झूठ, छल-प्रपंच, कपटपूर्ण साधन, प्रलोभन देकर कराए जा रहे कन्वर्जन को गैरकानूनी घोषित किया गया है। सर्वविदित है कि कन्वर्जन की घटनाओं में संलिप्त विदेशी चंदे से चलने वाली मजहबी संस्थाएं आर्थिक दृष्टि से कमजोर लोगों को अपना आसान शिकार बनाती हैं। इसलिए इस कानून के अंतर्गत महिलाओं, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के कन्वर्जन पर अधिक कठोर दंड के प्रावधान किए गए हैं। जहां कन्वर्जन के सामान्य मामलों में 5 साल की सजा और न्यूनतम 15,000 रुपया जुर्माने का प्रावधान है, वहीं महिलाओं एवं अनुसूचित जाति-जनजाति के संदर्भ में इसे बढ़ाकर 10 वर्ष और न्यूनतम 50,000 रुपये आर्थिक दंड रखा गया है।

पिछले कुछ वर्षों से मजहबी पहचान छिपाकर निकाह के अनगिनत मामले प्रदेश शासन के संज्ञान में आते रहे हैं। इसके कारण सामाजिक सौहार्द का वातावरण बिगड़ता रहा है, न्यायालयों के समक्ष जटिलताएं खड़ी होती रही हैं। इसलिए इस अध्यादेश में ठोस एवं निर्णायक पहल करते हुए इसकी धारा-6 के अंतर्गत पीड़ित पक्ष को न्यायालय में प्रार्थना-पत्र देकर ऐसे विवाह को निरस्त कराने का अधिकार सौंपा गया है। भय, धोखे, धमकी या प्रलोभन जैसे कारकों को समाप्त करने के लिए इसकी धारा-8 के अंतर्गत कन्वर्जन करने वाले हर व्यक्ति को कम-से-कम 60 दिन पूर्व जिला न्यायाधीश को लिखित सूचना देनी होगी। उसमें उसे स्पष्ट करना होगा कि वह बिना बाहरी दबाव के कन्वर्जन कर रहा है। प्रस्तुत साक्ष्यों एवं प्रमाणों के आधार पर जिला न्यायाधीश यह सुनिश्चित कर सकेंगे कि कन्वर्जन स्वेच्छा एवं सहमति से किया गया है या नहीं?

प्रदेश सरकार की यह कानूनी पहल स्वागत योग्य है, क्योंकि यह सभी मतावलंबियों को समान रूप से किसी मत को मानने या दूसरे मत को अपनाने की पारदर्शी-विधिसम्मत प्रक्रिया सुनिश्चित करती है। पर नेपथ्य  में कन्वर्जन का खेल खेलने वाले और उसके आधार पर थोक में विदेशी धन पाने वालों के पेट में अध्यादेश आते ही मरोड़ें उठने लगी हैं। उनमें से कई तो कन्वर्जन या लव-जिहाद को गंभीर एवं वास्तविक मामला न मानकर हिन्दू संगठनों का दुष्प्रचार तक बता रहे हैं।

गौरतलब है कि लव जिहाद का सबसे पहला मामला वरिष्ठ वामपंथी नेता पूर्व मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन ने उठाया था। फिर केरल के ही कांग्रेसी पूर्व मुख्यमंत्री ओमान चांडी ने इसकी पुष्टि करते हुए 25 जून, 2012 को विधानसभा में बताया कि गत छह वर्षों में प्रदेश की 2,667 लड़कियों को इस्लाम में कन्वर्ट किया गया। बल्कि केरल के ही उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के टी. शंकरन ने 2009 में लव जिहाद पर सुनवाई करते हुए यह माना कि प्रेमजाल में फंसाकर कन्वर्जन का खेल केरल में संगठित और सुनियोजित रूप से वर्षों से चलता रहा है। कैथोलिक बिशप कॉउंसिल, सीरो मालाबार चर्च जैसी तमाम ईसाई संस्थाएं भी लव जिहाद पर चिंता जताती रही हैं। इसी वर्ष 15 जनवरी को कार्डिनल जॉर्ज ऐलनचैरी की अध्यक्षता वाली पादरियों की एक संस्था ने दावा किया था कि बड़ी संख्या में प्रदेश की ईसाई युवतियों को फुसलाकर इस्लामिक स्टेट एवं अन्य आतंकवादी गतिविधियों में धकेला जा रहा है। इसी तरह, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान उच्च न्यायालय भी अलग-अलग समय पर कह चुके हैं कि विवाह के संदर्भ में कन्वर्जन रोका जाना चाहिए। अभी 30 अक्तूबर 2020 को  इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने  टिप्पणी की थी कि ‘विवाह से कन्वर्जन का कोई सरोकार नहीं है। किसी मजहब के मूल सिद्धांतों-विश्वासों को जाने बिना केवल विवाह के लिए किया जाने वाला कन्वर्जन अनुचित एवं अस्वीकार्य है।’

कथित लिबरल-सेकुलर बुद्धिजीवी प्रेम को दो वयस्कों      का निजी मसला बताकर प्राय: लव जिहाद का बचाव करते हैं  या अंतरपांथिक विवाहों की पैरवी करते हैं। पर वे बड़ी चतुराई से  यह छुपा जाते हैं कि यदि यह प्रेम का निजी मसला है तो बीच में मजहब कहां से आ जाता है?

अंतरपांथिक विवाह के बढ़ते मामलों को देखते हुए उत्तर प्रदेश के बाद अब असम, हरियाणा, हिमाचल, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात की राज्य सरकारों ने लव जिहाद और सामूहिक कन्वर्जन जैसे मामलों में और कठोर दंड के प्रावधान के संकेत दिए हैं। ताज्जुब है कि ऐसे तमाम मामले होने के बावजूद भी राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, समाजवादी पार्टी और कुछ अन्य नेताओं ने इसके विरुद्ध कानून लाए जाने का विरोध किया है। आश्चर्य की बात यह भी है कि भाजपा शासित प्रदेशों की सरकारों द्वारा कानून लाने की बात सुनते ही देश के कथित बुद्धिजीवियों को सेकुलरिज्म ध्यान आ जाता है, संविधान प्रदत्त ‘मौलिक अधिकार’ याद आने लगते हैं। वे अजीब तर्क देने लगते हंै। मसलन, क्या पूर्व में बने कानूनों से महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराध कम हो गए, जो अब हो जाएंगे? क्या प्रेम को मजहब की सरहदों में बांधना उचित है? क्या दो वयस्क लोगों के निजी मामलों में सरकारी हस्तक्षेप उचित है आदि-आदि।

सवाल यह है कि आधी आबादी की सुरक्षा की दृष्टि से लाए जाने वाले कानून के अस्तित्व में आने से पूर्व ही आशंकाएं जताना, उसमें राजनीति ढूंढना या उन पर हमलावर होना कितना उचित है? कानून का तो आधार ही पीड़ित या पीड़िता को न्याय दिलाना और दोषियों को दंड देना होता है। क्या एक चुनी हुई सरकार द्वारा लव जिहाद की आड़ में चल रहे कन्वर्जन के संजाल पर अंकुश लगाना अनुचित है? क्या छद्म वेश में बदले हुए नाम, पहचान, वेश-भूषा, चाल, चेहरा, प्रतीकों के साथ किसी को प्रेमजाल में फंसाना धूर्त्त एवं अनैतिक चलन नहीं? और क्या सच सामने आने पर इनका शिकार हुई युवतियां या विवाहित स्त्रियां स्वयं को ठगा महसूस नहीं करतीं? क्या ऐसी स्त्रियों को न्याय आधारित गरिमायुक्त जीवन जीने का कोई अधिकार नहीं मिलना चाहिए? जो दल या बुद्धिजीवी यह कानून लाने की सरकार की पहल के विरुद्ध हैं, वे जाने-अनजाने महिलाओं के हितों, जीवन व भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं। ये प्राय: अंतरपांथिक विवाहों के संदर्भ में स्त्रियों पर होने वाले अत्याचार या स्त्रियों के जबरन कन्वर्जन कराए जाने को लेकर मौन साध लेते हैं। और तो और, तथाकथित नारीवादियों के मुख पर भी ताला लग जाता है!

कथित लिबरल-सेकुलर बुद्धिजीवी विवाह को दो वयस्कों का निजी मसला बताकर प्राय: लव जिहाद का बचाव करते हैं या अंतरपांथिक विवाहों की पैरवी करते हैं। पर वे बड़ी चतुराई स यह छुपा जाते हैं कि यदि यह निजी मसला है तो बीच में मजहब कहां से आ जाता है? मरहूम संगीतकार वाजिद खान की पारसी पत्नी कमलरुख का मामला ऐसा ही है। यह कैसा प्रेम है जो कन्वर्जन कराने की शर्त पर किया जाता है!