रिश्तों में हो ऊष्मा और अपनत्व

    दिनांक 22-दिसंबर-2020
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आलोक व्यास

युवाओं के लिए महत्वाकांक्षी होना कोई गलत बात नहीं, मगर यह महत्वाकांक्षा केवल स्वयं तक सीमित न होकर परिवार, समाज, मित्र और मनुष्यता को भी समाहित करे तो उसके आश्चर्यजनक परिणाम होते हैं। आज कोरोना से बने अनिश्चितता के  माहौल में  युवाओं में अवसाद घर न करे, इसकी चिंता करनी होगी
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राजस्थान के बारां जिले के मध्य प्रदेश से सटे सहरिया जनजाति बहुल क्षेत्र शाहबाद के युवाओं से बातचीत में उनके चेहरे पर डर और चिंता साफ दिखाई दे रही थी। इस तरह का भाव अक्सर बड़े शहरों के उन युवाओं में दिखता है जो परिवार, समाज की अपेक्षाओं के बीच खुद को साबित करने की जंग से जूझ रहे होते हैं। सहरिया युवाओं ने बताया कि कोविड-19 की वजह से पढ़ाई नहीं हो पा रही। स्मार्टफोन या लैपटॉप न होने से आॅनलाइन पढ़ाई संभव नहीं है। मजदूरी के लिए बाहर गए युवा भी वापस अपने गांव लौट आए हैं। गांव में छोटी जोत की जमीनें आजीविका के लिए पर्याप्त नहीं हैं। मगर मार्च-सितम्बर, 2020 के बीच लॉकडाउन की वजह से घर पर ही बैठना पड़ा। कुछ काम न कर पाने की झुंझलाहट घरेलू झगड़ों में तब्दील होने लगी। इसका असर घर के बच्चों पर पड़ने लगा। यह स्थिति केवल शाहबाद के युवाओं की ही नहीं है। कमोबेश पूरे देश के युवा ऐसे तनाव से जूझ रहे हैं। और यह तनाव आगे चलकर कब अवसाद में बदल जाता है, इसका पता नहीं चल पाता।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत दुनिया के सर्वाधिक अवसाद ग्रस्त राष्ट्रों में एक है। हमारे देश में पिछले 5 वर्ष में 40,000 विद्यार्थियों ने आत्महत्या जैसा घातक कदम उठाया। मार्च 2016 में मन की बात में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी युवाओं में बढ़ते अवसाद पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। नेशनल मैंटल हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट (2015-16) के अनुसार, भारत में 98 लाख किशोर-किशोरी अवसाद व मानसिक असंतुलन से ग्रस्त हैं। यह अत्यधिक चिंता का विषय है जिस पर सिर्फ सरकारों को ही नहीं बल्कि समाज, समुदाय और व्यक्तिगत स्तर पर भी विचार करना होगा।
युवाओं में अवसाद का सबसे बड़ा कारण एकाकीपन है। सांस्कृतिक विविधताओं से भरपूर हमारे देश में सुख-दुख, उल्लास को बांटने के लिए अलग-अलग परम्पराएं हैं, त्योहार हैं। हर भाव को प्रकट करते लोक गीत-संगीत की चहक-महक है। हमारे यहां प्रकृति के प्रत्येक अवयव में एक लय और जीवन को आनंद को देखा-खोजा गया है। आध्यात्मिक दृष्टि से सभी को एक ‘ब्रह्म’ का अंश मानने और उसी में लीन हो जाने की पराकाष्ठा, जिसे मोक्ष कहा गया, उसमें भी अकेलेपन का नकार है, क्योंकि मोक्ष सत्, चित् और आनंद की अवस्था है। इस प्रकार व्यावहारिक और आध्यात्मिक जीवन में भारतीय परम्परा चेतना की सकारात्मक गति को ही स्वीकारती है।


 हमारे यहां प्रकृति के प्रत्येक अवयव में जीवन का आनंद खोजा गया है। आध्यात्मिक दृष्टि से सभी को एक ‘ब्रह्म’ का अंश मानने और उसी में लीन हो जाने की पराकाष्ठा, जिसे मोक्ष कहा गया, उसमें भी अकेलेपन का नकार है, क्योंकि मोक्ष सत्, चित् और आनंद की अवस्था है


युवाओं में बढ़ती एकाकीपन की यह प्रवृत्ति दुनिया में एक मानसिक बीमारी का रूप लेती जा रही है। बहुत से देशों ने एकाकीपन से उपजे अवसाद को बीमारी के एक प्रकार के रूप में स्वीकार कर लिया है, मगर भारत में अभी इस विषय पर परिवार, समाज में खुलकर चर्चा नहीं हो पा रही है। अन्तरराष्टÑीय श्रम संगठन द्वारा हाल ही में 112 राष्टÑों में कराए गए एक सर्वे के मुताबिक, 18 से 29 वर्ष की आयु के 50 प्रतिशत युवा अवसाद से पीड़ित हैं। सवाल यह है कि अपनी चहचहाहट और खिलखिलाहट से, मासूम नादानियों से, अपनी जिद और मौज से घर को रोशन रखने वाले ये बच्चे क्यों अचानक खामोश हो जाते हैं?

पिछले 10-15 वर्ष में पूरी दुनिया में तेजी से हुए सामाजिक, आर्थिक व तकनीकी बदलावों ने जीवन को एक ऐसी अंतहीन दौड़ बना दिया है जिसमें मान लिया गया है कि जो जितना तेज गति से दौडेÞगा, वही सफल हो पाएगा। यह तेज रफ्तार किसी को पीछे छोड़ने का सुख तो दे रही है, मगर विड़बना यह क्षणिक है क्योंकि कुछ ही समय में कोई और आपको पछाड़ रहा होता है। इतने तेजी से हो रहे बदलावों के साथ खुद की संगति बैठाने के चलते हमारी जीवनशैली बदलती जा रही है और उसी के अनुरूप प्राथमिकताएं भी। आज का युवा सब कुछ जल्दी से हासिल करने चाहता है। और इस जल्दबाजी की संस्कृति का ही परिणाम है कि परिवारों में विश्वास और तनाव बढ़ रहा है। पूरी तरह से ‘अर्थ केंद्रित’ होते जा रहे समाज में प्रतिस्पर्धा की ऐसी होड़ मची है कि किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है। बच्चे, माता-पिता से, माता-पिता कुटुंबीजन से और समाज से दूर होते जा रहे हैं। जीवन ‘स्वकेंद्रित’ होता जा रहा है।

‘उसकी कमीज मेरी कमीज से सफेद क्यों’, कुछ ऐसी ही सोच हमारे अपने परिवार-समाज में उतर रही है कि पड़ोसी के बच्चे के अंक मेरे बच्चे से अधिक क्यों? कहीं जाने-अनजाने हमारा व्यवहार भी अपने बच्चों के प्रति ‘एक उत्पाद’ जैसा तो नहीं हो गया है? हमारी अपेक्षाएं बच्चों के लिए बोझ तो नहीं बन रही हैं? ऐसी स्थितियां पैदा ना हों, इसमें परिवार की सबसे अहम भूमिका होती है।

बच्चों ने यदि कोई बड़ा लक्ष्य चुना है तो उसे हासिल करने के लिए अच्छे व खुले वातावरण के निर्माण का काम परिवार का होता है। देश के विभिन्न कोचिंग संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चे दूर-दूर से अपने शहर-गांव को छोड़कर पढ़ने आते हैं। यदि वे परिवार से खुलेपन का संस्कार साथ लाते हैं वे परिवार से दूर रहकर भी जुड़े रहते हैं। परिवार के बीच सहज अभिव्यक्ति का माहौल एक कवच का काम करता है जो बच्चों को अवसाद की स्थितियों से बचाता है। मगर जिन बच्चों को परिवार में ऐसा माहौल नहीं मिल पाता, वे विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार नहीं हो पाते और नकारात्मक सोच के कारण ऐसे बच्चों में गलत दिशा में जाने या आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम उठाने की संभावना बढ़ जाती है।

हमारे देश में अवसाद या डिप्रेशन पर संवाद और चर्चा अभी बडेÞ शहरों तक ही सीमित है। जरूरी है कि छोटे शहरों में भी इस प्रकार के परामर्श केन्द्र खुलें जहां युवा अपने भीतर की घुटन को सहज रूप से अभिव्यक्त कर पाएं व उससे बाहर निकलने के रास्ते अपना सकें। इसके लिए जागरूकता बढ़ानी होगी जिसमें सरकार के साथ-साथ सामाजिक संगठनों को भी आगे आना होगा। भारत सरकार द्वारा इस संबंध में पहल करते हुए मेंटल हैल्थ केयर एक्ट 2017 लाया गया, जिसका उद्देश्य मानसिक असंतुलन से ग्रस्त लोगों को सुरक्षा प्रदान करना है। हमारे देश में युवाओं को योग से जोड़ते हुए उन्हें भीतर से संतुलित व सुदृढ़ बनाने की व्यवस्थित पहल भी की जा सकती है।

वैसे, जीवन में खुद को साबित करने के लिए महत्वाकांक्षी होना कोई गलत बात नहीं होती, मगर हमारी महत्वाकांक्षा केवल स्वयं तक सीमित न होकर परिवार, समाज, मित्र और मनुष्यता को भी समाहित करे तो हम भावी पीढ़ी के लिए ऐसी उर्वर भूमि तैयार कर पाऐंगे जिसमें रिश्तों की ऊष्मा और अपनत्व की सौंधी महक होगी।          
(लेखक राजस्थान के सामाजिक कार्यकर्ता हैं)