दूसरे के दामन पर फर्जी दाग दिखाते दागी चेहरे वाले

    दिनांक 22-दिसंबर-2020
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मीडिया में बैठे सेकुलर पत्रकार और समाचार संस्थान एक एजेंडे के तहत खुलकर फैला रहे फर्जी खबरें
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किसानों की आड़ में छिपकर दिल्ली जाम किए बैठे असली कलाकारों का चेहरा जैसे-जैसे सामने आ रहा है, वैसे-वैसे बौखलाहट बढ़ रही है। तेलुगु के एक वामपंथी अखबार ने अफवाह उड़ाई कि किसानों के समर्थन में 25 हजार सैनिकों ने अपने शौर्य चक्र लौटाने की घोषणा की है जबकि इतने तो शौर्य चक्र आज तक दिए भी नहीं गए। सरकार ने खंडन किया कि किसी सैनिक ने कोई सम्मान वापस करने की बात नहीं कही है। लेकिन कांग्रेस और वामपंथी दलों का अफवाह तंत्र अब भी इस झूठ को फैलाने में जुटा है। पंजाब में पुलिस महानिरीक्षक स्तर के अधिकारी ने किसान आंदोलन के समर्थन में नौकरी से त्यागपत्र देने की घोषणा की। अखबारों और चैनलों ने इसे ऐसे बताया मानो 'पुलिस विद्रोह' हो गया हो। अधिकांश ने यह जानकारी छिपा ली कि वह अधिकारी भ्रष्टाचार के आरोप में लंबे समय से नौकरी से निलंबित है। उस पर न्यायालय के आदेशों को न मानने जैसे गंभीर आरोप भी हैं। एक झूठ यह भी फैलाया गया कि सिंघु बॉर्डर पर किसानों को हटाने के लिए सेना को बुलाया गया है। उधर, शेयर बाजार में 17 हजार करोड़ रु. के गबन के दोषी ठहराए गए प्रणय रॉय का चैनल कृषि कानूनों को 'पूंजीपतियों का षड़्यंत्र' साबित करने में जुटा है।

विश्वभर में जेल में बंद पत्रकारों के आधार पर एक रिपोर्ट बीते सप्ताह जारी की गई। इसमें वामपंथी देश चीन सबसे ऊपर है। उसके बाद तुर्की, इजिप्ट और सऊदी अरब जैसे इस्लामी देशों का नंबर है। यह रिपोर्ट हमारे देश के अखबारों ने अंदर के पन्नों में छिपा दी, क्योंकि पत्रकारों का यह दमन वामपंथी और इस्लामी देशों में हो रहा है। भारतीय मीडिया में भी इन्हीं दोनों विचारधाराओं का दबदबा है। संभवत: यही कारण रहा कि केरल में पत्रकार एसवी प्रदीप की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु का समाचार भी गायब कर दिया गया। प्रदीप केरल की वामपंथी सरकार की नीतियों और इस्लामी कट्टरपंथ के विरोध में निर्भीक होकर लिखा करते थे। उन्हें लंबे समय से धमकियां भी मिल रही थीं। बताया जा रहा है कि वे सोने की तस्करी के घोटाले से जुड़ी किसी रिपोर्ट पर काम कर रहे थे। घोटाले में केरल के वामपंथी मुख्यमंत्री विजयन सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। अब तक की जांच में इस्लामी आतंकी संगठनों की भूमिका भी सामने आ चुकी है। इसी तरह मुंबई में रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्णब गोस्वामी के बाद अब चैनल के सीईओ को गिरफ्तार किया गया।

उधर लव जिहाद को रोकने के लिए बने कानूनों के विरोध में मीडिया का एक बड़ा वर्ग सक्रिय है। इंडिया टुडे और फ्रंटलाइन जैसी पत्रिकाएं विशेषांक निकाल रही हैं। इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स समूह के अखबार नियम से इस मुद्दे पर एक झूठा या अर्धसत्य समाचार प्रकाशित करते हैं। प्रश्न उठता है कि हिंदू महिलाओं के प्रति एक संगठित अपराध को रोकने के लिए बनाए गए कानून को लेकर इस तरह के दुष्प्रचार की अनुमति कैसे दी जा सकती है? क्या सरकारों को सिर्फ इसलिए आंखें बंद कर लेनी चाहिए, क्योंकि लव जिहाद का शिकार बन रही महिलाएं बहुसंख्यक वर्ग से आती हैं? उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में एक परिवार ने लड़की के अपहरण की शिकायत दर्ज कराई, जब पुलिस ने कार्रवाई करके उसे छुड़ा लिया तो इंडियन एक्सप्रेस ने यह बताते हुए छापा कि 'लव जिहाद के संदेह में पुलिस ने विवाह रुकवा दिया'।

दलितों पर अत्याचार एक गंभीर विषय है, लेकिन मीडिया का बड़ा वर्ग इसका प्रयोग हिंदू धर्म को कमजोर करने और इस्लामी-ईसाई एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए करता है। मध्य प्रदेश के छतरपुर में विवाह समारोह में खाना छूने पर अनुसूचित जाति के युवक की हत्या की फेक न्यूज फैलाई गई। इसमें जी न्यूज, एएनआई, इंडिया टुडे, एनडीटीवी, टाइम्स आॅफ इंडिया जैसे संस्थानों ने अपना हाथ बंटाया। सबने बताया कि आरोपी 'ऊंची जाति' के थे। दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के कुछ छात्रों ने इस घटना की जांच की और पाया कि शादी में खाना छूने और जाति की पूरी कहानी फर्जी है। ये गांव के तीन लड़कों का झगड़ा था। एक ने दूसरे की बहन से छेड़खानी की थी, जिसे लेकर मारपीट हुई। पुलिस की जांच में भी पता चला कि यह जाति का मामला नहीं है, लेकिन यह फेक न्यूज फैलाने वाले किसी संस्थान ने न तो खबर वापस ली है और न ही इसके लिए खेद जताया।