कट-कमीशन-करप्शन से बेहाल जनता, इन वजहों से बदलाव को तैयार है पश्चिम बंगाल

    दिनांक 22-दिसंबर-2020   
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अमिय भूषण

पश्चिम बंगाल के आसमान का रंग बदलने लगा है। वाम के गहरे लाल से टीएमसी के दौर में सुर्ख नीला हुआ आसमान अब चटख भगवा होने लगा है। आसमान का भगवा होना भोर और भाग्योदय दोनों की गवाही है। टीएमसी की नीली सरकार और सियासत के रग-रग में शामिल हिंसा के ख़ूनी रंग और कट-कमीशन-करप्सन के स्याह काले रंग ने उत्सव और उदय के रंग भगवा को और चटख कर दिया है।
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दिसम्बर के सर्द मौसम में पश्चिम बंगाल की सियासत बेहद गर्म है। वज़ह राजनीति से जुड़ी है। नए समीकरण का असर आसमान से ज़मीन पर बहुत साफ नज़र आ रहा है। टीएमसी के लिए 19 दिसम्बर का अपशगुन भाजपा के लिए साल, 2020 का सबसे बड़ा शगुन बन गया है। तृणमूल कांग्रेस के सौभाग्य सितारे शुभेंदु अधिकारी दल बल के साथ भाजपा का हिस्सा बन गए। कभी तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी के दो बाजू रहे तृणमूल के दोनों शीर्ष नेता अब भाजपा की शोभा और सामर्थ्य का हिस्सा हैं। कभी दीदी के सबसे खास रहे मुकुल राय ने 2017 में बगावत के जिस बिगुल को फूंका था, अब उस बिगुल में शुभेंदु अधिकारी ने अपना स्वर मिला कर बगावत और विदाई के स्वर को और तेज़ कर दिया है।

बंगाल के आसमान में परिवर्तन की लिखावट अब पहले से कहीं ज्यादा गहरी हो गयी है। इस लिखावट की स्याही भाजपा के बलिदानी कार्यकर्ताओं के उस रक्त बून्द से बनी है, जिसने हिंसा के खूनी रंग को आत्मोसर्ग के केसरिया में बदला है। बंगाल के समूचे आकाश में सोनार बांग्ला की लिखावट जिन कूचियों से हुई है वे कूंचियां भाजपा के लाखों कार्यकर्ताओं के हाथ में आबाद हैं। बंगाल पर रक्तपिपासना पर उतारू तृणमूल संगठन और सरकार की हर प्रताड़ना को भोगकर मैदान में अड़े रहना सामर्थ्य और सहनशीलता की पराकाष्ठा है। सियासी आतंक और अन्याय के सामने दशकों तक चुप्पी साधे रखने वाला समाज अब मुखर होने लगा है।

हिंसा और लूट के खिलाफ उठ रही आवाम की आवाज़ ने तृणमूल के होश उड़ा दिए हैं। दीदी का डर और बौखलाहट चरम पर है। बंगाल का स्वाभिमान दलीय प्रतिबद्धताओं की सरहद लांघने लगा है। माटी से मानुष तक बंगाल में परिवर्तन की बयार तेज़ होने लगी है। बंगाल बदलाव में भाजपा की पीढ़ियों की साधना मौजूदा नेतृत्व का कौशल और परिश्रम एक बड़ा कारण तो है ही पर साथ में कुछ गहरे और जरूरी कारण तृणमूल की सरकार और संगठन के भीतर भी मौजूद हैं।

बहरहाल, पश्चिम बंगाल के आसमान का रंग बदलने लगा है। वाम के गहरे लाल से टीएमसी के दौर में सुर्ख नीला हुआ आसमान अब चटख भगवा होने लगा है। आसमान का भगवा होना भोर और भाग्योदय दोनों की गवाही है। टीएमसी की नीली सरकार और सियासत के रग-रग में शामिल हिंसा के ख़ूनी रंग और कट-कमीशन-करप्सन के स्याह काले रंग ने उत्सव और उदय के रंग भगवा को और चटख कर दिया है।


2019 लोकसभा चुनाव के दौरान टीएमसी के 18 दुर्ग (लोकसभा सीट ) पर विजय पताका लहरा चुकी भाजपा की विजय यात्रा पहले से ज्यादा सुसज्जित और शक्ति संपन्न दिख रही है। भाजपा के मुकाबले टीएमसी की सेना और सेहत दोनों में गिरावट जग जाहिर है। टीएमसी प्रमुख और राज्य की मुख्मंत्री ममता बनर्जी के तमाम सिपहसलार, सेनापति और सामंत लगातार टीएमसी से दूर हो रहे है। टीएमसी के भीतर विरोध और विद्रोह चरम पर है। इन सब वजहों के कई कारण हैं।
 
कटमनी-करप्शन के तंत्र में आकंठ तक डूबी टीएमसी की सरकार से खिन्न बंगाल की आवाम सरकार पोषित गुंडई, ह्त्या और हिंसा के ख़िलाफ़ अब मुखर हो गयी है। समाज कल्याण की नीतियों में भेद करने वाली टीएमसी की सरकार पर राज्य की जनता रत्ती भर भी भरोसे के लिए अब तैयार नहीं है। साथ ही ममता बनर्जी की ओर से पार्टी में परिवारवाद थोपा जाना भी पार्टी के बिखराव का बड़ा कारण है।