कपिल की परीक्षा में सिसौदिया फेल, क्या इन सवालों के जवाब हैं केजरीवाल सरकार के पास?

    दिनांक 23-दिसंबर-2020   
Total Views |

दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया दिल्ली के शिक्षा मॉडल का ढोल गले में लटकाए घूम रहे हैं. पर सवाल है कि अगर दिल्ली का शिक्षा मॉडल इतना ही लाजवाब है, तो सरकारी स्कूलों से निजी स्कूलों की तरफ भगदड़ क्यों मची हुई है ? क्या मनीष सिसौदिया के पास भाजपा नेता कपिल मिश्रा के सवालों के जवाबहैं ?
22_1  H x W: 0

दिल्ली में एक ऐसी सरकार है, जो माफिया की तरह काम करती है. इसे आप के कंपनी कह सकते हैं. दिल्ली को बदहाल कर चुकी केजरीवाल टीम को बहस करने का बहुत शौक है. विज्ञापन के ढिंढोरे पर जिंदा आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश के सपने देख रही है. सपने तो इसने पंजाब के भी देखे थे. फिर गोवा के देखे और हरियाणा के भी देखे. लेकिन केजरीवाल को ये मालूम होना चाहिए कि मुफ्त की बिजली और पानी के छलावे में कम से कम उत्तर प्रदेश तो आने वाला नहीं. फिर भी चलिए बहस करते हैं. लेकिन बहस केजरीवाल के चुने हुए मुद्दे पर होगी, तो और भी तमाम मुद्दों पर होगी.

दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया दिल्ली के शिक्षा मॉडल का ढोल गले में लटकाए घूम रहे हैं. चुनौती दे रहे हैं कि उत्तर प्रदेश के शिक्षा म़ॉडल के साथ तुलना की. जी हां, दुनिया के तथाकथित सर्वश्रेष्ठ शिक्षा मॉडल को देने वाले सिसौदिया पिछले चुनाव में बामुश्किल दो हजार वोटों से जीत पाए हैं. आइए के कंपनी, बहस करते हैं. दिल्ली के शिक्षा मॉडल की हकीकत पर जरा गौर कीजिए. दिल्ली का शिक्षा मॉडल इतना ही लाजवाब है, तो सरकारी स्कूलों से निजी स्कूलों की तरफ भगदड़ क्यों मची हुई है ? जहां दिल्ली की शिक्षा में निजी स्कूलों की हिस्सेदारी 33.5 प्रतिशत थी, वहीं केजरीवाल के राज में और सिसौदिया के सबसे उमदा मॉडल वाले स्कूलों के चलते यह हिस्सेदारी 45 फीसद को पार कर गई है. यदि यही शिक्षा मॉडल है तो दसवीं और बारहवीं की परीक्षा देने वाले छात्रों की संख्या सरकारी स्कूलों में क्यों कम होती जा रही है. भाजपा नेता कपिल मिश्रा का आरोप है कि 2014 के मुकाबले एक लाख 40 हजार बच्चों को सरकारी स्कूल छोड़कर प्राइवेट स्कूलों में क्यों जाना पड़ा. 2014 की तुलना में 12वीं की परीक्षा देने वाले छात्रों की संख्या में 44 हजार की कमी आई. क्यों मनीष सिसौदिया जी. क्या सिसौदिया इस बात का जवाब देंगे कि अपना रिकार्ड चमकाने के लिए वह छात्रों के भविष्य से खेल रहे हैं. पचास फीसद बच्चों को नवीं में फेल कर दिया जा रहा है, जिससे मनीष सिसौदिया का रिकार्ड 10 बोर्ड रिजल्ट में खराब न हो. इस हवाई शिक्षा मंत्री की शिक्षा को लेकर चिंता देखिए. पूछिए जरा, कितने शिक्षक भर्ती किए. 70 प्रतिशत स्कूलों में प्रधानाचार्य का पद खाली पड़ा है. दिल्ली के 92 फीसद स्कूलों में शिक्षक तय मानक से कम हैं. 76 प्रतिशत स्कूलों में पीने के पानी का कनेक्शन तक नहीं है. यह के कंपनी के तथाकथित शिक्षा मॉडल का सच.

22_1  H x W: 0

लखनऊ में सिसौदिया ने दावा किया कि दो करोड़ को संभाल सकते हैं, तो 22 करोड़ को भी संभाल लेंगे. हकीकत ये है कि आम आदमी पार्टी की सरकार ने दो करोड़ लोगों की जान से खिलवाड़ किया है. बहस करते हैं कि जरा कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के समय केजरीवाल पार्टी के कुप्रबंधन पर. दिल्ली में मरने वालों की तादाद 23 दिसंबर तक 10304 हो गई. उत्तर प्रदेश में 8212 लोगों की कोरोना से मौत हुई. सोचिए जरा कि दो करोड़ की आबादी पर दस हजार से ज्यादा लोग मर गए और केजरीवाल टीवी पर चेहरा चमकाते रहे. वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में काम कर लगे रहे. 22 करोड़ की आबादी पर मौत का आंकड़ा दिल्ली से कम है. और खुशफहम सिसौदिया ताल ठोकते हैं कि हम 22 करोड़ को संभाल लेंगे. बहस करिए न मनीष सिसौदिया जी. जरा जवाब दीजिए कि दिल्ली में कोरोना से मौत का आंकड़ा पूरे देश में सर्वाधिक के आस-पास क्यों है ? इन्हीं केजरीवाल सरकार से दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति हिमा कोहली और सुब्रमण्यम प्रसाद की बेंच ने दिल्ली में कोरोना के बढ़ते मामलों को लेकर कड़ी नाराजगी जताई थी. अदालत ने पूछा कि क्या केजरीवाल सरकार बीते 18 दिनों में बेतहाशा बढ़ते कोरोना के मामलों की रोकथाम में विफलता के बाद अपने परिजनों को गंवाने वाले दिल्लीवासियों को अपनी शक्ल दिखाने लायक है. अदालत ने कहा- आपको (दिल्ली सरकार को) एक नवंबर से क्या नजर नहीं आ रहा था कि हवा किधर बह रही है. लेकिन आप कछुए की तरह खोल में छिपकर बैठ गए. अब हम सवाल पूछ रहे हैं, तो कार्रवाई हो रही है. जब हालात बिगड़ रहे थे, तो आप क्यों सोते रहे. आपको 11 नवंबर को हमें नींद से जगाना पड़ा. आपने 18 नवंबर तक इंतजार क्यों किया. आपको पता है कि आपकी वजह से कितने लोगों की जान चली गई. क्या आप उनके प्रियजनों को शक्ल दिखाने लायक है. इससे ज्यादा अरविंद केजरीवाल सरकार की दुर्गति क्या होगी कि कोर्ट को कहना पड़ा- आप किस तरह की मॉनिटरिंग कर रहे हैं. जरा गंभीरता से हालात को दखिए. आप न्यूयार्क और साओ पोलो जैसे शहरों को कोरोना के मामले में पार कर चुके हैं. मनीष सिसौदिया आइए, जरा बहस करते हैं. वैसे गलत तो आप हाईकोर्ट तो क्या भगवान को भी ठहरा सकते हैं. जरा जवाब दीजिए के कंपनी ?


केजरीवाल जी आइए, बहस करते हैं. दिल्ली गैस चैंबर कैसे बन गई और आपने किया क्या ?  एक युद्ध प्रदूषण के विरुद्ध जैसी नौटंकी करने वाली केजरीवाल सरकार ने दिल्ली को गैस चैंबर बना दिया है. पड़ोसी राज्यों पर ठीकरा फोड़ने वाले केजरीवाल कोरोना के लिए भी पराली को जिम्मेदार ठहराते हैं. लेकिन खुद पॉल्यूशन पर उन्होंने क्या किया ? एक आरटीआई के जवाब में केजरीवाल सरकार ने स्वीकार किया है कि पिछले चार साल में प्रदूषण अधिभार (पॉल्यूशन सेस) के नाम पर दिल्ली की जनता की जेब से जो पैसा निकाला गया है, उसमें से महज 1.6 प्रतिशत ही प्रदूषण के खिलाफ उनके कथित महायुद्ध में इस्तेमाल हुआ है. केजरीवाल सरकार ने पिछले चार में इस मद में 883 करोड़ रुपये इकट्ठा कर लिया. 503 करोड़ रुपये 2017 में, 228 करोड़ रुपये 2018 में और 110 करोड़ 219 में. सितंबर, 2020 तक चार करोड़ और दिल्ली की जनता से वसूले गए. इसमें से सिर्फ 1.6 फीसद यानी 15.58 करोड़ रुपये ही स्वच्छ हवा और पर्यावरण संरक्षण में खर्च किए गए हैं.

 आइये बहस करते हैं के कंपनी. जनता का पैसा कोरोना काल में आप विज्ञापन पर कैसे लुटाते रहे. स्वयंभू तौर पर दुनिया भर के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री घोषित हो चुके केजरीवाल जी ने कोरोना काल में क्या किया है. बस चेहरा चमकाया है. केजरीवाल के लिए सरकार का मतलब है विज्ञापन. मुख्यमंत्री का सीधा फार्मूला है, कुछ मत करो, बस अपना प्रचार करो. काम हो न, बस जनता को होते रहने के भ्रम में रखना है. आपको पता है, जब आप कोरोना के डर से काम-धंधे तक बंद करके बैठे थे, दिल्ली के मुख्यमंत्री क्या कर रहे थे. अपना चेहरा चमकाने के लिए विज्ञापन में पैसे बहा रहे थे. कोरोना काल के चार महीने में केजरीवाल सरकार ने 48 करोड़ रुपये विज्ञापन पर बहा दिए. हर दिन चालीस लाख रुपये के विज्ञापन. यह वही सरकार है, जो कहती है कि हमारे पास कर्मचारियों को तनख्वाह देने के पैसे नहीं हैं. एक आरटीआई के जवाब में सामने आया है कि केजरीवाल सरकार ने जुलाई में 45.94 करोड़ रुपये, जून में 1.81 करोड़ रुपये और अप्रैल में 66 लाख रुपये विज्ञापन पर खर्च कर दिए. 2019 में भी केजरीवाल सरकार ने 200 करोड़ रुपये विज्ञापन पर फूंक दिए थे. खबर तो यह भी है कि इस दीपावली पर मुख्यमंत्री केजरीवाल ने पूजन के कार्यक्रम का सीधा प्रसारण टेलीविजन चैनलों पर टाइम स्लॉट खरीदकर कराया. इस पर करोड़ों रुपये खर्च हो जाने का अनुमान है. जनता के पैसे पर ये नौटंकी उन्होंने ऐसे समय पर की, जब दिल्ली कोरोना के मामले में दुनिया की राजधानी का दर्जा हासिल करने जा रही थी. फिर इसी सरकार ने कह दिया कि हमारे पास तो कर्मचारियों को तनख्वाह देने तक के पैसे नहीं है. जनता का पैसा कैसे लुटाया, जवाब दीजिए के-कंपन ? और आप उस मुख्यमंत्री से बहस करना चाहते हैं, जो दिन-रात सिर्फ काम में जुटा है.


अब बात दिल्ली दंगे की. सीएए के विरोध में सबसे पहले मुसलमानों को भड़काने वाली दिल्ली सरकार ही थी. दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के विधायक, पार्षद, कार्यकर्ता दिल्ली दंगे में सक्रिय रूप से शामिल थे. हिंसा, आगजनी, हत्या जैसी घटनाओं पर आज तक दिल्ली सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी ने माफी नहीं मांगी है. दिल्ली के ही जाफराबाद और कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में राहत सामग्री और राशन बांटने में धार्मिक आधार पर भेदभाव हुआ है. कोरोना काल में, जब सब जान बचाने में लगे हैं, दिल्ली की केजरीवाल सरकार के एक विधायक ने मदनपुर खादर में सिंचाई विभाग की जमीन पर रोहिंग्या घुसपैठियों की पूरी बस्ती बसा दी. जब रोहिंग्याओं को बसाया जा रहा था, तभी लॉकडाउन में श्रमिकों को खदेड़ने की शुरुआत दिल्ली से ही हुई. रातों-रात एनाउंस किया गया कि उत्तर प्रदेश और बिहार के लिए यूपी बार्डर पर बसे हैं. तीन हजार से ज्यादा बसों में लादकर दो लाख लोगों को यूपी बार्डर पर पटक दिया गया. वह योगी आदित्यनाथ ही थे, जिन्होंने रातों रात लाखों लोगों को उनके घर तक पहुंचा दिया. इतना ही नहीं, पूरे सफर में इनके खाने और पीने तक का ध्यान रखा गया. घर भेजा गया, तो एक महीने का राशन देकर. के कंपनी तो दिल्ली के भूखे लोगों तक खाना भी न पहुंचा सकी और उत्तर प्रदेश में कोई भूखा नहीं सोया.