संस्कृति संवाद  : भारतीय वाङ्मय में गुरुत्वाकर्षण का ज्ञान

    दिनांक 24-दिसंबर-2020   
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प्रस्तुत स्तंभ में आकाशगंगाओं के बीच आधुनिक विज्ञानसम्मत श्याम पदार्थ व श्याम ऊर्जा के विवेचन के वैदिक संदर्भ एवं सौर मण्डल में सूर्य के गुरुत्वाकर्षण आदि का विवेचन किया जा चुका है इस कड़ी में भारतीय वाङ्मय में गुरुत्वाकर्षण के इन्हीं संदर्भों में से कुछ की संक्षिप्त चर्चा प्रस्तुत है
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भारत में गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का न्यूटन के जन्म से कई सहस्त्राब्दि पूर्व महाभारत से लेकर भास्कराचार्य, आर्यभट्ट, वराह मिहिर रचित ग्रंथों सहित प्राचीन व्याकरण ग्रंथों एवं उपनिषदों तक में अत्यंत विशद विवेचन किया जा चुका है।
ये तथ्य देश-विदेश के भौतिकीविदों, भौतिकशास्त्र के आधुनिक संदर्भ ग्रंथों, पाठ्यपुस्तकों एवं आम जन के ज्ञान का विषय बन सके तो कई भ्रान्त धारणाओं का उन्मूलन हो सकेगा।

महाभारत, व्याकरण महाभाष्य एवं वृहत् जाबाल उपनिषद्
ऋग्वेद के सूर्य आदि के गुरुत्वाकर्षण की चर्चा इस स्तंभ के पूर्व में कर ली गई थी। अब वेदोत्तरकालीन निम्न ग्रंथों में आए गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांतों के कुछ संदर्भ निम्नानुसार हैं:
वेदव्यास रचित 5,000 वर्ष प्राचीन महाभारत में गुरुत्वाकर्षण: महाभारत में गुरुत्वाकर्षण का उल्लेख पितामह भीष्म ने किया है। भौतिक पदार्थों के गुणों का वर्णन करते हुए भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा था,
‘‘भूमै: स्थैर्यं गुरुत्वं च काठिन्यं प्रसवात्मना, गनो भारश्च शक्तिश्च संघात स्थापना धृृति।’’ (महाभारत-शान्ति पर्व 261)
अर्थात्, हे युधिष्ठिर! स्थिरता, गुरुत्वाकर्षण, कठोरता, उत्पादकता, गंध, भार, शक्ति, संघात, स्थापना आदि भूमि के गुण हैं।

महाभारत के समकालीन पतंजलि कृत व्याकरण महाभाष्य: महर्षि पतंजलि ने अनुसार : इसका विवेचन सादृश्य एवं आन्तर्य के सिद्धांत से कर दिया था। गुरुत्वाकर्षण सादृश्य का ही उपखण्ड है। समान गुण वाली वस्तुएं परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। उससे आन्तर्य पैदा होता है। महर्षि पंतजलि ने
कहा है-
अचेतनेश्वपी, तद-यथा-लोष्ठ क्षिप्तो बाहुवेगम गत्वा नैव तिर्यग गच्छति नोर्ध्वमारोहती प्रिथिविविकार: प्रिथिविमेव गच्छति-आन्तर्यत:।

तथा
या एता आन्तरिक्ष्य: सूक्ष्मा आपस्तासां विकारो धूम:।
स आकाश देवे निवाते नैव तिर्यग नवागवारोहती।
अब्विकारोपि एवं गच्छति आनार्यत:।

और
ज्योतिषी विकारो अर्चिराकाशदेशो निवाते सुप्रज्वलितो
नैव तिर्यग गच्छति नावगवरोहति।
ज्योतिषो विकारो ज्योतिरेव गच्छति आन्तर्यत:।
पतंजलि महाभाष्य, सादृश्य एवं आन्तर्य-1/1/50

अर्थ-चेतन अचेतन सबमें आन्तर्य सिद्धांत कार्य करता है। मिट्टी का ढेला आकाश में जितनी बाहुबल से फेंका जाता है, वह उतना ऊपर चला जाता है, फिर न वह तिरछा जाता है और न ही ऊपर जाता है, वह पृथ्वी का विकार होने के कारण पृथ्वी पर ही आ गिरता है। इसी का नाम आन्तर्य है।
इसी प्रकार अंतरिक्ष में सूक्ष्म आप (हाइड्रोजन) की तरह का सूक्ष्म जल तत्व ही उसका विकार धूम है। यदि पृथ्वी में धूम होता तो वह पृथ्वी में क्यों नहीं आता? वह आकाश में जहां हवा का प्रभाव नहीं, वहां चला जाता है, न तिरछा जाता है न ही नीचे ही आता है।
इसी प्रकार ज्योति का विकार अर्चि है। वह भी न नीचे जाता है न तिरछे जाता है। फिर वह कहां जाता है? ज्योति का उर्ध्व गमन विकार ज्योति को ऊपर ही ले जाता है।
मंत्र व्याकरण महाभाष्य स्थानेन्तरतम:-1/1/49 में महर्षि पतंजलि ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का भी स्पष्ट उल्लेख करते हुए कहा है-
लोष्ठ क्षिप्तो बाहवेगं गत्वा नैव तिर्यक् गच्छति नोर्ध्वमारीहति।
पृथ्वीविकार पृथ्वीमेव गच्छति आन्तर्यत:। (महाभाष्1/1/49)

अर्थ: पृथ्वी की आकर्षण शक्ति इस प्रकार की है कि यदि मिट्टी का ढेला ऊपर फेंका जाता है तो वह बहुवेग को पूरा करने पर, न टेढ़ा जाता है और न ऊपर चढ़ता है। वह पृथ्वी का विकार है, इसलिए पृथ्वी पर ही आ जाता है।

उपनिषद व वैशेषिक दर्शन में गुरुत्वाकर्षण विवेचन
वृहत् जाबाल उपनिषद् में गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत के वर्णन में गुरुत्वाकर्षण को आधारशक्ति नाम के साथ इसके दो प्रकार बताए हैं प्रथम ऊर्ध्वशक्ति या ऊर्ध्वग अर्थात् ऊपर की ओर खिंचकर जाना। जैसे कि अग्नि का ऊपर की ओर जाना। और दूसरा अध:शक्ति या निम्नग अर्थात् नीचे की ओर खिंचकर जाना। जैसे जल का नीचे की ओर जाना या पत्थर आदि का नीचे आना।

वृहत् उपनिषद् में भी गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के सूत्रांकित हैं-
अग्नीषोमात्मंक जगत्। (बृहत् उपनिषद् 2़4)

आधारशक्त्यावधृत: कालाग्निरयम् ऊर्वग:। तथैव निम्नग: सोम:। (बृहत् उपनिषद 28)
अर्थ: सारा संसार अग्नि और सोम का समन्वय है। अग्नि की ऊर्ध्वगति है और सोम की अधो: शक्ति। इन दोनों शक्तियों के आकर्षण से ही संस्कार रुका हुआ है।
महर्षि कणाद ने वैशेषिक दर्शन में 2 सूत्र दिए हैं। यथा

संयोगाभावे गुरुत्वात्पतनम्।
संस्काराभावे गुरुत्वात्पतनम्।
भारतीय खगोलज्ञों-
भास्कराचार्य, वाराहमिहिर, आर्यभट्ट श्रपति आदि के सन्दर्भ

भास्कराचार्य: भारत के एक प्राचीन गणितज्ञ भास्कराचार्य (1114-1185) ने ग्रंथ सिद्धांत शिरोमणि में कहा है:-

आकृष्टिशक्तिश्चमहि तया यत् खस्थं-गुरु स्वाभिमुखं स्वशक्त्या।
आकृष्यते तत् पततीव भाति समे समन्तात् क्व पतत्वियं खे॥ (सिद्धांत भुवन 16)

अर्थ: पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है जिसके कारण वह ऊपर की भारी वस्तु को अपनी ओर खींच लेती है। वह वस्तु पृथ्वी पर गिरती हुई सी लगती है। पृथ्वी स्वयं सूर्य आदि के आकर्षण से रुकी हुई है, अत: वह निराधार आकाश में स्थित है तथा अपने स्थान से हटती नहीं है और न गिरती है यह अपनी कील पर घूमती है। आचार्य वराहमिहिर: वराहमिहिर ने 57 ईसा पूर्व में अपने ग्रंथ ‘पञ्चसिद्धान्तिका’ (पृ. 31) में कहा है,

पंचभमहाभूतमयस्तारा गण पंजरे महीगोला:।
खेयस्कान्तान्त: स्थो लोह इवावस्थितो वृत्त:॥

अर्थ: तारा समूह रूपी पंजर में गोल पृथ्वी इसी प्रकार रुकी हुई है जैसे दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहा।
आचार्य श्रीपति: 11वीं सदी (1045) में जन्मे आचार्य श्रीपति ने अपने ग्रंथ ‘सिद्धांतशेखर’ में कहा है-

उष्णत्वमर्कशिखिनो: शिशिरत्वमिन्दौ, निर्हतुरेवमवने: स्थितिरन्तरिक्षे॥                   (सिद्धांतशेखर 15/21)
नभस्ययस्कान्तमहामणीनां मये स्थितो लोहगुणो यथास्ते।
आधारशून्यो पि तथैव सर्वधारो धरित्र्या ध्रुवमेव गोल:॥ (सिद्धांतशेखर 15/22)

अर्थ: पृथ्वी की अंतरिक्ष में स्थिति उसी प्रकार स्वाभाविक है, जैसे सूर्य में गर्मी, चन्द्र में शीतलता और वायु में गतिशीलता। दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहे का गोला स्थिर रहता है, उसी प्रकार पृथ्वी भी अपनी धुरी पर रुकी हुई है। इसी प्रकार गति के नियमों का विवेचन भी वैशेषिक दर्शन व वाल्मीकि रामायण सहित कई ग्रंथों में न्यूटन के जन्म से कई सहस्त्राब्दी पूर्व किया जा चुका है। सामान्य विद्युत से लेकर जैव विद्युत तक के भी सटीक विवेचन वेदों आदि में विस्तार से हैं।
(लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)