नेपाल : मुखर हुई हिन्दू राष्ट्र की मांग

    दिनांक 24-दिसंबर-2020
Total Views |
काठमांडू से पंकज दास

नेपाल के विभिन्न शहरों के साथ ही, काठमांडू की सड़कों पर  हजारों की संख्या में उतरे लोगों ने नेपाल को पुन: हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की मांग लेकर एक वृहत् प्रदर्शन किया। देश में माओवादियों और चर्च के बढ़ते दखल से ऊबे नेपालवासियों को अब संविधान से ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द के हटने का इंतजार
nepal_1  H x W:
नेपाल को पुन: हिन्दू राष्ट् घोषित करने की मांग को लेकर यूं हजारों की संख्या में सड़क पर उतरे काठमाडूंवासी

नेपाल में आए दिन कोई न कोई जुलूस-प्रदर्शन देखने को मिल रहा है। कभी सरकार की असफलता-अक्षमता के खिलाफ, कहीं चीन के अतिक्रमण के खिलाफ तो कहीं नेपाल-भारत सीमा को बंद रखने के खिलाफ। लेकिन पिछले एक पखवाड़े से नेपाल के विभिन्न शहरों में एक प्रदर्शन चल रहा है जो बाकी सब प्रदर्शनों से सर्वथा भिन्न है। इनका नेतृत्व आम जनता कर रही है। इनमें किसी राजनीतिक दल का कोई नेता नहीं दिखता फिर भी हजारों की संख्या में लोग जुड़ रहे हैं। प्रदर्शन के अंतर्गत रोज किसी न किसी शहर में आमजन नेपाल का राष्ट्रीय ध्वज लेकर हिन्दू राष्ट्र की पुनर्बहाली का नारा लगाते हैं।

राजधानी काठमांडू की सड़कों पर करीब दस हजार से अधिक लोगों की सहभागिता में ऐसा ही एक वृहत् प्रदर्शन हुआ। इसके पक्ष और विपक्ष में सरकार के मंत्री से लेकर विभिन्न दलों के नेता और अन्य लोगों की धारणा सामने आने लगी। यह प्रदर्शन नेपाल को फिर से हिन्दू राष्ट्र घोषित करने, नेपाल के संविधान से पंथनिरपेक्षता के प्रावधान को खारिज करने की प्रमुख मांग के साथ शुरू हुआ था लेकिन अचानक ही इन प्रदर्शनों में राजसंस्था को फिर से वापस लाने और संघीय शासन व्यवस्था को खारिज करने की भी मांग होने लगी। यह विडंबना ही है कि नेपाल में जब-जब हिन्दू राष्ट्र की मांग उठायी जाती है तब-तब उसे राजसंस्था की पुनर्बहाली के साथ जोड़कर देखा जाता है। नेपाल के हिन्दू राष्ट्र की पहचान को खत्म कर पंथनिरपेक्ष देश बनाने के पीछे जिन संस्थाओं और देशों की भूमिका रही है, उन्होंने बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से नेपाल मे इस तरह का माहौल बना दिया है कि जब-जब यहां हिन्दू राष्ट्र की बात होगी तब-तब उसे राजा की पुनर्वापसी के साथ जोड़कर खबर बनाई जाती है ताकि हिन्दू राजशही राष्ट्र की मांग ओझल हो जाए।


हिन्दू राष्ट्र से पंथनिरपेक्ष देश
18 मई, 2006 को देश की पुन:स्थापित प्रतिनिधि सभा (संसद का निचला सदन) में तत्कालीन प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला की तरफ से एक घोषणा की गई जिसमें नेपाल में राजशाही के सभी अधिकारों को खत्म कर दिया गया। सभी राजनैतिक और संवैधानिक अधिकार इसी प्रतिनिधि सभा और तत्कालीन सरकार को देने और सभी निकायों, सेना, पुलिस, न्यायालय, प्रशासन आदि को प्रतिनिधि सभा के मातहत लाने की घोषणा की गई। इस घोषणा के छह विविध विषयों के सबसे आखिर में एक पंक्ति धारा 6(ङ) में लिखा था, ‘नेपाल पंथनिरपेक्ष राज्य होगा।’ आम जनता को यह तब पता लगा जब उन्होंने अगले दिन का समाचार पत्र पढ़ा।

दुनिया के एकमात्र हिन्दू राष्ट्र की पहचान को खत्म कर नेपाल को आखिर किसके कहने पर पंथनिरपेक्ष देश बना दिया गया, यह आज तक अधिकतर नेपाली जनता की समझ से परे है।  अचानक नेपाल में 240 वर्ष से रही राजशाही पर अंकुश लगा दिया गया था। नेपाल के राज परिवार में तत्कालीन राजा बीरेन्द्र्रबीर विक्रमशाह के पूरे परिवार की हत्या दरबार के भीतर ही होने के बाद संयोगवश उस दिन काठमांडू से बाहर रहे विवादास्पद छवि के ज्ञानेन्द्र्रशाह को राजगद्दी पर बिठाया गया था। लेकिन ज्ञानेन्द्रशाह और उनके पुत्र पारस शाह को लोग उस रूप में कभी स्वीकार नहीं कर पाए। कालांतर में राजा ज्ञानेन्द्र्र के जनता की चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करते हुए संसद को भंग करने और राज्य संचालन का संपूर्ण अधिकार अपने पास रखने के निर्णय के बाद तो जनता आंदोलन करने लगी और राजशाही के अधिकार को खत्म करने की मांग करने लगी। राजनीतिक दलों ने सशस्त्र विद्र्रोह में रत माओवादियों के साथ मिलकर नेपाल में फिर से लोकतंत्र स्थापित किया, विघटित संसद की स्थापना हुई, राजा की प्रत्यक्ष शासन व्यवस्था से छुटकारा मिला, जनता के चुने प्रतिनिधियों द्वारा संविधान लिखने का मार्ग प्रशस्त हुआ। लेकिन नेपाल के हिन्दू राष्ट्र के संवैधानिक दर्जे को खत्म कर देश को पंथनिरपेक्ष बनाया जाना किसी के गले नहीं उतरा।

पूरे आंदोलन के दौरान एक भी दिन किसी भी नेता या वकता ने देश की हिन्दू राष्ट्र की पहचान को मिटाने और पंथनिरपेक्षता को लादने की बात नहीं की थी। फिर ऐसा क्या हो गया कि तत्कालीन राजा के द्वारा अपनी पराजय स्वीकार करने और देश मेें लोकतंत्र की पुनर्बहाली की घोषणा करने के बाद नेताओं ने मिलकर इसे पंथनिरपेक्ष देश घोषित कर दिया? उस समय आंदोलन की सफलता की आड़ में तमाम नेताओं ने कई विवादास्पद निर्णय लिए, जिनका विरोध तो होता था लेकिन उनसे ऊपर कोई निकाय नहीं होने के कारण उनकी मनमानी को रोकने वाला कोई नहीं था। फिर, उस समय माहौल ऐसा था कि हिन्दू राष्ट्र की मांग करने वाले को राजा के साथ जोड़कर देखा जाता था और राजा के पक्ष में बोलने का मतलब था उन्मादी माओवादियों को नाराज करना। पूरा देश माओवादियों के खौफ में जी रहा था इसलिए पंथनिरपेक्षता के विरोध में उठाए गए स्वर को दबा दिया गया। लेकिन लोगों के मन में कहीं न कहीं यह टीस बनी रही।

हिमालय की गोद मे बसे इस छोटे से देश की पहचान सगरमाथा और भगवान बुद्ध की जन्मभूमि के साथ ही हिन्दू राष्ट्र के नाते भी थी। लेकिन चंद नेताओं के व्यक्तिगत स्वार्थ ने उनसे यह पहचान छीन ली थी, जिसका गुस्सा लोगों के मन में था। आज सड़कों पर जो प्रदर्शन हो रहा है, वह उसी का परिणाम है।

p40_1  H x W: 0


चर्च, एनजीओ और भारतीय कांग्रेस की संदिग्ध भूमिका
दुनियाभर में ईसाइयत और चर्च के विस्तार में लगे संगठनों को नेपाल की हिन्दू राष्ट्र के रूप में संवैधानिक मान्यता खटकती थी। हर गली में चर्च बनाने की अपनी योजना के तहत वे नेपाल में इस साजिश का विस्तार करना चाहते थे। लेकिन नेपाल के हिन्दू राष्ट्र होने और कन्वर्जन पर कड़ा कानून होने की वजह से वे इसमें सफल नहीं हो पाए। इसलिए नेपाल के राजनेताओं को पैसे और विदेशों में भ्रमण का लालच देकर उन्होंने देश को हिन्दू राष्ट्र से पंथनिरपेक्ष देश बनवाया। नेपाल में यूनीफिकेशन चर्च का काफी प्रभाव है। यह संस्था न सिर्फ नेपाल में कन्वर्जन के लिए बदनाम है बल्कि इसका एक उद्देश्य नेपाल के प्रमुख राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं को किसी ना किसी बहाने यूरोप की सैर कराना और उन्हें पंथनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाना भी है।

नेपाल के प्रमुख राजनीतिक दलों का शायद ही कोई ऐसा बड़ा नेता होगा जिसने इनके सहयोग से मुफ्त में यूरोप की सैर नहीं की होगी। इस संस्था के नेपाल प्रमुख एकनाथ ढकाल का देश में इतना प्रभाव है कि ये दो बार सांसद नियुक्त हुए। एक बार तो वामपंथी सरकार में मंत्री भी रहे। अभी एक वर्ष पहले ही नेपाल में यूनीफिकेशन चर्च ने एक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया था जिसकी आयोजन कमेटी में नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल और पूर्व उपप्रधानमंत्री सुजाता कोइराला शामिल थीं। कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि के रूप में प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली स्वयं शामिल हुए। इस कार्यक्रम में वियतनाम के प्रधानमंत्री और म्यांमार की स्टेट काउंसलर आङ सान सू ची भी आई थीं। भारत से कांग्रेस के कई सांसद और नेता इसमें शामिल थे। सभी आगंतुकों को ‘होली वाइन’ पिलाई गई थी। 

नेपाल में चर्च और इससे जुड़ी गैर सरकारी संस्था के अलावा दिल्ली की तत्कालीन संप्रग सरकार की भूमिका भी संदिग्ध रही। नेपाल में लोकतंत्र की पुनर्बहाली से पहले सात राजनीतिक दलों और भूमिगत माओवादियों के बीच जो वृहत शांति समझौता हुआ था वह भी दिल्ली में ही किया गया था। उस समय संप्रग सरकार में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की भी भूमिका हुआ करती थी। उन्होंने ही नेपाल के राजनीतिक दलों और माओवादियों के बीच सहमति कराई थी।

चूंकि नेपाल में राजशाही को हटाने, लोकतंत्र की पुनर्स्थापना करने, सशस्त्र विद्रोह में भूमिगत रहे माओवादियों और राजनीतिक दलों के बीच समझौता कराने पर नेपाली राजनेता इतने एहसान तले दबे थे कि सोनिया गांधी की इस इच्छा के विपरीत वे जा ही नहीं पाए। यही कारण था कि नेपाल को पंथनिरपेक्ष देश घोषित करने के बाद गिरिजाप्रसाद कोइराला जब दिल्ली गए तो उनका सम्मान करने के लिए विमानस्थल पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पहुंचे थे। माना जाता है कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी के साथ नेपाल भ्रमण पर गर्इं सोनिया गांधी को पशुपतिनाथ मंदिर में जाने से रोक दिया गया था। पशुपतिनाथ मंदिर में सनातन धर्म को मानने वालों को ही प्रवेश दिया जाता है। विदेशी मूल की होने के कारण पशुपतिनाथ मंदिर के मूलभट्ट ने सोनिया गांधी को राजीव गांधी के साथ मंदिर के गर्भगृह में विशेष पूजा करने से रोक दिया था। सोनिया ने इसे अपना अपमान माना था। कहा जाता है कि इसी अपमान का बदला लेने के लिए सोनिया गांधी ने नेपाल से राजशाही के खात्मे तक आन्दोलन को रुकने नहीं दिया और नई व्यवस्था लागू होने पर सबसे पहले हिन्दू राष्ट्र की संवैधानिक वैधता समाप्त कराई। इतना ही नहीं, माओवादियों के सत्ता में आने और प्रचण्ड के प्रधानमंत्री बनते ही सबसे पहला हमला पशुपतिनाथ के उसी मूलभट्ट पर हुआ था। नेपाल की माओवादी सरकार ने सदियों पुरानी सांस्कृतिक परम्परा पर चोट करते हुए पशुपतिनाथ मंदिर के भारतीय नागरिक मूलभट्ट को हटाने का प्रयास भी किया था।

नेपाल के जनमानस में यह बात पैठी है कि भारत की कांग्रेस नीत संप्रग सरकार की सहमति से ही हिन्दूराष्ट्र वाली उनकी विशिष्ट पहचान छीन ली गई थी। यही कारण था कि 2014 में जब भाजपा के नेतृत्व में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार बनी तब आम नेपाली नागरिक काफी उत्साहित थे। नेपाली जनता का यह उत्साह प्रधानमंत्री मोदी के पहले नेपाल भ्रमण में दिखाई भी दिया।