प्रभु ननों को पादरियों से बचाएं!

    दिनांक 25-दिसंबर-2020   
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हमदर्दी की चादर ओढ़े हुए चर्च के चेहरे के पीछे घना अंधेरा है। यहां ननों के लिए घुटन है, सिसकियां हैं और सिर्फ खामोशी है। यदि किसी ने इस अंधेरे से पर्दा उठाने की कोशिश की तो वह आवाज खामोश कर दी गई। 28 बरस पहले सिस्टर अभया के साथ ऐसा ही हुआ था। उन्होंने दो पादरियों और एक नन को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था। राज खुल न जाए इसलिए उनको मार डाला गया। एक पादरी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया। जबकि बाकी दोनों को क्रिसमस से पहले अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई है
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जब दुनियाभर के ईसाई समुदाय के लोग क्रिसमस की बधाई लेने-देने में व्यस्त हैं, इसी बीच 28 साल पुराने एक मामले में केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम स्थित सीबीआई की विशेष अदालत के फैसले ने फिर एक बार चर्च परिसर में अनैतिक संबंधों की एक और कहानी पर अपनी मुहर लगाई है। यह मामला है पादरी थॉमस कोट्टूर होजे फूथराकयाल और सिस्टर सेफी के बीच अनैतिक संबंधों का।

हुआ यूं था कि 27 मार्च, 1992 की भोर में लगभग 4.15 बजे अपने हॉस्टल के कमरे से रसोई में जाने के दौरान सिस्टर अभया ने उक्त नन और पादरी को आपत्तिजनक हालत में देख लिया था। दोनों को इस हालत में देखने के बाद अभया का जीवित बचे रहना उनकी सामाजिक पहचान के लिए खतरा बन गया था। इसलिए पादरी और नन दोनों ने मिलकर सिस्टर अभया के सिर पर किसी भारी चीज से वार किया और फिर उसके शव को कुएं में फेंक
दिया। केरल पुलिस ने इसे आत्महत्या बताया था, बाद में विरोध प्रदर्शन होने पर इस मामले को सीबीआई को सौंपा गया।

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दरअसल चर्च में पादरियों और बिशपों द्वारा ननों का उत्पीड़न कोई नई बात नहीं है। इसी बढ़ते उत्पीड़न का परिणाम है कि दुनिया भर में ईसा मसीह को अपना पति मानकर जीवन समर्पित करने वाली ननों की संख्या कम होती जा रही है। केरल जैसे राज्य में तो यह संख्या गिरकर 25 प्रतिशत तक रह गई है। इसी का परिणाम है कि चर्च अपने पांव पूर्वोत्तर भारत में पैर पसार रहा है। इसके अलावा अन्य राज्यों छत्तीसगढ़, झारखंड, हिमाचल, ओडिशा जैसे राज्यों के गरीब परिवारों की लड़कियों को छल, बल और प्रलोभन के बूते चर्च में ला रहा है।

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पादरी थॉमस कोट्टूर (बाएं) और सिस्टर सेफी (दाएं) के बीच अनैतिक संबंधों की बलि चढ़ी सिस्टर अभया (मध्य में)

60 के दशक में चर्च में ननों की भर्ती भारत में अचानक बहुत बढ़ गई थी, जो 1985 से धीरे—धीरे कम होनी शुरू हुई। चर्च पहले, कन्वर्ट हुए गरीब ईसाई परिवारों से उनकी एक बेटी को ‘जीसस के आदेश’ के नाम पर अपने कन्वेन्ट में रख लेता था। जहां उन्हें नर्स, शिक्षिका या फिर नन बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था। चर्च को बसूबी पता था कि शिक्षा और स्वास्थ्य के रास्ते ही वह भारत में घर-घर तक पहुंच सकता है। लेकिन लड़कियों को नन बनाकर चर्च की चारदीवारी के अंदर होने वाले यौन शोषण के चर्चे जब बाहर आने लगे, तो ईसाई परिवारों ने अपनी बेटियों को चर्च को देने से इनकार करना प्रारम्भ कर दिया।

 बेशर्मी की हद

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चर्च की बेशर्मी की हद यह है कि कैथोलिक सभा के नए साल के कैलेंडर में मार्च महीने के पृष्ठ पर ननों से यौनाचार और दुर्व्यवहार के दोषी बिशप फ्रÞैंको मुलक्कल की तस्वीर छापी गई है। यह तस्वीर सीरो-मालाबार कैथोलिक चर्च के त्रिशूर आर्चडायसिस के 2021 के नए आधिकारिक कैलेंडर में अन्य बिशपों की तस्वीरों के साथ छपी है।


ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं हो रहा था, पूरी दुनिया में चर्च को बेटी देने से इनकार करने वालों की संख्या बढ़ने लगी। इसी का परिणाम था कि अमेरिका में जहां साठ साल पहले दो लाख के आस-पास नन थीं, वहीं उनकी संख्या पचास हजार से भी कम हो गई है।

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इटली में जब पूर्व नन फेडरिका और इसाबेल ने आज चार साल पहले समलैंगिक शादी की तो दोनों ईसाई समुदाय के बीच पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनीं। फेडरिका ने चर्च में ननों के बीच बनने वाले समलैंगिक संबंधों और चर्च परिसर में होने वाले बलात्कार पर लिखा। जब उसने तीन साल तक संबंध में रहने के बाद पूर्व नन इसाबेल से शादी करने का निर्णय लिया तो उसे कई समाचार पत्रों ने ‘बहिष्कृत नन’ लिखा। फेडरिका ने ही लिखा कि ‘‘चर्च के अंदर कोई लोकतंत्र नहीं है। पादरियों का वर्चस्व है। नन वहां वासना का शिकार होने के लिए है’’। फेडरिका की बात को इस संदर्भ में परखा जा सकता है कि जहां एक तरफ चर्च में ननों की संख्या तेजी से घट रही है, वहीं पादरियों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है।

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पिछले दिनों हमने बिशप फ्रैंको मुलक्कल के मामले में भी चर्च के पुरुषवादी रवैये को देखा। मुलक्कल पर चल रहे नन बलात्कार के मामले में उनके खिलाफ मुख्य गवाह फादर कुरियाकोस कट्टूथारा का शव संदिग्ध हालत में उनके जालंधर स्थित घर से मिला था। कुरियाकोस के छोटे भाई जोस कुरियन ने केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन को पत्र लिखकर अपने भाई को मिल रही जान से मारने की धमकी के संबंध में बताया था।

 जून 2018 में मुलक्कल के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई थी। इसमें नन ने आरोप लगाया था कि 2014 से 2016 के बीच बिशप मुलक्कल ने उसका यौन शोषण किया था। इस मामले में बिशप मुलक्कल तक नन को कैद में रखने, उसका बलात्कार करने, अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने और चुप रहने के लिए धमकाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। मुलक्कल के खिलाफ गवाही देने वाली एक दूसरी नन ने भी उस पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। दूसरी नन के अनुसार, फ्रैंको मुलक्कल ने 2015 से 2017 के बीच उसका यौन उत्पीड़न किया था।

बिशप पर आरोप लगने के बाद चर्च का पूरा पुरुषतंत्र सक्रिय हो गया था। सिस्टर लिसी इस मामले के प्रमुख गवाहों में से एक थी। लिसी के अनुसार, फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ दिए गए बयान को बदलने के लिए उस पर लगातार दबाव डाला जा रहा था। उल्लेखनीय है कि आरोपित बिशप को नोटिस जारी करने के बाद केरल सरकार ने पुलिस के एक अधिकारी का तत्काल तबादला कर दिया था। उन पांच ननों में से चार का तबादला भी बिशप मुलक्कल के मामले में हुआ, जो उसके खिलाफ प्रदर्शन कर रही थीं। चार ननों को कोट्टायम जिला स्थित कॉन्वेंट छोड़ने का निर्देश मिला था। यह निर्देश रोमन कैथोलिक चर्च के जालंधर डायसिस के तहत ‘मिशनरीज आॅफ जीसस’ ने दिया था।

चर्च की छत्रछाया में सिर्फ महिलाएं ही असुरक्षित हैं, ऐसा नहीं है। वहां बच्चे तक सुरक्षित नहीं हैं। पिछले साल चेन्नै के एक मिशनरी कॉलेज का मामला चर्चित हुआ था, जिसके दो शिक्षकों,प्रोफेसर सेमुएल टेनिसन और आर. रवीन ने अपनी ही 34 छात्राओं का यौन उत्पीड़न किया था। ज्यादा वक्त नहीं बीता , जब झारखंड में भी ईसाई मिशनरियों ने ठीक ऐसे ही कांड को अंजाम दिया था।


इतना सब होने के बाद भी चर्च की बेशर्मी की हद देखिए कि कैथोलिक सभा के नए साल के कैलेंडर में मार्च महीने के पृष्ठ पर बिशप फैं्रको मुलक्कल की तस्वीर लगा दी गई है। यह तस्वीर सीरो-मालाबार कैथोलिक चर्च के त्रिशूर आर्चडायसिस के 2021 के नए आधिकारिक कैलेंडर में अन्य बिशपों की तस्वीरों के साथ लगाई गई है।

सिस्टर लूसी कलाप्पुरा की आत्मकथा
बिशप और पादरियों द्वारा यौन उत्पीड़न की कहानी को सिस्टर लूसी कलाप्पुरा की आत्मकथा ‘कार्ताविन्ते नामातिल’ (भगवान के नाम पर) में भी पढ़ा जा सकता है। उसे पढ़कर स्पष्ट होता है कि चर्च में यौन शोषण और उत्पीड़न पहले भी चल रहा था। फर्क सिर्फ इतना आया है कि पहले किसी नन के शोषण/उत्पीड़न की बात सामने आने पर बड़े अधिकारी पहले सिस्टर का समर्थन करते थे, लेकिन अब समय बदल गया है। अब वे आरोपियों के बचाव में लग जाते हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ईसाई सभा फ्रांसिस्कन क्लैरिस्ट कॉन्गीगेशन (एफसीसी) ने ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने जैसे कई बचकाने आरोप लगाकर सिस्टर लूसी कलाप्पुरा को सभा से निलंबित किया। सिस्टर लूसी कहती हैं कि बिशप और पादरियों के कारनामों के बारे में सब जानते हैं, बस कोई बोलता नहीं है।


चर्च ने माना
बच्चों का यौन शोषण हुआ
कैथोलिक चर्च  की प्रकाशित आंतरिक रिपोर्ट के अनुसार ईसाई पादरियों ने कम से कम 175 बच्चों का यौन शोषण किया है। रिपोर्ट कहती है, लीजियनरीज आॅफ क्राइस्ट के संस्थापक मार्शियल मैसिएल ने ही 60 बच्चों का यौन शोषण किया है। साथ ही रिपोर्ट कहती है कि यह संख्या 60 से अधिक भी हो सकती है। गौरतलब है कि जो आंकड़े रिपोर्ट में सामने आए हैं, वे 1941 से 2019 के बीच के हैं। इस बीच 33 पादरियों ने कम उम्र के बच्चों का यौन उत्पीड़न किया। इन सभी मामलों में यौन उत्पीड़न साबित हो चुका था। अपराध साबित हो जाने के बावजूद 18 पादरियों को चर्च ने निष्कासित करना जरूरी नहीं समझा। बलात्कारी पादरी अब भी  चर्च के काम में लगे हुए हैं। अब वे ऐसे कार्यों में सहयोग कर रहे हैं, जिसमें बच्चों से जुड़े विषय शामिल नहीं हैं। क्या अपराधी प्रवृत्ति की पादरियों के लिए इतनी सजा पर्याप्त है?
यौन शोषण पर बोलती रहीं सिस्टर जेस्मी
सिस्टर लूसी कलाप्पुरा की तरह कॉन्ग्रीगेशन आॅफ मदर आॅफ कार्मेल (सीएमसी) से निकलकर सिस्टर जेस्मी भी चुप नहीं रहीं। वह चर्च की खामियों और चर्च परिसर के अंदर हो रहे यौन शोषण पर बोलती रहीं और लिखा भी। उनकी किताब ‘आमीन : एक नन की आत्मकथा’, बहुचर्चित है। यह किताब अब तक मलयालम (2009), अंग्रेजी (2009), तमिल (2009) और हिन्दी (2009) में उपलब्ध हो चुकी है। किताब में ननों के समलैंगिक आचरण से लेकर पादरियों द्वारा सहजता से उपलब्ध नन को विशेष सुख-सुविधा उपलब्ध कराने तक का उल्लेख है। जो नन पादरी को जितना खुश रखती, उसके लिए चर्च के अंदर उतनी अधिक सुविधाएं उपलब्ध होतीं। मतलब चर्च के अंदर पादरी ही सर्वेसर्वा बने बैठे हैं, नन उनकी सेवा करें और सुविधाएं पाएं। समलैंगिक रिश्ते में गर्भवती होने की संभावना नहीं होती। ऐसे संबंध चर्च के अंदर बन रहे हैं, इसकी जानकारी भी बाहर नहीं जा पाती। इसलिए इसे सहज माना जाता है। वरिष्ठ नन समलैंगिक संबंध बनाने के लिए जबरदस्ती भी करती हैं। ये सारी बातें जेस्मी ने लिखी हैं और जो भी लिखा है, वह सुनी—सुनाई बात नहीं है। उनका भोगा हुआ यथार्थ है।

‘जीसस की शरण में मिला उत्पीड़न’

सिस्टर मेरी चांडी की किताब ‘ननमा निरंजावरे स्वास्ति’ मई 2012 में आई थी। उन्हें 2000 में चर्च से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था, जब वे 55 साल की थीं। उन्होंने एक पादरी द्वारा बलात्कार की कोशिश का विरोध किया था। बस इस बात पर उन्हें चर्च से बाहर चले जाने का आदेश मिल गया। चांडी के अनुसार नन रहकर वे जिस यातना से गुजरी हैं, उस वेदना की अभिव्यक्ति है उनकी वह किताब। वे 13 साल की उम्र में चर्च में आई थीं। जिनके बीच उन्होंने अपने जीवन के 40 साल बिता दिए, उनमें अधिकांश आध्यात्मिकता की तुलना में वासना में अधिक डूबे थे। चांडी ने लिखा है कि किस तरह वे 13 साल की उम्र में ईश्वर की सेवा में समर्पित होने के लिए घर से भाग कर आई थीं, लेकिन उनकी पूरी जिन्दगी शोषण और अकेलेपन के नाम हो गई। 75 साल की हो चुकी मेरी चांडी ने अब भी हार नहीं मानी है, और उत्तरी केरल के वायनाड में बच्चों के लिए एक अनाथालय चला रही हैं।

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चर्च की पूरी दुनिया में ‘वासना के केन्द्र’ के नाम से पहचान बनती जा रही है। इसको लेकर वेटिकन भी च्ािंतित है। धीरे—धीरे बच्चे और महिलाएं चर्च से दूर हो रही हैं। यदि अब इस संबंध में कुछ ठोस कदम नहीं उठाया गया तो चर्च में सिर्फ बिशप और पादरी ही रह जाएंगे, नन और सिस्टर नहीं होंगी। पत्रकार क्रिस्टोफर लिवसे चर्च के यौन उत्पीड़न, बलात्कार और जबरन गर्भपात के रवैये पर लिखते हैं-‘‘जब वेटिकन इस मुद्दे पर कुछ ठोस कदम उठाने पर विचार कर रहा है और इस तरह के मामलों पर मिट्टी डालने की कोशिश कर रहा है, ऐसे समय में पीड़िताएं बोल उठी हैं। नन एक स्वर में बलात्कार, जबरन गर्भपात, भावनात्मक शोषण और श्रम शोषण सहित पादरीवाद के खिलाफ आवाज बुलन्द कर रही हैं’’।

वेटिकन के एक अखबार के परिशिष्ट वूमन चर्च वर्ल्ड में फरवरी 2019 में अनेक ननों के संबंध में कहानी आई, जिन्हें गर्भपात के लिए मजबूर किया गया था। जिन ननों ने गर्भपात के लिए किसी भी हालत में सहमति देने से इनकार कर दिया उनके बच्चों को अनाथ बताकर कॉन्वेन्ट में दाखिला दे दिया गया। पत्रिका में यहां तक बताया गया कि नन बिना पिता के अपने बच्चों को पालने के लिए विवश हैं। इसमें यह भी बताया गया कि वेटिकन को 1990 के दशक में अफ्रीका में पादरियों द्वारा ननों के बलात्कार की खबरें मिलती रही हैं।

यह 2019  की बात है, जब पोप फ्रांसिस ने चर्च के अंदर यौन उत्पीड़न की समस्या को स्वीकार किया था। बावजूद इसके चर्च में गर्भपात वाली खबर को प्रकाशित होने के बाद वूमन चर्च वर्ल्ड के संपादक को पत्रिका छोड़नी पड़ी थी।
चर्च की छत्रछाया में सिर्फ महिलाएं ही असुरक्षित हैं, ऐसा नहीं है। वहां बच्चे तक सुरक्षित नहीं हैं। पिछले साल चेन्नै के एक मिशनरी कॉलेज का मामला चर्चित हुआ था, जिसके दो शिक्षकों प्रोफेसर सेमुएल टेनिसन और आर. रवीन ने अपनी ही 34 छात्राओं का यौन उत्पीड़न किया था।

पूरी दुनिया से मिशनरी (चर्च) गतिविधियों में उत्पीड़न की खबरें सामने आने की वजह से अब लोगों का विश्वास ईसाई शैक्षणिक संस्थानों से भी उठने लगा है। वे विद्या मंदिर, केन्द्रीय विद्यालय, दिल्ली पब्लिक स्कूल, दयानंद एंग्लो वैदिक स्कूल, नवोदय जैसे विद्यालयों पर अधिक विश्वास करने लगे हैं। सच तो यही है कि पादरियों के यौन उत्पीड़न से जुड़ी खबरों ने चर्च के प्रति ईसाई समाज को विश्वास को हिला कर रख दिया है।