पं. मदनमोहन मालवीय जयंती (25 दिसंबर) पर विशेष : हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्थान के उन्नायक

    दिनांक 25-दिसंबर-2020
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प्रो रमाशंकर दूबे
हिन्दी, हिन्दू और हिंन्दुस्थान को समर्पित पं. मदनमोहन मालवीय ने अंतिम सांस तक भारतभूमि की सेवा की। उनके द्वारा स्थापित काशी हिन्द ूविश्वविद्यालय देश के सर्वोच्च शिक्षण संस्थानों में से एक है 
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पं. मदनमोहन मालवीय

एक महान देशभक्त, दूरदर्शी शिक्षाविद्, उत्कृष्ट समाज सुधारक, अग्रणी पत्रकार, सफल सांसद, भारतीय राष्ट्रवाद के महान अग्रदूत तथा बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी भारतरत्न महामना पंडित मदनमोहन मालवीय का जन्म 25 दिसंबर, 1861 को प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। महामना की मननशीलता ने राष्ट्र निर्माण में शिक्षा और शिक्षण संस्थानों की जिस भूमिका की परिकल्पना की, काशी हिंदू विश्वविद्यालय उसका जीवन्त स्वरूप है, जिसकी स्थापना से संपूर्ण विश्व में शिक्षा के इतिहास में एक नव अध्याय का सृजन हुआ। महामना की परिकल्पना थी कि हमारे शिक्षण संस्थानों के माध्यम से विद्यार्थी प्राचीन भारत की उच्च परंपराओं एवं मूल्यों को आत्मसात करते हुए मानविकी, कला, आधुनिक विज्ञान एवं तकनीकी की विविध विधाओं में दक्षता प्राप्त करें। उनकी सोच थी कि हमारे शिक्षण संस्थान विश्व ज्ञान के समृद्ध केंद्र हों, जहां विद्यार्थी निरंतर पठन-पाठन एवं शोधपूर्ण जानकारी और जिज्ञासाओं के बल पर पौराणिक भारतीय सभ्यता, दर्शन, धर्म, मानविकी, कला से लेकर आधुनिक कलाओं विज्ञान, चिकित्सा, कृषि एवं तकनीकी के विभिन्न क्षेत्रों में नव-नव मार्गों को प्रशस्त करें। राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 वास्तव में मालवीय जी के सपनों को साकार करने की दिशा में एक ऐतिहासिक एवं क्रांतिकारी कदम है। युवाओं को यह सुअवसर प्रदान करती है कि वे भारत की गौरवशाली परंपराओं एवं पौराणिक मान्यताओं को आत्मसात करते हुए आधुनिक कला, विज्ञान एवं तकनीकी में परिपुष्टता प्राप्त करें, भारतीयता से ओतप्रोत वैश्विक मानव बनें तथा  मानव सेवा के नए आयाम स्थापित करें।

यह मालवीय जी की शिक्षा-दृष्टि ही थी कि प्राचीन भारत के गुरुकुल तथा तक्षशिला, नालंदा एवं विक्रमशिला जैसे शिक्षा के आदर्श केंद्रों की परंपरा को पुनर्जीवित एवं संवर्धित करते हुए भारतीय ज्ञान-विज्ञान की अति समृद्ध एवं गौरवशाली दृष्टि के साथ पश्चिम के अत्याधुनिक ज्ञान-विज्ञान का अद्भुत मेल स्थापित किया जाए। मालवीय जी छात्रों में चरित्र निर्माण और चारित्रिक उन्नयन को बौद्धिक विकास से अधिक महत्वपूर्ण मानते थे तथा चरित्र निर्माण के लिए धर्म और नीति  की शिक्षा के पक्षधर थे। प्राचीन भारत एक उन्नत ज्ञान आधारित समाज था, जहां वैदिक एवं उपनिषदिक काल से ही गुरुकुल के रूप में शिक्षा की गौरवशाली परंपरा थी। इस परंपरा का निर्माण उच्च कोटि के ज्ञानी गुरुओं, ऋषियों और उद्भट विद्वानों ने किया था। अतुलनीय ज्ञान वाले संतों, कवियों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों, खगोलविदों तथा गणितज्ञों ने इस शिक्षा पद्धति को समृद्ध किया। छात्रों के सर्वांगीण विकास के प्रति समर्पित भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और भारतीय दृष्टि के अनुरूप उच्च कोटि के भारतीय पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान को आत्मसात करती शिक्षा व्यवस्था के कारण ही भारत विश्वगुरु था। मालवीय जी के अनुसार, ‘‘गुरुकुल की शिक्षा व्यवस्था के अनुरूप शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान और कौशल सशक्तिकरण के अतिरिक्त ऐसे युवाओं का सृजन करना है जो सर्वांगीण अर्थात् भौतिक, नैतिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक रूप से विकसित हों।’’ मालवीय जी की शिक्षा दृष्टि भौतिकता को नैतिकता से जोड़ने की है ताकि शरीर के विकसित होने के साथ-साथ मन शुद्ध होकर विकसित हो तथा आत्मा भी विकसित हो। उनकी दृष्टि युवाओं में मानवीय मूल्यों जैसै शांति की चाह, सत्य में संलिप्तता, उच्च विचार, अहिंसा, सहिष्णुता, धैर्य, संवेदना, सभी जीवों के लिए प्रेम, मातृभूमि के प्रति आदर तथा इसकी संस्कृति एवं आदर्शों के प्रति समर्पण चाहती है। 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में तीन वर्ष की आयु से लेकर उच्च शिक्षा के हर स्तर पर छात्र के लिए भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों, परंपराओं, लोक कलाओं, भारतीय भाषाओं एवं मानवीय मूल्यों के शिक्षण की व्यवस्था की गई है जिसके लिए उपयुक्त पाठ्य-सामग्री एवं पाठ्य विधियां विकसित की जानी हैं। पाठ्यक्रम में जनजातीय एवं स्वदेशी ज्ञान सहित भारतीय ज्ञान प्रणालियों को समाहित करने का भी प्रावधान है। यह शिक्षा नीति समृद्ध भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं की ठोस बुनियाद पर भारत की सांस्कृतिक विरासत तथा मूल्यपरक ज्ञान-भंडार को समाहित करते हुए ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व वाले छात्रों के सृजन का संकल्प लेती  है जिनका  शरीर विकसित हो, मन स्वस्थ हो, आदर्श उच्च कोटि के हों तथा वें 21 वीं सदी की वैश्विक चुनौतियों का सफलता से सामना करने में सक्षम हों। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहली शिक्षा नीति है, जो शिक्षा में उत्कृष्टता लाने हेतु भारत के पारंपरिक ज्ञान, भाषाओं और सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने तथा वैश्विक अद्यतन ज्ञान के अद्भुत समन्वय के साथ इसे छात्रों में आत्मसात करने की आवश्यकता पर बल देती है जिससे हमारे शिक्षित युवाओं की जड़ें भारतीयता में होंगी और वे ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न आयामों में दक्ष होकर एक सफल वैश्विक नागरिक बनकर विभिन्न क्षेत्रों में भारत का नेतृत्व कर सकेंगे।

‘हिंदी, हिंदू और हिंदुस्थान’ के उत्थान के प्रति समर्पित मालवीय जी मातृभाषा में शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे। उनका मानना था, ‘‘छात्रों की सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा न होकर एक विदेशी भाषा है। सभ्य संसार के किसी भी अन्य भूभाग में उस समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है।’’ उनका स्पष्ट मत था कि साहित्य और देश की उन्नति अपने देश की भाषा के द्वारा ही हो सकती है। विदित हो कि प्राचीन वैदिक काल से 19वीं सदी के मध्य तक अपने देश में गुरुकुल तथा उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षा का माध्यम संस्कृत एवं भारतीय भाषाएं थीं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के कार्यान्वयन से भारत में 185 वर्ष से चली आ रही मैकाले की दासता भरी शिक्षा नीति से जिसमें प्राथमिक कक्षाओं से ही विदेशी भाषा में अध्ययन- अध्यापन का खुला प्रावधान है, निश्चित रूप से मुक्ति मिलेगी। इस शिक्षा नीति से छात्र तीन वर्ष की उम्र से ही कक्षा पांच तक मातृभाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे। इस शिक्षा नीति में कक्षा आठ और उसके आगे उच्च शिक्षा के लिए भी छात्र की इच्छा के अनुरूप भारतीय भाषाओं में अध्ययन का प्रावधान है।

भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। बाल्यावस्था से ही मातृभाषा या स्थानीय भाषा में अध्ययन से छात्र के मस्तिष्क में चिंतन, स्मरण की प्रक्रिया का सहज व त्वरित विकास होगा। मातृभाषा, संस्कृति और स्थानीय संस्कारों के प्रति ममत्व और आत्मीयता का भाव जगेगा। मौलिक चिंतन मातृभाषा में ही संभव है, इसलिए मातृभाषा में लिया हुआ ज्ञान स्वाभाविक रूप से स्वीकार्य होगा। मालवीय जी का मत था कि ज्ञान-विज्ञान की अधिकाधिक पुस्तकों का लेखन, प्रकाशन और अध्ययन-अध्यापन मातृभाषा में किया जाए, ताकि यह विद्यार्थियों तक सहजता से पहुंच सके। इसी को ध्यान में रखकर उन्होंने स्वयं 1930 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी प्रकाशन समिति की स्थापना की। जहां आज भी निरंतर विश्वविद्यालय के मूर्धन्य वैज्ञानिकों तथा उत्कृष्ट विद्वानों द्वारा विज्ञान के विविध विषयों में विश्वविद्यालय स्तरीय मौलिक एवं अनूदित पुस्तकों का लेखन और प्रकाशन जारी है। मालवीय जी की दृष्टि के अनुरूप राष्ट्रीय शिक्षा नीति: 2020 में यह  स्पष्ट प्रावधान है कि हमारे राष्ट्र  की गौरवशाली संस्कृति की संवाहिका भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहित किया जाएगा तथा विभिन्न भाषा संस्थानों की यह प्रमुख जिम्मेदारी होगी कि वे भारतीय भाषाओं  में वैज्ञानिक साहित्य की उपलब्धता सुनिश्चित करें तथा पारंपरिक कला लोक विद्या को प्रोत्साहित करें। प्राचीन भारत के उद्योग एवं कला कौशल की विशेषता का वर्णन करते हुए मालवीय जी ने कहा था, ‘‘यूरोप के विद्वान अब यह भी मानते हैं कि चित्रकर्म, मूर्ति-निर्माण, वस्त्र-निर्माण, आभूषण-रचनाएं, संगीत, नाट्य इत्यादि शिल्प और कला भारतवर्ष में उस समय उच्च कोटि में पहुंच गए थे जब यूरोप में विद्याओं और कलाओं का आरंभ भी नहीं हुआ था।’’

मालवीय जी का मत था कि शिक्षा सारे सुधारों की जड़ है। उन्होंने सभी के लिए शिक्षा की बात कही थी। उनका सपना था कि शिक्षा का ऐसा प्रबंध हो कि कोई भी बच्चा गरीबी के कारण शिक्षा से वंचित न रह पाए। मालवीय जी के कालखंड में ब्रिटिश शासन के अधीन तत्कालीन भारतीय समाज घोर अशिक्षा के दौर से गुजर रहा था। शिक्षा सबके लिए सुलभ हो, मालवीय जी के इस सपने को साकार करने की दिशा में शिक्षा नीति-2020 के अंतर्गत देश के हर व्यक्ति तक शिक्षा पहुंचाने के उद्देश्य से 2030 तक सकल नामांकन अनुपात को 100 प्रतिशत लाने का लक्ष्य रखा गया है। समाज के सुदूर क्षेत्रों में आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर और हाशिए पर पहुंचे हुए हर वर्ग के लिए शिक्षा को समावेशी बनाते हुए तकनीकी हस्तक्षेप से तथा डिजिटल प्रौद्योगिकी के माध्यम से अगले 10 वर्ष में शत प्रतिशत साक्षरता सुनिश्चित की जा सकेगी। प्रौद्योगिकी द्वारा डिजिटल शिक्षा संसाधनों का विकास किया जाएगा जिसके माध्यम से सुदूर क्षेत्रों में शिक्षा ढांचे में मजबूती मिलेगी और शिक्षा का विकास होगा। इस  शिक्षा नीति में भाषाओं से संबंधित शिक्षण हेतु डिजिटल इंडिया मिशन का योगदान महत्वपूर्ण होगा जिससे ग्रामीण इलाकों के छात्र ज्यादा लाभान्वित हो सकेंगे। यहीं नहीं, उच्च शिक्षा में 18-23 वर्ष आयु वर्ग में जो सकल नामांकन अनुपात  2018 में  26.3  प्रतिशत था, इसे बढ़ाकर 2035 तक 50 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है। जाहिर है, शत प्रतिशत साक्षरता तथा उच्च शिक्षा में बढ़े नामांकन अनुपात के लक्ष्य को प्राप्त करने में अतिरिक्त खर्च की आवश्यकता होगी। इसके लिए नई शिक्षा नीति में यह प्रावधान किया गया है कि सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत बजट शिक्षा पर खर्च किया जाएगा, जो खर्च अभी 4.6 प्रतिशत है। समाज के हर वर्ग के लोगों तक बिना किसी अवरोध के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाने तथा एक विकसित शिक्षित समाज के निर्माण हेतु यह शिक्षा नीति 2030 तक देश के प्रत्येक जिले में कम से कम एक विश्वस्तरीय बहुविषयक शिक्षण संस्थान की स्थापना पर बल देती है।

मालवीय जी छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए बहुविषयक शिक्षा को अनिवार्य मानते थे।  वे प्राचीन भारत की ज्ञान परंपरा, संस्कृति, दर्शन, कला व विज्ञान के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान और तकनीकी की शिक्षा के प्रबल हिमायती थे। उनका मानना था कि भारतीय उच्च शिक्षण संस्थाएं  बहुविषयक होनी चाहिए जहां ज्ञान-विज्ञान की विभिन्न विधाओं की शिक्षा दी जाए। साथ ही  समेकित शिक्षा दी जाए जिससे प्रतीची प्राची (पश्चिम और पूरब) का सुंदर मेल स्थापित हो सके। उनका मत था कि भारत की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान, कला, दर्शन, नैतिकता, सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों का प्रमुख रूप से पाठ्यक्रम में समावेश हो तथा इसके साथ ही मौलिक एवं अत्याधुनिक  विज्ञान, अभियांत्रिकी, कृषि एवं चिकित्सा के शिक्षण पर भी गहन बल हो ताकि सर्वांगीण रूप से विकसित ऐसे छात्रों का सृजन हो जो प्राचीन काल से संजोए हुए भारतीय सभ्यता में निहित सांस्कृतिक एवं मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पित हों तथा उच्च कोटि के वैज्ञानिक, अभियंता, औद्योगिक-उद्यमी, व्यवसायी, समाजसेवी  बनें,  जो वैज्ञानिक पद्धति से गरीबी से जूझ रही जनता की समस्याओं का निदान कर सकें, कृषि और औद्योगिक विकास में बढ़ावा दे सकें  तथा  विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व प्रदान कर  भारत  को समृद्ध कर सकें। मालवीय जी का  मानना था कि भारत की गरीबी को दूर करने में विज्ञान और तकनीकी शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका होगी तथा भारत तब तक समृद्ध नहीं हो सकता जब तक यहां का आम जनमानस आधुनिक विज्ञान की उपलब्धियों को अपने रोजमर्रा के जीवन में स्वाभाविक रूप से आत्मसात न कर ले।

मालवीय जी आधुनिक विज्ञान और तकनीकी के शिक्षण-प्रशिक्षण को तथा नवाचार-युक्त शोध के साथ विभिन्न क्षेत्रों में ज्ञान सृजन को बढ़ावा देने के पक्षधर थे, ताकि हमारी राष्ट्रीय प्राकृतिक संपदा का संरक्षण, विकास और लाभदायक नियोजन हो सके तथा जनमानस की आर्थिक समृद्धि हो और रोजगार के सुअवसर के मार्ग प्रशस्त हो सकें। शोध खोज तथा ज्ञान सृजन का आधार है जहां से नए सिद्धांत, नई तकनीक आदि का जन्म होता है। इसके माध्यम से मानव संस्कृति को ऊंचाई प्राप्त होती है। शोध उच्च शिक्षा का एक महत्वपूर्ण मानक है। इसलिए आवश्यक है कि उच्च शिक्षा में कार्यरत संस्थाएं, नई तकनीक से पढ़ाई इत्यादि के लिए सतत प्रयत्नशील रहें। व्यक्ति में लगातार सीखने की प्रवृत्ति को जागृत करने के लिए इन संस्थाओं में सुविधाएं होनी चाहिए। इसलिए आवश्यक है कि शिक्षण संस्थाओं में  नवाचार-युक्त शोध को विकसित होने का अवसर प्रदान किया जाए। देश में शोध की संस्कृति को बढ़ावा देने तथा शोध की गुणवत्ता में समृद्धि लाने हेतु नई शिक्षा नीति एक राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एनआरएफ) की स्थापना को प्रस्तावित करती है, जिससे शोध को सही रूप में विकसित और उत्प्रेरित किया जा सके।

आज मानव जीवन को आरामदेह बनाने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, लेकिन मालवीय जी और उन जैसे महापुरुषों की ‘दृष्टि’ से हम दूर होते चले जा रहे हैं। आज समाज में मूल्यों के क्षरण तथा चरित्र के अवमूल्यन को रोकने के लिए तथा मूल्यों की समृद्धि और चारित्रिक उन्नयन के लिए मालवीय जी की ‘दृष्टि’ को ध्यान में रखते हुए शिक्षण संस्थाओं की यह महती जिम्मेदारी बनती है कि युवाओं में नैतिकता, चारित्रिक उन्नयन तथा देश-भक्ति का भरपूर भाव भरें, इस भाव की स्पष्ट प्रतिबद्धता

आज स्वतंत्र भारत में पहली बार राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 में परिलक्षित हो रही है।

 (लेखक गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर के कुलपति हैं)