‘दीदी’ का खौफ दिल्ली तक!

    दिनांक 30-दिसंबर-2020
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बंगाल में ममता सरकार की तानाशाही पर स्थानीय ही नहीं, दिल्ली का मीडिया भी चुप रहता है
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पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार के राजनीतिक आतंक के आगे स्थानीय मीडिया बहुत पहले आत्मसमर्पण कर चुका है। आश्चर्य तब होता है, जब दिल्ली के अखबार और चैनल भी बंगाल का सच दिखाने से डरते हैं। उत्तर 24 परगना जिले में भाजपा कार्यकर्ताओं पर बर्बर लाठीचार्ज का वीडियो सोशल मीडिया पर पूरे देश ने देखा, लेकिन दिल्ली के मीडिया के लिए यह सामान्य खबर थी। किसी ने इसे महत्वपूर्ण नहीं माना। ऐसी घटना किसी भाजपा शासित राज्य में हुई होती तो अगले 15-20 दिन तक वही समाचार हर चैनल पर दिखता। इसी तरह, दिल्ली के जंतर-मंतर पर कृषि कानून के विरोध में धरना दे रहे कांग्रेस के सांसद जसबीर डिंपा ने एक महिला पत्रकार पर हमला कर दिया। पूरी घटना कैमरे में दर्ज हुई, लेकिन सांसद कांग्रेस का था, इसलिए मीडिया को यह प्रेस की आजादी पर हमले या एक महिला के साथ बदसलूकी का मामला नहीं लगा।

रिपब्लिक भारत चैनल पर ब्रिटेन की मीडिया नियामक संस्था ने जुर्माना लगाया है। शिकायतकर्ता पाकिस्तानी नागरिक है, जिसका कहना था कि चैनल ने एक कार्यक्रम में पाकिस्तान को ‘आतंकवादी देश’ कहा है। जुर्माने की खबर पर पाकिस्तान और वहां के आतंकियों से अधिक भारत के सेकुलर पत्रकारों ने जश्न मनाया। ये वही पत्रकार हैं, जो मीडिया पर किसी भी तरह के नियमन का विरोध करते हैं। लेकिन जब एक भारतीय चैनल पर कोई विदेशी नियामक कार्रवाई करता है तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता।

फेक न्यूज के लिए कुख्यात शेखर गुप्ता की वेबसाइट ‘द प्रिंट’ ने छापा कि इस बार भारत-रूस की वार्षिक बैठक नहीं होगी। रिपोर्ट में इसका कारण चीन के विरुद्ध अमेरिका, जापान, आॅस्ट्रेलिया और भारत के गठजोड़ को बताया गया। कहा गया कि रूस इससे नाराज है। जाहिर है यह फर्जी खबर चीन को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य प्रकाशित की गई होगी। राहुल गांधी ने फौरन इस झूठ के आधार पर केंद्र सरकार पर हमला बोलना शुरू कर दिया, लेकिन कुछ ही देर में रूस के राजदूत ने इस झूठ की हवा निकाल दी। उन्होंने रिपोर्ट को मनगढ़ंत बताते हुए कहा कि बैठक कोरोना वायरस के कारण टाली गई है न कि किसी दूसरे कारण से। लद्दाख में चीन के साथ तनाव के समय भी ‘द प्रिंट’ की भूमिका संदिग्ध थी। टाइम्स आॅफ इंडिया, नवभारत टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस समेत कई अखबार लव जिहाद कानून के विरुद्ध अभियान चला रहे हैं। उनके पास झूठे तथ्यों व आरोपों पर आधारित समाचार हैं, जिनके आधार पर वे यह माहौल बनाने में जुटे हैं कि देश में अंतरधार्मिक विवाह करने वालों को परेशान किया जा रहा है। दिल्ली में एक हिंदू महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि उसके पति ने गलत नाम बताकर शादी की और अब उस पर इस्लाम कबूल करने और नमाज पढ़ने के लिए दबाव बना रहा है। लेकिन दिल्ली के ‘लव जिहाद समर्थक’ अखबारों में यह खबर लगभग गायब रही। किसी ने इसे प्रमुखता नहीं दी। इसी तरह, केरल में कोट्टायम के कॉन्वेंट में 28 साल पहले एक नन की हत्या के मामले में पादरी को सजा की खबर को भी प्रमुखता नहीं दी गई। इसकी तुलना हिंदू साधु-संतों को लेकर मीडिया के दुष्प्रचार से करें तो समझते देर नहीं लगेगी कि इसके पीछे चैनलों-अखबारों का असली एजेंडा क्या होता है।

चाइनीज वायरस दिल्ली और केरल में अब भी बेकाबू है। लेकिन मुख्यधारा मीडिया का बड़ा वर्ग अब भी इन दोनों राज्यों की सरकारों की स्तुति में ही लगा है। दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रेस वार्ता करके झूठी जानकारी दी कि यहां पर देश में सबसे अधिक जांच कराए जा रहे हैं। इसे कई चैनलों और अखबारों ने बिना जांचे-परखे चलाया भी, जबकि इसके सारे आंकड़े सहज उपलब्ध हैं।

टाइम्स आॅफ इंडिया ने एक झूठ छापा कि हाथरस में नकली मसाला बनाने की एक फैक्ट्री पकड़ी गई है, जिसमें गधे की लीद का प्रयोग होता था। इस मामले में आरोपी को एक हिंदू संगठन से जुड़ा हुआ बताया गया। बिना किसी पुष्टि के यह झूठ कई प्रोपगेंडा वेबसाइटों पर छा गई। इसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार को दोषी ठहराया जाने लगा, जबकि जिलाधिकारी पहले ही स्पष्टीकरण दे चुके थे कि पकड़े गए सामान में गधे की लीद मिलने की पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन इसी बहाने मीडिया के एक वर्ग विशेष को चटखारे लेने का मौका मिल गया। ल्ल