चन्द्र व नक्षत्रों के खगोल का पौराणिक विमर्श

    दिनांक 30-दिसंबर-2020   
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विविध नक्षत्रों की त्रिवार्षिक प्रच्छादन आवृत्ति में रोहिणी नक्षत्र के पूर्ण प्रच्छादन की औसत आवृत्ति सर्वोच्च होती है। इसका एकमात्र कारण रोहिणी नक्षत्र का उपरोक्त 5 डिग्री 47’ का क्रान्तिवृत्त से विचलन है। पुराणों, संहिता ग्रंथों व खगोलशास्त्र में इसे रोहिणी के प्रति विशेष अनुराग के रूपक के बतौर ‘संरक्षित व व्याख्यायित’ किया गया
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प्रस्तुत स्तम्भ में चन्द्र मण्डल से पृथ्वी के विहंगम मानचित्र के ‘महाभारत’ व ‘पद्म पुराण’ के सन्दर्भों का विवेचन किया जा चुका है। अब इस अंक में चन्द्रमा की नक्षत्र मण्डल में भ्रमण की गति एवं उसकी पृथ्वी की परिक्रमा के वैदिक व पौराणिक रूपक का खगोलीय विवेचन किया जा रहा है।

चन्द्र व 27 नक्षत्रों के पौराणिक एवं वैदिक विमर्श के खगोलशास्त्रीय रूपक

शिव पुराण की कोटि रुद्र संहिता सहित विविध पौराणिक व वैदिक सन्दर्भों में चन्द्र के भ्रमण मार्ग में आने वाले 27 नक्षत्रों और उनके साथ चन्द्रमा की 27 नक्षत्र रूपी पत्नियों के रूपक, जिसमें चन्द्रमा के चौथे नक्षत्र के रूप में पत्नी संज्ञक रोहिणी नक्षत्र पर विशेष अनुराग के रूपक पर पौराणिक विमर्श का विवेचन किया जायेगा। आठवीं सदी से हुए बाहरी आक्रमणों में देशभर में लाखों गुरुकुलों, सैकड़ों विश्वविद्यालयों सहित करोड़ों पाण्डुलिपियों से युक्त ग्रन्थागारों को जला दिया गया था।

देश के अधिकांश भागों में प्राचीन शास्त्रों का अध्ययन निषिद्ध हो गया था। उस काल खण्ड में सायण जैसे वेद के भाष्यकारों तक को अमात्य व सेनापति के दायित्वों का निर्वहन करना पड़ा था। सन्त सम्प्रदायों को भी अखाड़ों का रूप लेकर शताब्दियों तक युद्धरत रहना पड़ा था। ऐसे में शास्त्रोक्त खगोलीय ज्ञान को अनौपचारिक पारिवारिक विमर्श के माध्यम से रूपकों में बदलने का कौशल विकसित कर जीवित रखना पड़ा था।

इसी क्रम में चन्द्रमा व 27 नक्षत्रों के खगोल को समझाने व रोहिणी नक्षत्र के पृथ्वी के क्रान्तिवृत्त से 5 डिग्री 47’ विचलन की तर्कसम्मत व्याख्या करने हेतु यह रूपकात्मक व्याख्या निरूपित करनी पड़ी कि चन्द्रमा के परिक्रमा पथ के 27 नक्षत्र चन्द्रमा की पत्नियों के रूप में हैं। उनमें रोहिणी नामक नक्षत्र के प्रति चन्द्र का विशेष अनुग्रह विभेदकारक है। भारतीय खगोलशास्त्र में वृषभ राशि, जिसका 360 डिग्री के चन्द्र के राशि वृत्त में 30 डिग्री विस्तार है और उसमें 13 डिग्री 20’ का रोहिणी का समावेश है,  चित्र को यहां दिखलाया गया है।

चन्द्रमा के परिक्रमा पथ का क्रान्तिवृत्त से विचलन व रोहिणी की 5 डिग्री 47’ दक्षिण में स्थिति
पृथ्वी द्वारा सूर्य एवं चन्द्रमा द्वारा पृथ्वी की परिक्रमा की जाती है। पृथ्वी द्वारा वर्षभर में की जाने वाली सूर्य परिक्रमा के पथ को ‘क्रान्तिवृत्त’ कहते हैं। चन्द्रमा पृथ्वी का उपग्रह है जो औसत प्रति 27़3 दिन में पृथ्वी की एक परिक्रमा करता है। सूर्य व चन्द्र ग्रहणों की संख्या प्रतिवर्ष न्यूनतम व परिमित रहे और पृथ्वी को न्यूनतम व नगण्य उल्कापातों का सामना करना पडेÞ, इस हेतु चन्द्रमा का यह परिक्रमा मार्ग पृथ्वी के क्रान्तिवृत्त से 50 डिग्री झुका हुआ है। चन्द्रमा के परिक्रमा मार्ग में इस 50 डिग्री झुकाव के कारण, जिस नक्षत्र का कोई भी तारा क्रान्तिवृत्त से 5-6 दक्षिण में स्थित है, उस नक्षत्र को चन्द्रमा अपनी 27़ 3 दिन में पूरी होने वाली पृथ्वी की परिक्रमा के दौरान उस तारे के सामने से निकलते हुए पूर्ण रूप से ढक लेता है या प्रच्छादित कर लेता है जिसे अंग्रेजी में आॅकल्टेशन कहते हैं।
‘इन्टरनेशनल आॅकल्टेशन टाइम एसोसिएशन’ के अनुसार, 27 नक्षत्रों में से रोहिणी तारा पृथ्वी के क्रान्तिवृत्त से 5 डिग्री 47’ दक्षिण में स्थित है। इसलिए विविध नक्षत्रों की त्रिवार्षिक प्रच्छादन (आॅकल्टेशन) आवृत्ति में रोहिणी नक्षत्र के पूर्ण प्रच्छादन की औसत आवृत्ति सर्वोच्च होती है। इसका एकमात्र कारण रोहिणी नक्षत्र का उपरोक्त 5 डिग्री 47’ का क्रान्तिवृत्त से विचलन है। इसलिए पुराणों, संहिता ग्रन्थों व खगोलशास्त्र में इसे रोहिणी नामक पत्नी के प्रति विशेष अनुराग रूपक के रूप में ‘संरक्षित व व्याख्यायित’ किया गया है।

चन्द्र व रोहिणी का खगोलीय विवेचन
चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है जो औसत 27़ 3 दिन में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरी कर लेता है। इसके साथ ही वह अपने अक्ष या धुरी पर भी 27़ 3 दिन में एक परिक्रमा पूरी कर लेता है। चन्द्रमा अपने अक्ष या धुरी पर एक परिक्रमा व अपनी कक्षा में पृथ्वी की भी एक परिक्रमा 27़ 3 दिन की समान अवधि में ही पूरी कर लेता है। इसलिए चन्द्रमा का वही एक भाग ही सदैव पृथ्वी से दिखाई देता है।

चन्द्र व नक्षत्रों की तुलना करें तो चन्द्रमा से पृथ्वी पर प्रकाश को पहुंचने में 1़3 सेकण्ड लगते है, सूर्य से 8़ 3 मिनट लगते हैं, वहीं रोहिणी से 65़ 23 वर्ष और कृत्तिकाओं से 400 वर्ष का समय लगता है। चन्द्रमा 27़ 3 दिन में पूरी होने वाली परिक्रमा में 27़ 3 में से एक-एक नक्षत्र को औसत एक-एक दिन में पार करता है। उसका ठहराव सभी नक्षत्रों के सम्मुख औसत रूप में समान है। रोहिणी के सम्मुख भी उसके भ्रमण की औसत गति वही है जो अन्य नक्षत्रों को पार करने में लगती है। सभी नक्षत्र चन्द्र से अति दूर, अनेक प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित व अति विशाल नक्षत्र हैं।

रोहिणी, केसरिया रंग का सितारा है जो सूर्य से 65 प्रकाशवर्ष व पृथ्वी से 65़ 23 प्रकाशवर्ष दूर है, सूर्य से यह 44 गुना विशाल व 400 गुना अधिक प्रकाशमान है। रोहिणी का पूर्ववर्ती नक्षत्र जो कृत्तिका पुंज है, वह इससे भी 400 प्रकाशवर्ष दूर है। लगभग 2500 ई़पू़ शतपथ ब्राह्मण के रचना काल में ‘वसन्त विशुव बिन्दु’ कृत्तिका नक्षत्र में आता था व कृत्तिका का उदय तब पूर्व में होता था। ध्रुव तारे के सन्दर्भ में यह चर्चा की जा चुकी है कि 26,000 वर्ष में वसन्त विशुव बिन्दु 50’ की गति से 27 ही नक्षत्रों में भ्रमण कर जाता है। इसके विवरण अथर्ववेद, तैत्तिरीय संहिता, शतपथ ब्राह्मण व ऐतरेय ब्राह्मण आदि में दिये गए हैं।
(लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)