तकनीक ‘इंटेलिजेंट’ तो शहर क्यों न हों ‘स्मार्ट’!

    दिनांक 30-दिसंबर-2020
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बालेन्दु शर्मा दाधीच

दुबई और डेनमार्क जैसे देशों में तकनीक और मोबाइल एप्लीकेशन के जरिए शहरी गतिविधियों का संचालन किया जा रहा है, इसलिए भारत में भी स्मार्ट सिटी विकसित की जा रही हैं। जरूरत इस बात की है कि नए शहर बसाने से पहले उसकी योजना इस प्रकार बनाई जाए ताकि उनका संचालन अत्यंत कार्यकुशलता के साथ किया जा सके
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भारत ही नहीं, दुनियाभर के शहरों पर बढ़ती आबादी का दबाव है। तकनीक, आर्थिक, सुख-सुविधाओं और पर्यावरणीय परिवर्तनों ने स्मार्ट सिटी में रुचि पैदा की है

डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में यातायात, हवा की गुणवत्ता, कूड़े-कचरे के प्रबंधन, बिजली के इस्तेमाल और बहुत सी दूसरी सेवाओं पर तकनीकी प्रणाली के जरिए निगाह रखी जाती है। यह प्रणाली इन सेवाओं का सही ढंग से संचालन करने में मदद करते है। शहर के एक हिस्से में अगर ट्रैफिक अचानक बढ़ जाए तो स्वचालित यातायात प्रणालियां स्वयं ही उधर आने वाले ट्रैफिक को दूसरी तरफ से निकाल देती हैं। किसी इलाके में दिन में स्ट्रीट लाइट्स जली हुई हैं तो वह स्वयं बंद हो जाती हैं। वहां अनगिनत चीजें इंटरनेट के जरिए एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं- पार्किंग प्रणाली, ट्रैफिक सिग्नल, इमारतें, दफ्तर, पेट्रोल पंप और न जाने क्या-क्या। स्मार्टफोन एप्लीकेशन के जरिए आम लोग भी इन सबसे जुड़े हैं। अगर आप कार चला रहे हैं तो ये एप्लीकेशन आपको गंतव्य तक जल्दी पहुंचने का रास्ता सुझाते हैं। अगर साइकिल चला रहे हैं तो इससे पता चल जाता है कि अगली हरी बत्ती के लाल होने से पहले चौराहा पार करने के लिए आपको कितनी तेजी से पैडल मारने होंगे।

कोपेनहेगन एक स्मार्ट सिटी है। वैसा ही स्मार्ट सिटी, जैसा कि दुबई है, जहां पर 90 प्रतिशत सरकारी सेवाएं दुबईनाउ नाम के एप्लीकेशन से जुड़ी हुई हैं। सरकार के ज्यादातर काम कागजों के बिना हो जाते हैं, चाहे किसी को प्रवेश की अनुमति देनी हो या किसी परिवार को प्रायोजित करना। दुबई की सड़कों पर जिनके चालान हो चुके हैं, वे भी बिना किसी अधिकारी-कर्मचारी से मिले जुर्माना भर सकते हैं। अगर आप बस चला रहे हैं तो इस बात के लिए आप पर लगातार नजर रखी जाती है कि कहीं आप थकान या सुस्ती के शिकार तो नहीं हो गए हैं? दुबई में इन व्यवस्थाओं से करोड़ों रुपये बचाए जा रहे हैं और सड़क दुर्घटनाओं को रोका जा रहा है।

दुनिया में ऐसे कई दर्जन स्मार्ट सिटी बन चुके हैं जो तकनीक से लैस और इंटरनेट से जुड़े हुए हैं। उनके प्रबंधन में तकनीक की अहम भूमिका है और तकनीक भी ऐसी, जो ज्यादातर अपने आप चलती रहती है, यानी कि स्वचालित है। भारत में भी ऐसे 100 स्मार्ट सिटी बनाने की योजना पर काम चल रहा है। हालांकि उपरोक्त उदाहरणों से साफ हो जाता है कि स्मार्ट सिटी कैसे काम करते होंगे, लेकिन फिर भी इस अवधारणा को गहराई से समझने की जरूरत है। हमारे शहरों का कामकाज तो भला-चंगा चल रहा था। आखिर स्मार्ट शहरों की जरूरत क्यों पड़ गई और उससे भी बुनियादी सवाल यह कि ये हैं क्या? तो संक्षिप्त जवाब यह है कि स्मार्ट सिटी आज के दौर की बहुत सारी शहरी समस्याओं का समाधान करने की मास्टर कुंजी है। 

आज शहरों पर आबादी का भारी दबाव है। गांवों से आबादी नए अवसरों, सुविधाओं और तरक्की की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की 31 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती थी, जो विश्व बैंक के 2017 के आंकड़ों के अनुसार 34 प्रतिशत हो चुकी थी। यदि यह आंकड़ा बहुत विस्मयकारी नहीं लगता तो इसकी तुलना जरा 1901 की जनगणना के आंकड़े से करके देखिए जब सिर्फ 11 प्रतिशत भारतीय ही शहरों में रहते थे। गांवों से शहरों की ओर पलायन एक हकीकत है और यह रुझान आने वाले कुछ दशकों तक जारी रहेगा। संयुक्त राष्ट्र की स्टेट आॅफ द वर्ल्ड पॉपुलेशन रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक भारत की 41 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या शहरों में रह रही होगी। खुद भारत सरकार के एक आकलन के अनुसार 2050 तक 60 प्रतिशत लोग शहरों में रह रहे होंगे।

वैश्विक स्थिति इससे भी अधिक गंभीर दिखाई देती है। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग के जनसंख्या प्रभाग की ओर से 2018 में कुछ महत्वपूर्ण आकलन और अनुमान जारी किए गए थे। उनके अनुसार आज दुनिया की 55 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती है, जिसके 2050 तक बढ़कर 68 प्रतिशत हो जाने की संभावना है। इस आबादी का एक बड़ा हिस्सा 2030 तक 43 महानगरों (मेगा सिटीज) में रह रहा होगा जो एक करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले शहर हैं। आज टोक्यो 3.7 करोड़ निवासियों के साथ दुनिया का सर्वाधिक आबादी वाला मेगा सिटी है, जबकि 2.9 करोड़ लोगों के साथ नई दिल्ली दूसरे और 2.6 करोड़ लोगों के साथ शंघाई तीसरे स्थान पर है। 2028 के आसपास दिल्ली दुनिया का सर्वाधिक आबादी वाला मेगा सिटी बन जाएगा। आज ऐसे महानगरों की संख्या 33 है और दुनिया का हर आठवां व्यक्ति किसी न किसी महानगर या मेगा सिटी में रह रहा है।
एक तरफ जनसंख्या का आंकड़ा किसी दावानल की तरह फैल रहा है, वहीं दूसरी ओर हमारे शहर इतनी बड़ी आबादी की मांग पूरी करने में सक्षम नहीं हैं। इसका परिणाम जनसंख्या की सघनता, पानी, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की अपर्याप्तता, रोजगार के संकट, ट्रैफिक जाम तथा पार्किंग संकट जैसी समस्याओं, बढ़ते प्रदूषण, महंगाई व अपराधों के रूप में सामने आ रहा है। इसकी एक अहम वजह यह है कि जिन शहरों पर बढ़ती आबादी का दबाव है, उनकी योजना और डिजाइन भविष्य की स्थितियों को ध्यान में रखते हुए तैयार नहीं किया गया था। यदि ऐसी कोई कल्पना रही भी हो तो संभवत: उस किस्म के शहरीकरण का अनुमान योजनाकर्ताओं को नहीं रहा होगा जैसा कि आज हो रहा है। इससे हमें एक महत्वपूर्ण सबक मिलता है और वह यह कि यदि अब नए शहर बसाए जाएं तो कम से कम उनकी योजना इस तरह से बनाई जाए कि उनका संचालन अत्यंत कार्यकुशलता के साथ किया जा सके और उन्हें भविष्य में उस तरह की समस्याओं का सामना न करना पड़े जो आज हमारे शहरों को घेरे हुए हैं।

स्मार्ट शहर ऐसे आधुनिक शहर हैं जिन्हें न सिर्फ नए जमाने की जरूरतों, मांग, सुविधाओं और अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया जाता है, बल्कि उनकी संरचना और संचालन में तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हालांकि बढ़ता शहरीकरण ही इन शहरों की स्थापना के पीछे एकमात्र कारण नहीं है। कई किस्म के तकनीकी, आर्थिक और पर्यावरणीय परिवर्तनों ने भी स्मार्ट शहरों में रुचि पैदा की है।

जलवायु परिवर्तन से उपजी समस्याओं के नियंत्रण, खर्चों पर अंकुश लगाने की जरूरत, प्रशासनिक सुविधाओं को अधिक कार्यकुशल बनाने की आकांक्षा और तकनीकी सुविधाओं के बेहतर प्रसार की जरूरत जैसे और भी पहलू हैं, जो स्मार्ट शहरों के विकास के लिए प्रेरित कर रहे हैं। संयोग की बात है कि तकनीकी दृष्टि से भी आज हम बहुत सशक्त हो चले हैं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेंसर तकनीकों, इंटरनेट, डाटा एनालिटिक्स, क्लाउड कंप्यूटिंग, इंटरनेट आॅफ थिंग्स और तेजतर्रार संचार प्रणालियों की मौजूदगी के चलते ऐसे शहरों की स्थापना के लिए हालात बहुत अनुकूल हैं। नतीजा स्पष्ट है। दुनियाभर में स्मार्ट शहरों को विकसित करने या पुराने शहरों को स्मार्ट शहरों के रूप में अपग्रेड करने का दौर चल रहा है। जाहिर है कि भारत भी इस मामले में पीछे नहीं है और उसे रहना भी नहीं चाहिए।    (लेखक सुप्रसिद्ध तकनीक विशेषज्ञ हैं)