जम्मू-कश्मीर में लहराती लोकतंत्र की विजय पताका

    दिनांक 30-दिसंबर-2020   
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जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद (डीडीसी) चुनाव में 75 सीटें जीतकर भाजपा यहां सबसे बड़ा दल बना है। जम्मू-कश्मीर के चुनाव परिणामों को लेकर चर्चा हो रही है और होनी भी चाहिए। लेकिन इन चुनावों की व्याख्या सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इन चुनावी परिणामों को लोकतंत्र, जनकांक्षा और भारत की एकता समेत तमाम मानकों पर देखा जाना बेहद जरूरी है।
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जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद (डीडीसी) चुनाव में 75 सीटें जीतकर भाजपा यहां सबसे बड़ा दल बना है। जम्मू-कश्मीर के चुनाव परिणामों को लेकर चर्चा हो रही है और होनी भी चाहिए। लेकिन इन चुनावों की व्याख्या सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इन चुनावी परिणामों को लोकतंत्र, जनकांक्षा और भारत की एकता समेत तमाम मानकों पर देखा जाना बेहद जरूरी है।

पहली महत्वपूर्ण बात गुपकार गठबंधन की है। गुपकार गठबंधन को मिलकर 110 सीटें भले ही मिल गई हों लेकिन गुपकार विसंगतियों का वह कुनबा है, जो सिर्फ स्वार्थों की नींव पर केंद्र्रित है। जो पहले एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते थे वह इसलिए कंधे से कंधा मिलाकर साथ आ गए हैं कहीं लोकतंत्र के इस ज्वार में उनकी कश्ती ही न बह जाए। गुपकार गठबंधन की ताकत जितनी बताई जा रही है, वास्तव में वह कहीं नहीं है। गुपकार की ताकत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के पीछे कथित ‘सेकुलर मीडिया’ का एक एजेंडा है। इसके माध्यम से ‘सेकुलर मीडिया’ फिर वही ‘नैरेटिव’ गढ़ने का प्रयास कर रहा है, जो वह हमेशा से करता आया है। दरअसल गुपकार को जो चोट इन चुनावों में लगी है, उसको दबा कर दिखाने का खेल मीडिया में चल रहा है।

पहले यहां बारी—बारी से लोग सत्ता का सुख लेते थे और कश्मीर के लोगों को अपनी रियासत की रियाया समझते थे। जम्मू-कश्मीर में राजनीति के नाम पर परिवार केंद्र्रित और परिवारों में आपस में ही सत्ता की अदला—बदली का खेल चलता था। ऐसे सात समूह, सिर्फ अपनी चौधराहट बनाए रखने के लिए जब मिलकर चुनाव लड़े तब भी उनकी ताकत एक कोने में सिमटी हुई साबित हुई है, जिसके सामने भाजपा पूरी मजबूती से खड़ी हुई है।

यहां कहा जाता था कि जम्मू हिंदू हो सकता है इसलिए भाजपा का हो सकता है, लेकिन घाटी में तो विशुद्ध मुस्लिम है और मुस्लिम भी सुन्नी हैं इसलिए यहां तो हमेशा मुफ्ती और अब्दुल्ला परिवार ही बारी-बारी से राज करते रहेंगे। अब यह मिथक टूट गया है। घाटी में भाजपा का बढ़ना और जम्मू में उसका बहुमत प्राप्त करना यह बता रहा है कि यह प्रदेश राष्ट्रीय आकांक्षाओं से कदमताल कर रहा है।

 यह चुनाव उस राज्य में हुए हैं जिसे देश की मूलधारा से काटकर अलग-थलग रखा गया था। यहां यह बताया जाता था कि इसी में राज्य का और यहां के लोगों का हित है। यहां से धारा 370 का कांटा निकलने के बाद कुछ लोगों ने यह तक कहा था कि यह गलत हुआ है और यहां भारत का झंडा उठाने वाला भी कोई नहीं होगा। झंडा तो छोड़िए, डीडीसी के चुनावी नतीजों ने यह बता दिया है कि जनता ने ऐसे लोगों के खिलाफ डंडा उठा लिया है और यहां लोकतंत्र का तिरंगा झंडा लहरा रहा है। लोकतंत्र में भरोसा, उत्साह और भागीदारी के लिए जो मन होना चाहिए वह इन नतीजों से स्पष्ट दिखाई देता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जब भाजपा ने जम्मू-कश्मीर से धारा—370 को हटाने का काम किया तो तब कहा गया था कि इसका खामियाजा भाजपा को उठाना पड़ेगा। यहां बिल्कुल इसके उलट हुआ जो नतीजे आए हैं वह बताते हैं कि भाजपा यहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया में तो अग्रणी है ही यहां पर भागीदारी में वह सबसे बड़ी पार्टी है। जम्मू में दस में से छह जिलों में भाजपा को बहुमत मिला है और घाटी, जिसे सिर्फ एक वर्ग और दो दलों के लिए बांटकर रखा गया था और ऐसा ही दिखाया जाता था उस घाटी में भी श्रीनगर, पुलवामा और बांदीपुरा की सीटें भी भाजपा ने जीती है।

तीसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि दलों के बागी भी जनता के दुलारे बनकर सामने आए हैं। चुनाव में 49 निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है। अगर विधानसभा चुनावों के आधार पर नतीजों को फैलाकर देखा जाए तो हर विधानसभा क्षेत्र में तीन से चार नए चेहरे लोकतंत्र की मशाल लेकर आगे आए हैं। जिस राज्य की राजनीति दो कुनबों के खूंटों से बंधी होती थी, जो राजनीति छल और छद्म के बूते चलती थी, उस राज्य में अब लोकतंत्र की नैया के नए खेवैया आ गए हैं। राज्य में लोकतंत्र अब लंबे सफर के लिए अपने पहले पड़ाव से आगे निकल गया है।