राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोया बाबासाहेब ने

    दिनांक 06-दिसंबर-2020
Total Views |
 प्रो. श्रीप्रकाश सिंह

डॉ. आंबेडकर का कर्मयोग किसी समुदाय विशेष के लिए न होकर समग्र समाज और सारी मानवता के लिए है। इस महामानव ने भारतीय हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों को मिटाने, परिवर्तित करने और दलितों, वंचितों के उत्थान, समानता एवं सम्मान के लिए जिस निष्ठा और समर्पण भाव से संघर्ष एवं प्रयास किया, वह अविश्वसनीय एवं अनुकरणीय है

p12_1  H x W: 0

p12_1  H x W: 0डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को उनकी समग्रता में देखना कोई आसान कार्य नहीं है। डॉ. आंबेडकर विश्व के उन महारथियों में हैं, जिनके जुझारू जीवन और अनवरत संघर्ष से प्रेरणा लेकर भावी पीढ़ी सामाजिक समता तथा न्याय की मशाल जलाकर अंधकार की शक्तियों से निरन्तर लड़ती रहती हैं। बाबासाहेब ने भगवान बुद्ध, संत कबीर, महात्मा फुले जैसी महान आत्माओं के पदचिन्हों को ध्येय मार्ग मानकर भारतीय समाज को परिवर्तित करने का अतुलनीय कार्य सामाजिक क्रांति के उद्बोधक व पोषक डॉ.आंबेडकर का व्यक्तित्व, कृतित्व और विचार बहुआयामी हैं। भारतीय राष्ट्रीय राजनीति एवं समाज जीवन के प्रत्येक पहलू पर उनकी पैनी दृष्टि रही है और उन्होंने इसे प्रभावित भी किया। उन्होंने संविधान के प्रमुख शिल्पकार और संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में सर्व-समावेशी समाज की स्थापना की आधारशिला की स्थापना की।

डॉ. आंबेडकर का कर्मयोग किसी समुदाय विशेष के लिए न होकर समग्र समाज और सारी मानवता के लिए है। इस महामानव ने भारतीय हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों को मिटाने, परिवर्तित करने और दलितों, वंचितों के उत्थान, समानता एवं सम्मान के लिए जिस निष्ठा और समर्पण भाव से संघर्ष एवं प्रयास किया, वह अविश्वसनीय एवं अनुकरणीय है। उन्होंने कठोर परिश्रम से उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। परन्तु जीवन के प्रारम्भिक वर्षों से ही उन्होंने समाज में व्याप्त अमानवीय कुरीतियों, छुआछूत, विभेद, तिरस्कार और जातिगत आधार पर उपेक्षा और अपमान की स्थितियों को स्वयं भोगा था। इसीलिए उनका उद्देश्य बहुत स्पष्ट था।

वे दलित, शोषित, वंचित समाज को सशक्त, आत्मनिर्भर एवं सम्मानित जीवन देने के कार्य में सन्नद्ध थे। इसीलिए अनेकानेक विद्वानों विशेषकर कांग्रेस और गांधी जी के समर्थकों ने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि डॉ. आंबेडकर अंग्रेजों के चाटुकार थे, सत्ता लोलुप थे और कुछ लोगों ने तो उन्हें राष्ट्रद्रोही की संज्ञा से भी विभूषित कर दिया था। निस्संदेह डॉ. आंबेडकर ने तिलक, गांधी, भगत सिंह, सरदार पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद आदि अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की भांति राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया परन्तु उनकी दृष्टि और कृतित्व में कोई प्रतिरोध नहीं है अपितु उनका यह कार्य ठीक उसी प्रकार से पूरक है जिस प्रकार से ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, आर्य समाज आदि। तत्कालीन राष्ट्रीय राजनीति और राष्ट्रीय आन्दोलन और संभावित आजादी के परिप्रेक्ष्य में 22 सितंबर, 1944 को मद्रास में अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा, ‘‘मैं राष्ट्रवाद विरोधी नहीं हूं, मैं आजादी का विरोधी नहीं हूं। अगर मुझे आश्वस्त किया जा सके कि मुझे स्वतंत्रता, शिक्षा और कल्याण मिल सकता है, जिसका वचन दिया गया है तो मैं निश्चित रूप से आजादी के लिए, राष्ट्रवाद के लिए और स्वतंत्रता के लिए लडूंगा।’’

p12_1  H x W: 0
डॉ. आंबेडकर के अनुसार ‘‘मानवता के इतिहास में राष्ट्रीयता एक बहुत बड़ी शक्ति रही है। यह एकत्व की भावना है। किसी वर्ग विशेष से संबंधित होना नहीं। यही राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय भावना का सार है।’’ उन्होंने समाज के उस वर्ग को समानता तथा नागरिक अधिकार दिलाने का प्रयास किया, संघर्ष किया जो सदियों से मानवीय मूल्यों से वंचित था। उनकी राष्ट्रीयता की भावना विदेशी प्रभुत्व और भारतीय समाज में व्याप्त आंतरिक उत्पीड़न दोनों के विरुद्ध है। इसीलिए डॉ. आंबेडकर ने कहा था,‘‘ मैं अपने लोगों के लिए प्रतिबद्ध हूं। और मेरा दृढ़ निश्चय है कि राजनीतिक सुरक्षा से उनकी सभी कठिनाइयों को समाप्त किया जाए। मैं इस राष्ट्र के लिए भी प्रतिबद्ध हूं और मेरे मन में कोई संदेह नहीं कि आप भी हैं। हम सभी इस देश की आजादी चाहते हैं।’’
p12_1  H x W: 0
दलित शोषित समाज का सशक्तीकरण एवं अछूतोद्धार के उद्देश्य को प्रमुखता प्रदान करने के कारण सामान्यत: उन्हें एक वर्ग विशेष के नेता या उन्नायक के रूप में देखा जाता है। यह उनके कृतित्व एवं बहुआयामी चिन्तन के साथ अन्याय है। यदि गहराई से विश्लेषण किया जाए तो दिखता है कि उनका भी मूूल उद्देश्य समाज और राष्ट्र निर्माण है। उनकी मूल प्रेरणा जाति न होकर सामाजिक समन्वय और राष्ट्रीय एकता ही है। राष्ट्र की एकता, सम्प्रभुता, अखंडता, दृढ़ता ही उनका अभीष्ट है, केवल माध्यम अलग है।

डॉ. आंबेडकर भारतीय सामाजिक जीवन या हिंदू जीवन में व्याप्त कुरीतियों को जहां समाप्त करना चाहते थे, वहीं वे एक सुधारात्मक आंदोलन भी चलाना चाहते थे। यह तत्कालीन परिस्थितियों में एक दूरगामी और स्वाभाविक प्रक्रिया थी। राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व करने के साथ-साथ, गांधी जी स्वयं सामाजिक संरचना के कार्यों को कर रहे थे, जिसमें छुआछूत का विरोध और नशाबंदी जैसे कार्यों और विचारों का उल्लेख प्राय: किया जाता है। इन्हीं संरचनात्मक कार्यों से आगे बढ़कर आंबेडकर अपने समाज के लोगों को वैधानिक और राजनीतिक रूप से सशक्त करना चाहते थे। राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में उनके इस महान कार्य को किसी भी रूप में दोयम नहीं माना जा सकता। अनेकानेक राष्ट्रपुत्रों की भांति डॉ. आंबेडकर के हृदय में भारत माता का एक सुव्यवस्थित चित्र था। वे भी इसे आराध्य मानते थे और इसके वैशिष्ट्य की स्थापना के लिए सदैव चिंतित रहते थे।

उनका मानना था कि यह राष्ट्र एकाएक निर्मित नहीं हुआ अपितु सैकड़ों-हजारों वर्षों के प्रयास से एक भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता का निर्माण हुआ है। वे लिखते हैं, ‘‘भारत राष्ट्र की एकता का मूल आधार संस्कृति (हिंदू) है जो समग्र देश में व्याप्त है। सांस्कृतिक एकता के संदर्भ में कोई भी राष्ट्र भारत का मुकाबला नहीं कर सकता। इसमें न केवल भौगोलिक एकता है अपितु उससे ज्यादा गहरी मूलभूत एकता है सांस्कृतिक एकता जो एक छोर से दूसरे छोर तक सारे देश में व्याप्त है।’’ लेकिन वे धर्म, संस्कृति, जाति और भाषा की प्रतिस्पर्धी निष्ठा की प्रमुखता के विरोधी हैं। उनका मानना था कि इससे भारतीयता और भारत के प्रति निष्ठा पनपने में कठिनाई आती है और उन्होंने कहा भी ‘‘मैं चाहता हूं कि लोग सर्वप्रथम भारतीय हों और अंत तक भारतीय रहें, भारतीय के अलावा कुछ भी नहीं।’’

उल्लेखनीय है कि डॉ. आंबेडकर ने अपने राजनीतिक जीवन में ऐसा कोई प्रसंग नहीं आने दिया जिससे कोई यह कह सके कि उन्होंने देशहित से समझौता किया और अपने तथा जाति समूह के हित को प्राथमिकता प्रदान की। यहां अनेकानेक संदर्भों में केवल दो संदर्भों का उल्लेख करना अत्यंत समीचीन होगा। गोलमेज सम्मेलन में गांधी जी से टकराव के बाद, ब्रिटिश प्रधानमंत्री से ‘पृथक चुनावी प्रवर्ग’ की प्राप्ति के बावजूद उन्होंने राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए अपने जातिगत हितों को तिलांजलि देते हुए गांधी के साथ 1932 में पूना समझौता किया, जिसने इस देश को विभीषिका एवं सामाजिक बिखराव से बचाया। दूसरा उदाहरण उनके कन्वर्जन संदर्भ में देखा जा सकता है। डॉ. आंबेडकर ने घोषणा की कि वे जन्मना हिंदू हैं, परंतु हिंदू रूप में मृत्यु को प्राप्त नहीं होंगे, यानी मत परिवर्तन करेंगे। वीर सावरकर ने कहा था, ‘‘बौद्ध आंबेडकर, हिंदू आंबेडकर ही हैं। वस्तुत: वे अब सही मायने में हिंदू शिविर में आ गए हैं।’’ डॉ. आंबेडकर के लिए राष्ट्र सदैव सर्वोपरि रहा और उन्होंने 31 मई, 1952 को मुंबई में भाषण देते हुए कहा था, ‘‘यद्यपि मैं कुछ उग्र स्वभाव का हूं और सत्ताधारियों से मेरा टकराव होता रहा है फिर भी मैं यह विश्वास दिलाता हूं कि अपनी विदेश यात्रा में भारत की प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आने दूंगा। मैंने कभी भी राष्ट्रद्रोह नहीं किया है। गोलमेज परिषद में भी मैं राष्ट्रहित के मामले में गांधी जी से 200 मील आगे था।’’

डॉ. आंबेडकर का व्यक्तित्व एवं कृतित्व इतना विशाल एवं बहुआयामी है कि उसे एक लेख में समेटना संभव नहीं है इसलिए कुछ अन्य उपयोगी राष्ट्र निर्माण में सहायक विषयों का सांकेतिक उल्लेख ही संभव है, लेकिन राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य में इनके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। भाषायी आधार पर राज्यों के गठन का विरोध, हिंदी की राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापना, संस्कृत भाषा की शिक्षा और गुणवत्ता, धारा 370 का विरोध, कन्वर्जन पर उनके विचार, धर्म की उपयोगिता का विचार, श्रमनीति, सुधार, शहरीकरण का महत्व, उनके द्वारा महाड सत्याग्रह, समान नागरिक संहिता एवं हिन्दू कोड बिल, श्रीमद्भगवद्गीता को प्रदत्त महत्व आदि अनेकानेक ऐसे विचार हैं, जिनसे उनकी राष्ट्रीय दृष्टि का ज्ञान होता है। इसलिए बाबासाहेब का समग्रता में अध्ययन करने की आवश्यकता है।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर हैं)