समाचारों पर एकाधिकार के दिन लद गए

    दिनांक 07-दिसंबर-2020
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मीडिया को यह समझना होगा कि लोग सूचनाओं व समाचारों के लिए अखबारों, टीवी चैनलों के भरोसे नहीं रहे
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एक वर्ष पहले देश में नागरिकता संशोधन कानून के नाम पर जो तमाशा खड़ा किया गया था, ठीक वैसा ही अब किसानों के लिए बने नए कानून को लेकर हो रहा है। एक अफवाह फैलाई गई कि निजी कंपनियां किसानों की जमीन हड़प लेंगी। तथाकथित किसान नेता चैनलों पर बैठकर बार-बार यही बात बोलते रहे, लेकिन किसी चैनल ने यह नहीं कहा कि इन दावों में सच्चाई नहीं है। सोशल मीडिया पर तैरने वाली मजाकिया तस्वीरों की सच्चाई जांचने वाले स्वयंभू फैक्ट चेकर्स ने भी इस झूठ पर अपने आंख और कान बंद कर लिए। ऐसे समय में मीडिया की जिम्मेदारी होती है कि वह सच्चाई सामने लाकर जनता में फैले भ्रम को दूर करे। लेकिन मीडिया के एक वर्ग ने तो चिर-परिचित शहरी नक्सलियों और देशविरोधी शक्तियों को किसान नेता बताकर मंच देना शुरू कर दिया। इनमें वे लोग भी थे, जिनके नाम दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों में सामने आए हैं।

किसानों के नाम पर ऐसे लोगों को मीडिया ने मंच दिया, जिन्हें न तो मुद्दे का पता था, न किसानों से कोई लेना-देना। कोई इसे ‘इंकलाब’ बता रहा था तो कोई कह रहा था कि इससे दक्षिण एशिया की ‘जियो-पॉलिटिक्स’ बदल जाएगी। एनडीटीवी पर कांग्रेस के सांसद रवनीत सिंह बिट्टू कह रहे थे कि किसानों की उपज गूगल व व्हाट्सएप जैसी कंपनियां खरीद लेंगी। इससे किसान बर्बाद हो जाएंगे। देश में ढेरों किसान संगठन हैं जो नए कृषि कानून का समर्थन कर रहे हैं, पर उनकी आवाज भी मीडिया में नहीं सुनाई पड़ी। बीते वर्ष मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार में यूरिया के लिए जब किसानों पर लाठीचार्ज हुआ, तब मीडिया को अन्नदाता का कष्ट नहीं दिखा। उस समय की कवरेज की तुलना आज के प्रायोजित किसान आंदोलन के साथ करें तो खेल समझते देर नहीं लगेगी।

जब भी देश में विघटनकारी शक्तियां सिर उठाती हैं, बीबीसी की सक्रियता देखने लायक होती है। किसान आंदोलन की खबरों के नाम पर उसने शेरो-शायरी शुरू कर दी, जिनमें भगवान को उखाड़ने की बातें हो रही हैं। बीबीसी की कवरेज देखकर लगेगा मानो भारत में किसानों ने बगावत कर दी हो और हर तरफ उनका दमन हो रहा हो। लगता है बीबीसी के कॉमरेड भारत को बांटने के अंग्रेजों के सपने को पूरा करने के अभियान पर हैं। यही कारण था कि गुरुनानक जयंती पर उसने लेख छापा कि उन्होंने कैसे बचपन में जनेऊ पहनने से मना कर दिया था, जबकि मध्यकाल के अधिकांश संत कर्मकांड से दूरी के लिए जाने जाते हैं। पर बीबीसी ने ऐसे जताया मानो जनेऊ न पहनना हिंदू धर्म को खारिज करना है। इसी बीबीसी पर बीते वर्ष आरोप लगा था कि लंदन में उसने इस्लामोफोबिया के नाम पर अपने रेडियो स्टेशन में गुरु तेग बहादुर के बलिदान पर आधारित कार्यक्रम को रोक दिया था। तब ब्रिटेन के सिख विद्वान लॉर्ड इंद्रजीत सिंह ने इस घटना पर सार्वजनिक तौर पर विरोध भी दर्ज कराया था।

फेक न्यूज की फैक्ट्री के तौर पर बदनाम समाचार एजेंसी पीटीआई ने केरल, जालंधर, भुज व गोरखपुर के रेडियो स्टेशन के बंद होने का झूठ फैलाया। उसने प्रसार भारती का पक्ष जानने तक की औपचारिकता पूरी नहीं की। जब प्रसार भारती के सीईओ शशि शेखर ने इसका खंडन किया तो एजेंसी ने बड़ी ढिठाई के साथ कहना शुरू किया कि उसने तो बस वामपंथी सांसद का आरोप छापा था। वास्तव में यह समाचार अफवाह फैलाने के उद्देश्य से बहुत सावधानीपूर्वक लिखा गया था। ठीक उसी तरह जैसे कुछ दिन पहले पीटीआई ने पीओके में भारतीय सेना की कार्रवाई का फेक न्यूज फैलाया था।

उधर, लव जिहाद पर मीडिया का शुतुरमुर्गी रवैया जारी है। मध्य प्रदेश के शहडोल में मुस्लिम लड़के से शादी करने वाली एक हिंदू लड़की ने आरोप लगाया है कि इस्लाम कबूल न करने व अरबी न सीखने पर उसे मारा-पीटा जा रहा है। ये तो सामान्य लोगों की कहानी है, जो आए दिन शिकार बनते हैं। मुंबई में संगीतकार वाजिद खान की पारसी पत्नी कमलरुख ने सोशल मीडिया के माध्यम से बताया कि पति के निधन के बाद ससुराल वाले उन पर कन्वर्जन का दबाव बना रहे हैं। टाइम्स आॅफ इंडिया व दैनिक भास्कर जैसे लव जिहाद समर्थक अखबारों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। टीना डाबी के तलाक के मामले में मीडिया का एक वर्ग इसी तरह चुप्पी साध गया था। लेकिन ऐसा करते हुए सेकुलर मीडिया के ये सरगना भूल जाते हैं कि सूचनाओं और समाचारों पर एकाधिकार के दिन अब खत्म हो चुके हैं।    


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