सतत विकास के सच्चे संदेशवाहक

    दिनांक 08-दिसंबर-2020
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संजय तिवारी की फेसबुक वॉल से 

यह सामाजिक संरचना का व्यापार है, इसलिए इस व्यापार पर इनका पूरा कब्जा है। कोई दूसरा इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता। ये जिस पेड़ से पत्ते तोड़ते हैं, उसके मालिक से पूछते तक नहीं। पूछने की जरूरत भी नहीं है। पेड़ चाहे जिसका हो, महुआ का पात इन्हीं का है। इसलिए इन्हें कभी कोई रोकता भी नहीं।

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यह निब्बू मुसहर है (तस्वीर में देखें)। पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक घुमंतू जाति। अगर हमारे समाज में आसपास कोई माटी के लाल हैं तो वे यही लोग हैं। माटी, पानी और पेड़ों की जितनी समझ इन्हें होती है, शायद किसी कृषि स्नातक को भी नहीं होती होगी।

लेकिन इनकी अपनी जीवन शैली है। जैसे पानी को एक जगह रोक दो तो वह सड़ जाता है, उसी तरह यह प्रजाति है। घुमक्कड़ी इनका जीवन है। निब्बू भी घूमता है। गाजीपुर से मेरे गांव तक चला आया सिर्फ पत्तों की खोज में। बनारस शहर में महुआ के पत्तों के दोने में गर्मागर्म समोसे, कचौड़ी, जलेबी और मिठाई परोसने की परिपाटी है। महुए के पत्तों से जो दोने बनते हैं, उसके आपूर्तिकर्ता इसी निब्बू जैसे कारोबारी होते हैं।

ये दूर-दूर तक घूमकर महुए के पत्ते इकट्ठे करते हैं और दो सौ-तीन सौ किलोमीटर तक का सफर कर लेते हैं। ये अकेले नहीं निकलते। इनके साथ परिवार और समाज भी चलता है। किसी बाग-बगीचे में डेरा जम जाता है, फिर वहीं से महुए का पेड़ खोज-खोजकर उसके पत्ते तोड़े जाते हैं, फिर उन्हीं पत्तों के साथ ‘घर वापसी’ होती है और दोने बनाकर साल भर की आय निश्चित की जाती है।

यह सामाजिक संरचना का व्यापार है, इसलिए इस व्यापार पर इनका पूरा कब्जा है। कोई दूसरा इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता। ये जिस पेड़ से पत्ते तोड़ते हैं, उसके मालिक से पूछते तक नहीं। पूछने की जरूरत भी नहीं है। पेड़ चाहे जिसका हो, महुआ का पात इन्हीं का है। इसलिए इन्हें कभी कोई रोकता भी नहीं।

मैंने निब्बू से न सिर्फ बात की, बल्कि काफी देर तक उसे पत्ते तोड़ते हुए देखता रहा। मैं देखना चाहता था कि वह पत्ते कैसे तोड़ता है, क्योंकि इसी से उसके स्वभाव का पता चलता। मैंने देखा कि निब्बू अपनी उगलियों से सिर्फ पत्ते तोड़ रहा था, टहनियां नहीं। महुए की एक टहनी में दस-बीस पत्ते होते हैं। अगर वह एक टहनी तोड़ ले तो उसे न तो दस-बीस पत्ते तोड़ने की जरूरत होगी और न उन्हें इकट्ठा करने की। लेकिन वह ऐसा नहीं करता। उसे मालूम है उसका महुए के पेड़ से अघोषित समझौता सिर्फ पत्तों तक है। टहनियां तोड़ लीं तो अगली बार पेड़ पत्ते नहीं देगा। लेकिन इससे सुखद आश्चर्य यह देखकर हुआ कि वह हर टहनी के शीर्ष पर दो-चार पत्ते छोड़ता जा रहा था, ताकि उसके उतरने के बाद पेड़ एकदम वीरान भी न लगे।

मैं उसे काम करते हुए देखकर सोच रहा हूं कि ऐसे ही लोग हमारे व्यावसायिक आदर्श हो सकते हैं। हम इन प्रकृति पुत्रों की ओर कभी क्यों नहीं देखते? क्या निब्बू जैसे व्यवसायियों को किसी आईआईएम में पढ़ाने के लिए नहीं बुलाया जा सकता, जो सतत विकास के सच्चे संदेशवाहक हैं।