पृथ्वी का अक्ष परिवर्तन एवं वैदिक मास

    दिनांक 09-दिसंबर-2020
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प्रो. भगवती प्रकाश

भारत में प्राचीन काल से ही ग्रह गणनाएं तथा मासों के नाम सायन व निरयन आधार पर रखे जाते रहे हैं।  वैदिक काल के सायन मासों के नाम मधु, माधव, शुक्र, शुचि आदि संभवत: 12,000 वर्ष पूर्व से चलन में हैं। 12,000 वर्ष पहले ध्रुव तारा अभिजित था और 14,000 वर्ष बाद 27,800 ई. में फिर से अभिजित होगा।
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पृथ्वी जिस अक्ष पर घूमती है, उसे एक काल्पनिक रेखा के रूप में बढ़ाया जाए तो वह ध्रुव तारे तक पहुंचती है।

पृथ्वी अपने अक्ष या धुरी पर घूमती है, जो झुका हुआ है एवं पृथ्वी अपनी कक्षा में सूर्य की परिक्रमा कर रही है जैसे वैदिक संदर्भों का विवेचन पूर्व में किया जा चुका है। पृथ्वी जिस अक्ष या धुरी पर घूमती है, उसे एक काल्पनिक रेखा के रूप में ऊपर अंतरिक्ष में बढ़ाया जाए तो वह ध्रुव तारे तक पहुंचती है। पृथ्वी की धुरी का केंद्र होने से ही ध्रुव तारे को पुराणों एवं वैदिक वाङ्मय में पृथ्वी के अक्ष का नियामक एवं ध्रुव कहा गया है। ध्रुव तारा हमारी पृथ्वी से 434 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है तथा सूर्य की तुलना में 2200 गुना चमकीला है। इस अंतर के कारण जहां प्रकाश को सूर्य से पृथ्वी पर पहुंचने में मात्र में 8.3 मिनट लगते हैं, वहीं ध्रुव तारे से प्रकाश को पहुंचने में 434 वर्ष लगते हैं।

25,000 वर्षों का ज्ञान
ध्रुव तारे की ओर जाने वाली पृथ्वी के अक्ष की यह कल्पनिक रेखा पृथ्वी के भ्रमण से उत्पन्न दोलन के कारण वृत्ताकार भ्रमण करती है तथा आधुनिक गणनाओं के अनुसार 25,771 वर्षों में अंतरिक्ष में एक परिक्रमा पूरी करती है। इसीलिए 12,000 वर्ष पूर्व यह अक्ष अभिजित तारे पर जाता था। इस अक्ष परिवर्तन के कारण वसंत सम्पात प्रतिवर्ष 50 कला पीछे सरक जाता है। वैदिक ऋषियों ने इसे ही अयन चलन की संज्ञा देकर वार्षिक अयनांष गति की गणना भी महाभारत काल के पहले कर ली थी। इसीलिए भारतीय ग्रह गणनाएं व मासों के नाम अति प्राचीनकाल से ही सायन (स+अयन) व निरयन (नि:+अयन) दोनों प्रकार के चलन में रहे हैं। इस अयन चलन के परिणाम स्वरूप ही हम 22 दिसंबर को सायन मकर संक्रमण के साथ निरयन मकर संक्रांति को प्रति 71 वर्षों में एक दिन आगे बढ़ाते आए हैं और अब मकर संक्रांति 14/15 जनवरी को मनाते हैं। स्वामी विवेकानंद के जन्म के वर्ष में मकर संक्रांति 12 जनवरी को थी। अयनांष गति के कारण 2 वर्ष पूर्व तक इसे 14 जनवरी को मनाते रहे हैं और अब भविष्य में 15 जनवरी को मनाएंगे।



महाभारत काल के पूर्व के सायन व बाद के निरयन मासमान        
  
वर्तनिरयन मास चैत्र     वैशाख    ज्येष्ठ    आषाढ़     श्रावण    भाद्रपद      आश्विन     कार्तिक     मार्गशीर्ष     पौष      माघ      फाल्गुन
प्राचीन सायन           मधु      माधव       शुक्र       शुचि        नभ       नभस्य      इष           ऊर्ज         सह         सहस्य   तप        तपस्य
प्राचीन मास व उनकी ऋतुए    वसंत ऋतु               ग्रीष्म ऋतु                 वर्षा ऋतु              शरद ऋतु                हेमंत ऋतु              शिशिर ऋतुं   
 
    

12,000 वर्ष पूर्व वैदिक मास गणना
5,000 वर्ष पूर्व महाभारत काल (उद्योग पर्व अध्याय 106) में ही हमने अयन चलन के कारण पूर्व में प्रचलित मासों के नाम मधु, माधव से बदल कर चैत्र आदि निरयन मास अपना लिए थे। वैदिक काल के सायन मासों के नाम मधु, माधव, शुक्र, शुचि आदि जो, संभवत: 12,000 वर्ष पूर्व से चलन में रहे होंगे। तब पृथ्वी का अक्ष वर्तमान ध्रुव तारे पर न जाकर अभिजित की ओर जाता था। बाद में अयन चलन के कारण अक्ष परिवर्तन के अनुरूप अयनांष घटाकर महाभारत काल के आसपास वैदिक पूर्वजों ने निरयन ग्रह गणनाओं को अपना कर चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ आदि का नामकरण पूर्णिमाओं के दिन के आधारित निरयन नक्षत्रों के अनुरूप किया होगा। ये प्राचीन व नव्य ऊपर मास तालिका में दिए गए हैं। यहां यजुर्वेदीय तैत्तिरीय संहिता का वह मंत्र भी दिया जा रहा है जिसमें प्राचीन मासों के नाम मधु, माधव आदि हैं। ये नाम महाभारत काल के पूर्व व संभवत: 12,000 वर्ष पूर्व संहिता अभिजित तारे के ध्रुव तारा होने के समय के हो सकते हैं। जिस माह की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में होती है, उसे चैत्र, विशाखा में पूर्णिमा वाले मास को वैशाख, ज्येष्ठा में पूर्णिमा युक्त मास ज्येष्ठ और इसी प्रकार आज शेष मासों के नाम भी तदनुरूप है।

प्राचीन अयन गणनाओं एवं तदनुरूप ग्रहों, मासों की सायन व निरयन, दो प्रकार की गणनाओं से स्पष्ट है कि जिन प्राचीन वैदिक संहिताओं में मासों के नाम मधु, माधव आदि हैं, वे न्यूनतम 5,000 वर्ष व संभवत: 12,000 वर्ष से प्राचीन हो सकती हैं। रामायण काल में भी मासों के नाम मधु, माधव होने के कारण गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामनवमी के संदर्भ में ‘नौमी तिथि मधुमास पुनीता’ लिखा है। मधु, माधव आदि प्राचीन मासों के तैत्तिरीय व वाजसानेयी संहिताओं के श्लोक भी यहां उद्घरणीय हैं:

मधुश्च माधवश्च वासन्तिकावृतू। शुक्रश्च शुचिश्च ग्रैष्मावृतू।
नभश्च नभस्यश्च वार्षिकावृतू। इषश्चोर्जश्च शारदावृतू।
सहश्च सहस्यश्च हैमन्तिकावृतू। तपश्च तपस्यश्च शैशिरावृतू॥     (यजुर्वेद तैत्तिरीय संहिता 4.4.11)

ध्रुव तारा ही पृथ्वी व सौरमंडल का नियामक
पृथ्वी की धुरी 434 प्रकाश वर्ष दूर स्थित ध्रुव तारे पर केंद्रित है। यह धुरी प्रति 25,771 वर्षों मे अपने ध्रुव की परिक्रमा भी करती है। देवी भागवत पुराण के 8वें स्कंध के 17वें अध्याय के श्लोक 4-8 तक में स्पष्ट लिखा है कि सौरमंडल में भ्रमणरत ग्रह-नक्षत्र आदि समस्त ज्योति पुंज अचल स्तंभ के रूप में ध्रुव को व्यक्तगति कालचक्र ने केंद्रस्थ स्थापित किया हुआ है। सभी ग्रह ध्रुव का ही केंद्र रूप में आश्रय लेकर परिभ्रमण करते हैं। ध्रुव की केंद्रस्थ स्थिति का वर्णन पुराणों में अन्यत्र भी मिलता है। 

आजीव्य: कल्पजीविनामुपास्ते भगवत्पदम्।
ज्योतिर्गणानां सर्वेषां ग्रहनक्षत्रमादिनाम्॥ 4
कालेनानिमिषेणायं भ्राम्यतां व्यक्तरंहसा।
अवष्टम्भस्थाणुरिव विहितश्चेष्वरेण स:॥ 5
भासते भासयन्भासा स्वीयया देवपूजित:।
मढिस्तम्भे यथा युक्ता: पशव: कर्षणार्थका:॥ 6
मण्डलानि चरन्तीमे सवनत्रितयेन च ।
एवं ग्रहादय: सर्वे भगणाद्या यथाक्रमम्॥ 7
अन्तर्बहिर्विभागेन कालचक्रे नियोजिता:।
ध्रुवमेवावलम्ब्याशु वायुनोदीरिताश्च ते॥ 8
भारतीय खगोल विज्ञानियों का अयन गति का शुद्घ ज्ञान
भास्कराचार्य ने भी 12वीं सदी में रचित सिद्धांत शिरोमणि ग्रंथ में इसे भचक्र सम्पात बताते हुए अयन चक्र की अवधि 25,812 वर्ष बताई थी। इसलिए 12,000 वर्ष पूर्व ध्रुव तारा अभिजित था। 14,000 वर्ष बाद 27,800 ई. में पुन: अभिजित होगा। सर्वप्रथम यह ज्ञान केवल भारतीय वैदिक ऋषियों को ही विदित था। अधिकांश भारतीय पंचांग निरयन ग्रह गणना पर ही आधारित हैं।
 (लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)