शिक्षा प्रसारक और गोसेवक

    दिनांक 09-दिसंबर-2020
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पूनम नेगी
आजाद  भारत की संसद के पहले गेरुआ वस्त्रधारी संन्यासी सदस्य स्वामी ब्रह्मानंद अनूठे गोसेवक थे। इन्होंने ही सबसे पहले संसद में गोरक्षा के लिए स्वर बुलंद किया था। सांसद रहते हुए भी वे भिक्षा मांगकर भोजन करते थे। वेतन और पेंशन को वे गोसेवा और शिक्षा के लिए लगा देते थे
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स्वामी ब्रह्मानंद का एक दुर्लभ चित्र

जनसंघ के सांसद के तौर पर गोवंश की रक्षा और गोवध के विरोध में स्वामी ब्रह्मानंद द्वारा 1967 में सदन में दिया गया एक घंटे का ऐतिहासिक भाषण आज भी भारत की सनातन जीवन पद्धति में गोमाता की महत्ता प्रतिपादित करने वाला ‘मील का पत्थर’ माना जाता है। वे कहते थे, ‘‘गोवंश की रक्षा के लिए मैं किसी भी प्रकार का त्याग करने को सदैव तत्पर हूं, यहां तक कि गोमाता के लिए मैं अपने प्राणों की आहुति भी सहर्ष दे सकता हूं।’’ 1966 में हुए देश के सबसे बड़े गोहत्या निषेध आंदोलन की अगुआई करते हुए स्वामी ब्रह्मानंद ने साधु-महात्माओं के विशाल जत्थे के साथ प्रयाग से दिल्ली तक पदयात्रा कर रामनवमी के शुभ दिन राष्ट्रीय राजधानी में जुटे 10-12,00,000 लोगों के हुजूम के साथ ऐसा अभूतपूर्व सत्याग्रह किया था जिसने तत्कालीन सरकार की चूलें हिला दी थीं।

बेकाबू स्थितियों से घबराकर सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया। तब स्वामी ब्रह्मानंद ने प्रण लिया कि अब वे देश की संसद में गोरक्षा के मुद्दे पर अपना पक्ष रखेंगे और भारत के प्रत्येक नागरिक को इस मुद्दे पर जागरूक करेंगे। अपनी इस इच्छा को अमली जामा पहनाने के लिए जेल से मुक्त होते ही उन्होंने 1967 में हुए देश के चौथे लोकसभा चुनाव में बुंदेलखंड की हमीरपुर सीट से जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीतकर संसद पहुंचे और जनप्रतिनिधियों के समक्ष एक आदर्श जनसेवी का उदाहरण प्रस्तुत किया।

  एक सामान्य संसद सदस्य से इतर संन्यासी ब्रह्मानंद का सार्वजनिक जीवन तमाम अनूठी प्रेरणाओं से भरा हुआ है। आने वाली पीढ़ियां दो प्रमुख कारणों से स्वामी ब्रह्मानंद के योगदान को कभी भुला नहीं सकतीं। पहला, गोरक्षा आंदोलन में उनकी अप्रतिम भूमिका और दूसरा, शिक्षा के लिए किए गए उनके भगीरथ प्रयास। स्वामी ब्रह्मानंद ऐसे अनूठे संत जनसेवी थे, जिन्होंने खुद को किसी अखाड़ा, आश्रम, परिषद या संस्था के दायरे में कैद करने के बजाय हमेशा सामाजिक सरोकारों से जोड़े रखा और समाज सुधार की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किए। कहा जाता है कि 1966 के राष्ट्रव्यापी गोरक्षा आंदोलन ने स्वामी ब्रह्मानंद को देशभर में विख्यात कर दिया था और आम जन में स्वामी जी के प्रति अगाध श्रद्धा जाग उठी थी।

मगर उसी दौरान गोरक्षा के मसले पर जनसंघ के साथियों से कुछ मत भिन्नता हो जाने के अवसर का लाभ उठाते हुए इंदिरा गांधी ने स्वामी ब्रह्मानंद की राष्ट्रव्यापी लोकप्रियता को अपने पक्ष में भुना लिया। इस तरह दूसरी बार वे पांचवीं लोकसभा में कांग्रेस के टिकट पर पुन: सांसद बने। स्वामी ब्रह्मानंद 1967 से 1977 तक लगातार 10 वर्ष तक सांसद रहे। स्वामी ब्रह्मानंद के व्यक्तित्व की महानता व निस्पृहता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अपने पूरे संन्यासी जीवन में उन्होंने कभी भी अपने हाथ से एक फूटी कौड़ी तक नहीं छुई। वे भोजन तक भिक्षा मांगकर खाते थे। बतौर सांसद उन्हें जो भी धन व पेंशन मिलती थी, उसकी पाई-पाई वे शिक्षा के प्रसार और गोसेवा के लिए दान दे देते थे। जानकारों की मानें तो संन्यास ग्रहण करने के बाद उन्होंने पैसा न छूने का जो संकल्प लिया था, उसे मरते दम तक निभाया। स्वामी जी सही मायने में सच्चे कर्मयोगी थे, उनका वैराग्य नैसर्गिक था और अपने आप तक सीमित नहीं था, बल्कि उनके वैराग्य का लाभ सारे समाज को मिला।

इस विभूति का जन्म 4 दिसंबर, 1894 को उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले की राठ तहसील के बरहरा नामक गांव में एक साधारण किसान दंपती मातादीन लोधी व जशोदाबाई के घर पुत्र रूप में हुआ। इनके बचपन का नाम शिवदयाल था और ये बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्धि व आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। प्रारंभिक शिक्षा हमीरपुर में पूरी कर वे घर पर ही रामायण, महाभारत, गीता, उपनिषद् और अन्य धर्मशास्त्रों के स्वाध्याय में जुट गए। बेटा कहीं साधु न बन जाए, इस भय से माता-पिता ने सात वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह राधा बाई नाम की हमउम्र बालिका से करा दिया। फिर भी उनका मन धर्म व आध्यात्मिकता की तरफ ही झुका रहा। हालांकि माता-पिता के दबाव में उन्होंने 20-22 वर्ष तक तो गृहस्थी की गाड़ी खींची, लेकिन पत्नी और दो संतानों का मोह भी उन्हें ज्यादा समय तक बांधे न रख सका। 23-24 वर्ष की आयु में उन्होंने घर त्याग दिया और हरिद्वार में जाकर संन्यास की दीक्षा ले ली और शिवदयाल लोधी से स्वामी ब्रह्मानंद बन गए।

संन्यास ग्रहण करने के बाद स्वामी ब्रह्मानंद ने पहला कदम सम्पूर्ण भारत के भ्रमण का उठाया। कहते हैं कि उसी दौरान उनके अंतस में विदेशी दासता तथा समाज में फैले हुए अंधविश्वास और अशिक्षा जैसी कुरीतियों के खिलाफ विद्रोह के स्वर मुखर होने लगे। उन्होंने देशवासियों की भावनाओं और उनकी समस्याओं की जड़ को देखा और पाया कि अशिक्षा ही  सभी समस्याओं की मूल जड़ है। लिहाजा वे पूर्ण मनोयोग से अशिक्षा निवारण के पुनीत अभियान में जुट गए। खासतौर पर पंजाब व बुन्देलखंड में शिक्षा की अलख जगाने में स्वामी जी का योगदान अविस्मरणीय माना जाता है। इन क्षेत्रों में उन्होंने अनेक हिन्दी पाठशालाएं खुलवार्इं। आज भी उनके नाम से हमीरपुर में डिग्री कॉलेज चल रहा है, जिसकी बुनियाद स्वामी जी ने ही 1938 में ब्रह्मानंद विद्यालय के रूप में रखी थी। स्वामी जी ने 1943 में हमीरपुर में ब्रह्मानंद संस्कृत महाविद्यालय तथा 1960 में ब्रह्मानंद महाविद्यालय की भी स्थापना की थी। यही नहीं, वे अन्य कई शैक्षणिक संस्थाओं के प्रेरक और सहायक भी रहे। ज्ञातव्य हैं कि शिक्षा जगत में उनके सराहनीय योगदान से प्रभावित होकर उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री रहे चन्द्रभानु गुप्त ने उन्हें ‘बुंदेलखण्ड के महामना’  की उपाधि से विभूषित किया था।

शिक्षा क्षेत्र में सक्रिय रहने के साथ उनकी समाजसेवा भी अनुकरणीय थी। उन्होंने बीकानेर सहित राजस्थान के कई जल-विहीन क्षेत्रों में बड़े-बड़े तालाब खुदवाए तथा किसानों और दलितों के उत्थान के लिए अनेक संघर्ष किए और गोहत्या बंदी के लिए देशव्यापी आंदोलन चलाए। इसी बीच 1921 में पंजाब के भटिंडा में स्वामी ब्रह्मानंद की भेंट महात्मा गांधी से हुई। उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर गांधी जी ने कहा था, ‘‘स्वामी जी! अगर आप जैसे सौ लोग भी उनके साथ आ जाएं तो स्वतंत्रता अविलम्ब प्राप्त हो सकती है।’’ गांधी जी के इस आह्वान पर वे  स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। 1930 में स्वामी जी ने नमक आंदोलन में हिस्सा लिया। 1932 में सविनय अविज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में उन्हें जेल जाना पड़ा। 1942 में स्वामी जी को पुन: भारत छोड़ो आंदोलन में जेल जाना पड़ा। ज्ञात हो कि स्वामी जी ने पूरे उत्तर भारत में अग्रेजों के खिलाफ अलख जगाई। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय स्वामी जी का नारा था, ‘‘उठो! वीरो उठो!! दासता की जंजीरों को तोड़ फेंको। भारत माता बलिदान चाहती है। दासता के जीवन से मृत्यु अधिक  श्रेयस्कर है।’’ कहा जाता है कि संन्यासी चोला पहन जंगे आजादी के इस परवाने ने जब अपने तेवर दिखाए तो उनकी हुंकार से एकबारगी अंग्रेज हुकूमत भी थर्रा उठी थी।
    
स्वामी ब्रह्मानंद जी 90 वर्ष का स्वस्थ व सक्रिय जीवन जीकर 13 सितम्बर, 1984 को ब्रह्मलीन हो गए, लेकिन उनका जीवन और शिक्षाएं आज भी हमें सन्मार्ग दिखाती हैं। बताते चलें कि स्वामी जी के गोलोक वास के उपरांत उनके सम्मान में उत्तर प्रदेश  के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने उनके गांव बरहरा का नाम ‘स्वामी ब्रह्मानंद धाम’ रखा तथा विरमा नदी पर बने मौदहा बांध को ‘स्वामी ब्रह्मानंद’ के नाम से विभूषित कर दिया था। तत्पश्चात् 13 सितम्बर, 1997 को सूबे की तत्कालीन सरकार ने स्वामी ब्रह्मानंद के 13वें निर्वाण दिवस पर उनके सम्मान में एक विशेष डाक टिकट भी जारी किया था।