ईश्वर कैलकुलस की भाषा में बात करते हैं!
   दिनांक 10-फ़रवरी-2020
अमित सिंघल
 
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अमेरिका के कॉर्नेल विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफेसर स्टीवन स्ट्रोगेट्ज ने कैलकुलस पर एक पुस्तक लिखी है, जिसका नाम है ‘अनंत शक्तियां- कैसे कैलकुलस इस ब्रह्मांड के रहस्य को उजागर करता है’ (Infinite Powers – How Calculus Reveals the secret of the Universe) हाल ही में इस पुस्तक को पढ़ने का अवसर मिला।
 
स्ट्रोगेट्ज बताते हैं कि कैलकुलस की शुरुआत पाइथागोरस और आर्कमिडीज के समय हुई। मैंने 12वीं कक्षा तक गणित की पढ़ाई की। तब मुझे सूत्र और समीकरण रटा दिए गए थे, जिनसे किसी भी समस्या का समाधान निकल आता था। हाई स्कूल और इंटर, दोनों में गणित में 90 प्रतिशत के ऊपर नंबर आए थे। लेकिन पढ़ाई के समय कभी सोचा नहीं कि इन सूत्रों और समीकरणों की उत्पत्ति कब और कैसे हुई? उदाहरण के लिए, पाई (π) का मान 3.14 रटा दिया गया था। लेकिन इस मान की उत्पत्ति कैसे हुई, इसका आधार क्या था, मास्टर जी ने कभी बतलाया नहीं। लेखक बतलाते हैं कि 2300 वर्ष पूर्व आर्कमिडीज ने गोले या वृत्त की परिधि (c) नापने का प्रयास किया। समस्या यह थी कि वृत्त को किसी स्केल से नहीं नापा जा सकता था, क्योंकि यह एक निरंतर लकीर है जिसका न आदि है, न अंत।
 
इससे निपटने के लिए आर्कमिडीज ने वृत्त पर समान दूरी पर 6 बिंदु लगाकर उन्हें सीधी रेखा से जोड़ा और उस हेक्सागॉन (षट्कोण) को नापा जिसके परिमाप को उसने स्र कहा। उसने पाया कि वृत्त का व्यास (d) त्रिज्या (r) से दो गुना होता है, या d=2r अत: परिधि त्रिज्या से 6 गुना बड़ी हुई। लेकिन परिधि (c) हेक्सागॉन की 6 सपाट रेखाओं (p) से बड़ी होगी। अर्थात् c>6r अत: वृत्त की परिधि और उसके व्यास के अनुपात को इस सूत्र से लिखा जा सकता है- π=c/d=c/2r=6r/2r=3
 
फिर आर्कमिडीज वृत्त पर समान दूरी पर बिंदु लगाता गया और उसे 96 भागों में बांट दिया, जिससे दो बिंदुओं के बीच की दूरी लगभग एक सपाट रेखा की तरह हो गई। उसने वृत्त के अंदर और बाहर 96-कोण की रेखाएं खींची और साबित किया कि पाई का मान 3+10/71 से बड़ा है, लेकिन 3+10/70 से छोटा है। अर्थात् 3+10/71 < π < 3+10/70. 3+10/70 ही आज के पाई का 22/7 या 3.14 मान है। ‘इनफाइनाइट पावर्स’ में स्ट्रोगेट्ज ने लिखा कि कैलकुलस किसी निरंतर जटिल समस्या को हल करने के लिए समस्या को कई छोटे हिस्सों में बांट देता है। फिर उन सभी छोटे हिस्सों को हल करता है और उसके बाद उन सभी हल को एक साथ रखकर बड़ी समस्या का समाधान निकाल देता है। इसीलिए वह इसे ‘अनंत सिद्धांत’ कहते हैं।
 
स्ट्रोगेट्ज कई सदियों तक कैलकुलस की प्रगति के बारे में बतलाते हैं। हमने न्यूटन के तीन नियमों के बारे में पढ़ा है, लेकिन यह नहीं मालूम था कि इन तीन नियमों का अविष्कार न्यूटन ने कैलकुलस के द्वारा किया था। दिलचस्प बात यह है कि भारत के गणितज्ञ न्यूटन से पहले कैलकुलस के उस पहलू (पावर सीरीज) की खोज कर चुके थे। स्ट्रोगेट्ज लिखते हैं कि भारत के गणितज्ञों ने शून्य तथा दशमलव की खोज की थी। बिना शून्य की खोज के अनंत नहीं मिल सकता। एक पल के लिए सोचिए कि दो हजार वर्ष पूर्व हमारे भव्य मंदिर और उनके गोपुरम क्या बिना गणित की मदद के बन सकते थे? क्या बिना कैलकुलस के सूत्रों के प्रयोग के एक संपूर्ण संरचना बनाई जा सकती थी? आक्रांताओं द्वारा नालंदा, तक्षशिला और अन्य विश्वविद्यालयों को जला देने के बाद हमारे किन ज्ञान और पुस्तकों को सदा के लिए हमसे छीन लिया गया, किसे पता? कैलकुलस के ही द्वारा एड्स की दवा, माइक्रोवेव, जीपीएस, क्वांटम फिजिक्स, चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी इत्यादि संभव हुई है।
 
आज मेडिकल रिसर्च में कैलकुलस का बोलबाला है। हमारे सुदूर ब्रह्मांड से लेकर सूक्ष्मतम कण का रहस्य कैलकुलस से पता चल रहा है। हर चीज कहीं न कहीं कैलकुलस के नियमों से संचालित है। तभी क्वांटम फिजिक्स के प्रसिद्ध वैज्ञानिक रिचर्ड फेनमान ने कैलकुलस को ‘ईश्वर की भाषा’ कहा था। आप अपने पुत्र और पुत्रियों को यह पुस्तक अवश्य भेंट कीजिए। गणित से उन्हें वास्तव में प्यार हो जाएगा। - फेसबुक वॉल से