सच को छुपाता सेकुलर मीडिया
   दिनांक 10-फ़रवरी-2020
सेकुलर मीडिया का आचरण उस व्यक्ति जैसा होता है, जिसका नैतिक पतन हो चुका है
a_1  H x W: 0 x 
 
कोई सत्ताधारी पार्टी मीडिया का कैसे दुरुपयोग कर सकती है और मीडिया कैसे उसके आगे पूरी तरह समर्पण कर सकता है, इसका उदाहरण इन दिनों दिल्ली में देखने को मिल रहा है। शायद सरकारी विज्ञापनों का असर है कि इस चुनाव के संभावित नतीजों में कई मीडिया समूह अपना नफा-नुकसान भी देख रहे हैं। ज्यादातर बड़े अखबार और चैनलों पर आपको वे मुद्दे नजर नहीं आएंगे, जिन पर यह सरकार बुरी तरह से घिरी हुई है। शाहीन बाग में गोली चलाने वाले को मीडिया ने देखते ही देखते ‘हिंदू आतंकवादी’ घोषित कर दिया। लगभग सभी चैनलों ने बार-बार उसका वह बयान सुनाया जिसमें वह बोल रहा है, ‘यहां सिर्फ हिंदुओं की चलेगी’। तथाकथित बड़े संपादकों ने ट्वीट कर बताना शुरू कर दिया कि आरोपी एक केंद्रीय मंत्री के बयान के कारण उकसावे में आकर शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों पर हमला करने के लिए आ गया। लेकिन जैसे ही यह जानकारी सामने आई कि आरोपी आम आदमी पार्टी का कार्यकर्ता है, मीडिया को मानो सांप सूंघ गया। कल तक जिन्हें ‘लोकतंत्र में हिंसा की संस्कृति’ और ‘हिंदू आतंकवाद के उभार’ की चिंता हो रही थी वे अचानक शीतनिद्रा में चले गए। हमले वाले दिन ही यह जानकारी सामने आ गई थी कि आरोपी आम आदमी पार्टी से जुड़ा हुआ है। मीडिया को भी यह अच्छी तरह से पता था। वे चाहते तो आम आदमी पार्टी के कैडर का स्टिंग आॅपरेशन करके पहले ही सचाई सामने ला सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
 
जेएनयू के राष्ट्रवादी छात्रों के खिलाफ फर्जी स्टिंग आॅपरेशन करने वाले ‘इंडिया टुडे’ और ‘आजतक’ तो पूरी तरह से आम आदमी पार्टी का प्रचार विभाग बन चुके हैं। पता चला है कि वहां पर केजरीवाल के खिलाफ आम जनता के नकारात्मक बयानों को भी कम दिखाने को कहा गया है। दिल्ली में मोहम्मद वसीम को हथियारों के जखीरे के साथ पकड़ा गया, लेकिन अखबारों और चैनलों ने खबर दबा दी। इसी तरह जामिया हिंसा में जलता हुआ टायर पुलिस पर फेंकने वाले इलियास की गिरफ्तारी को भी मीडिया ने अंदर के पन्नों पर दबा दिया। दिल्ली के अखबारों में एक खबर छपी कि सीवर सफाई के दौरान एक मजदूर की जान चली गई। इस खबर में बड़ी चालाकी से जोड़ा गया कि जहां पर यह घटना हुई वहां एक दिन बाद प्रधानमंत्री की रैली होने वाली है। दिल्ली में चुनाव चल रहे हैं। किसी अखबार या चैनल ने यह सोचने की जरूरत नहीं समझी कि कुछ महीने पहले ही उन्होंने दिल्ली सरकार का बयान छापा था कि सीवर सफाई में मजदूरों का इस्तेमाल पूरी तरह बंद करवा दिया है। हर कुछ समय पर ऐसी शर्मनाक घटनाएं हो रही हैं लेकिन मीडिया इन्हें छिपाने या जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर डालने में जुटा रहता है। मुंबई के आजाद मैदान में प्रदर्शन का एक वीडियो सामने आया, जिसमें कुछ लोग शरजील इमाम के समर्थन में नारे लगा रहे हैं और असम को भारत से अलग करने के उसके सपनों को पूरा करने की बात कर रहे हैं। इस पर राजद्रोह का केस दर्ज हुआ लेकिन मुंबई के अखबारों में यह समाचार अंदर के पन्नों पर छपा।
 
ऐसे ही मामलों में जब भाजपा शासित सरकारें राजद्रोह का मुकदमा दर्ज करती हैं तो मीडिया का रवैया कुछ अलग ही होता है। नागरिकता कानून के विरोध में प्रदर्शनों में देशद्र्रोही नारे लगाने के कई वीडियो सामने आए। सोशल मीडिया पर आम लोग इन प्रदर्शनों के पीछे की असली मंशा पर सवाल खड़े कर रहे हैं, लेकिन यह पूरा विमर्श मुख्यधारा मीडिया से गायब है। प्रदर्शनों में छोटे बच्चों के इस्तेमाल और शाहीन बाग में एक बच्ची की मौत पर भी मीडिया आंख-कान बंद किए हुए है। बिहार, झारखंड और बंगाल में सरस्वती पूजा के दौरान पथराव की कई खबरें आर्इं। लेकिन सेकुलर मीडिया में उन्हें कोई महत्व नहीं मिला। जिन्होंने समाचार छापा भी तो इसे ‘दो गुटों का झगड़ा’ बताया। लोहरदगा में जिहादी भीड़ के हाथों मारे गए नीरज प्रजापति पर भी मीडिया में कोई ‘फॉलोअप’ देखने को नहीं मिला। बजट के प्रावधानों को लेकर भी मीडिया के एक वर्ग ने भ्रम फैलाने की भरपूर कोशिश की। कई क्षेत्रों में आवंटन को लेकर झूठी खबरें भी उड़ाई गर्इं। एअर इंडिया, एलआईसी और बीएसएनएल में विनिवेश को लेकर भी भ्रामक जानकारियां फैलाने की कोशिश भी की गईँ। पहले दिन शेयर बाजार के गिरने को ‘बजट से नाराजगी’ घोषित कर दिया गया। लेकिन अगले दिन से शेयर बाजार में तेजी पर मीडिया का यह वर्ग ऐसे चुप्पी मार गया, मानो कुछ हुआ ही नहीं। मुख्यधारा मीडिया को अभी तक यह समझ में नहीं आया है कि अब उसकी प्रतियोगिता सोशल मीडिया से है। अगर वह झूठ फैलाएगा तो भी लोग सच को ढूंढ ही निकालेंगे। ल्ल