लंगर कहकर ओवैसी शाहीन बाग में बंटवा रहे खैरात
   दिनांक 11-फ़रवरी-2020
डीएस बिंद्रा हैदराबाद के कट्टरपंथी मुस्लिम नेता असदुद्दीन ओवैसी के सगे लोगों में शामिल है। इतने सगे कि ओवैसी साहब के एजेन्डे को सफल बनाने के लिए उन्होंने सिख परम्पराओं से समझौता करना तक स्वीकार कर लिया

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आज तक और लल्लनटॉप ने सबसे पहले 'शाहीन बाग में लंगर खिलाने के लिए फ्लैट बेच दिया!' शीर्षक से खबर चलाई। यह खबर लल्लनटॉप के लिए उमा ने लिखी थी। जिसमें रिसर्च का घोर अभाव दिखा। एक बार जब खबर आज तक और लल्लन टॉप पर तीन दिनों पहले चल गई, उसके बाद इस खबर को फॉलो करने वालों की लाइन लग गई। नवभारत टाइम्स के लिए राम किशोर ने लिखा — 'शाहीन बाग में लंगर खिलाने के सिख भाई ने अपना फ्लैट बेच दिया!' डीएस बिंद्रा के संबंध में प्रकाशित मीडिया रिपोर्टस के अनुसार उनके पास तीन फ्लैट थे। शाहीन बाग में लंगर खिलाने के लिए उन्होंने एक फ्लैट बेच दिया। फ्लैट इसलिए बेचना पड़ा क्योंकि वे लंगर खिलाना चाहते थे लेकिन उनके पास इतने पैसे घर में रखे नहीं थे।
ऐसी खबर मीडिया में आते ही एडवोकेट डीएस बिन्द्रा सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। हर तरफ उनकी तारीफ होने लगी। यह एक सिख का प्रयास था, जिसमें उसने रोटी भी खिलाई और मुसलमानों को कन्वर्ट करने की कोशिश भी नहीं की। यदि यह रोटी किसी मुस्लिम या क्रिश्चियन संगठन ने खिलाई होती तो इतने दिनों में दो—तीन दर्जन लोगों को कन्वर्ट करा ही चुके होते। नेपाल के भूकम्प में ऐसा पूरी दुनिया ने देखा। जहां एक हाथ में मदद और दूसरे हाथ में बाइबल लेकर क्रिश्चियन संगठन पहुंचे थे।

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सिख समुदाय में त्याग और बलिदान की इतनी बड़ी परंपरा है कि इस देश में शीश पर पगड़ी का अर्थ ही विश्वास होता है। यही विश्वास है जिसकी वजह से सिख समाज को अपने साथ कृपाण लेकर संवेदनशील क्षेत्रों में जाने की भी अनुमति होती है।
जहां विश्वास होता है, वहां विश्वासघात भी होता है। हर समाज में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो पूरे समुदाय को शर्मिन्दा करते हैं। जैसे दिल्ली पुलिस बाधवा सिंह बब्बर, गजेन्द्र सिंह, जगतार सिंह, पुरुषोत्तम सिंह पम्मा जैसे सिख आतंवादियों को तलाश रही है। इन सभी पर दिल्ली पुलिस ने भारी ईनाम भी रखा है।
एडवोकेट डीएस बिन्द्रा के संबंध में जानने से पहले थोड़ी बात लंगर पर कर लेते हैं। क्या शाहीन बाग में चल रहे बिन्द्रा के ढाबे को लंगर का नाम दिया जा सकता है? बंट रहे खैरात को लंगर का नाम देने से पहले कोई भी सच्चा सिख दस बार सोचेगा। वैसे लंगर का खाना खाने से पहले कट्टरपंथी मुसलमान भी दस बार सोचेगा। कट्टरपंथी मुसलमान शब्द का जिक्र यहां विशेष उद्देश्य से किया गया है, जिसके संबंध में आगे की पंक्तियों में बताऊंगा।
बता करते हैं लंगर की रोटी की। जिसे सतगुरू के सेवादार बड़ी श्रद्धा से बेलते और पकाते हैं। सुंदर सी थाली में रखकर और फिर उसे रेशमी रूमाल से ढक कर, बड़े मान—सम्मान के साथ उसे सतगुरू के सामने लाया जाता है। लगभग पन्द्रह मिनट तक रोटी को सतगुरू के समक्ष ही रखा रहने दिया जाता है। सतगुरू के संपर्क में आकर वह रोटी सिर्फ रोटी नहीं रहती बल्कि प्रसाद हो जाती है। इसलिए जब वापस रोटी को रसोई तक लाया जाता है, उस रोटी को सारी संगत खड़े होकर प्रणाम करती है। यदि इन नियमों का पालन शाहीन बाग में नहीं हो रहा तो एडवोकेट डीएस बिन्द्रा शाहीन बाग में जो कर रहे हैं उसे दान कहा जा सकता है, खैरात कहा जा सकता है, वह लंगर नहीं है। और एक महत्वपूर्ण बात कि लंगर कभी एक व्यक्ति द्वारा नहीं लगाया जाता। वह सामुदायिक प्रयास से चलता है।
इस तरह शाहीन बाग के कथित आंदोलन में एडवोकेट डीएस बिन्द्रा इस्तेमाल हुए हैं। यह इस्तेमाल होना उनकी अपनी सहमति से हुआ, ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि बिन्द्रा हैदराबाद के कट्टरपंथी मुस्लिम नेता असदुद्दीन ओवैसी के सगे लोगों में शामिल है। इतने सगे कि ओवैसी साहब के एजेन्डे को सफल बनाने के लिए उन्होंने सिख परम्पराओं से समझौता करना तक स्वीकार कर लिया।
यह दिलचस्प है कि आज तक और लल्लनटॉप दोनों ही अपनी स्टोरी में बिन्द्रा और ओवैसी का रिश्ता बताना भूल गए। बिन्द्रा ओवैसी की पार्टी आल इंडिया मजलिस ए इत्तेहाद मुस्लिमीन एआईएमआईएम के दिल्ली प्रदेश महासचिव हैं। वे अपने फेसबुक पोस्ट में ओवैसी के साथ खड़े होकर युवाओं से एआईएमआईएम में शामिल होने की अपील करते हैं।
शाहीन बाग के प्रदर्शन को गैर राजनीतिक प्रदर्शन बताकर प्रचारित किया गया। बताया गया कि यहां इकट्ठी हुई भीड़ स्वाभाविक है। जबकि इस भीड़ को इकट्ठा करने के लिए जुटाए गए संसाधनों का पिछले दिनों खुलासा हो गया। शाहीन बाग को प्रदर्शन स्थल रखने के पिछे पीएफआई का प्रदर्शन से कनेक्शन पहले ही सामने आ चुका है। अब इस गैर राजनीतिक आंदोलन का राजनीतिक व्यवहार भी समाज के सामने एक्सपोज हो गया।
डीएस बिन्द्रा जो कट्टरपंथी ताकतों के हाथों के खिलौना बने खेल रहे हैं, क्या उन्होंने गुरू नानक देव और बढ़ई लालो की कहानी पढ़ी है। नहीं पढ़ी है तो उन्हें पढ़ना चाहिए। गुरु नानक के समय में पठान हाकीम का दीवान मलिक भागो नाम का एक व्यक्ति हुआ था। मलिक भागो ने अपने पिता का श्राद्ध किया और खाने के लिए उसने दूर—दूर से लोगों को बुलाया। यह बात गुजरांवाला की है। जिस शहर में संयोगवश गुरू नानक भी बढ़ई लालो के बुलावे पर आए थे। मलिक भागो को कहीं से जानकारी मिली कि कोई बड़े संत गुजरांवाला आए हुए हैं और बढ़ई के घर भोजन कर रहे हैं। मलिक भागो ने अपने दो—चार सेवक गुरू नानक देव को बुलाने के लिए भेज दिए। नानक देव ने आने से इंकार कर दिया। मलिक भागो को लगा कि यदि यह संत घर नहीं आए तो पिता का श्राद्ध अधूरा रह जाएगा। उन्होंने दूसरी बार अपने सेवक भेज दिए। इस बार गुरू नानक आ गए। भागो ने पूछा— आप भोजन के लिए क्यों नहीं आ रहे थे। गुरू नानक जवाब देने की जगह लालो की दी हुई रोटी को एक हाथ में रख लिया और दूसरे हाथ में मलिक भागो की पूरी—कचौरी और मिष्ठान रख लिया। जब गुरू ने लालो के खाने को निचोड़ा तो उसमें से दूध बहने लगा और फिर उन्होंने मलिक भागो की रोटी निचोड़ी तो उसमें से खून निकल आया। गुरू ने नानक ने यह दिखाते हुए मलिक भागो को कहा— ''देख तेरा भोजन क्यों नहीं खाया।'' वास्तव में बिना नेक कमाई के परमार्थ में कामयाबी नहीं मिलती।