कांग्रेस का भी धन्यवाद करें केजरीवाल
   दिनांक 12-फ़रवरी-2020
2015 के चुनाव में जहां भाजपा को 33 प्रतिशत वोट मिले थे, वहीं इस बार यह वोट प्रतिशत बढ़कर 40 तक पहुंच गया है यानी पार्टी ने 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। पार्टी को 36 लाख के करीब वोट मिले हैं, वहीं कांग्रेस के लगभग सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई

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आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल को दिल्ली में अपनी प्रचंड जीत के लिए कांग्रेस को धन्यवाद देना चाहिए। कांग्रेस पार्टी ने जिस तरह से विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के आगे समर्पण किया, उसका नायाब उदाहरण शायद ही राजनीति में देखने को मिले। जो पार्टी सवा पांच साल पहले दिल्ली में सरकार चला रही थी, वो लगातार दूसरी बार अपना खाता तक नहीं खोल पाई। उसके करीब-करीब सभी प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई। देश में लंबे समय तक शासन कर चुकी कांग्रेस के नेता अपनी पार्टी की दुर्दशा पर आत्मचिंतन करने के बजाय भारतीय जनता पार्टी की हार पर ताली बजा रहे हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं। बयान दे रहे हैं। सच्चाई यह है कि कांग्रेस को आज ताली बजाना भविष्य में काफी महंगा पड़ने वाला है। आम आदमी पार्टी ने न केवल दिल्ली में कांग्रेस के कोर वोट बैंक मुस्लिम और अनुसूचित जाति को छिना है, बल्कि अन्य राज्यों में भी यही दोहराने की हुंकार भरी है।
कांग्रेस ने इस बार 66 सीटों पर चुनाव लड़ा। चार सीटें राष्ट्रीय जनता दल को दीं। सभी 70 सीटों पर कांग्रेस गठबंधन न केवल हारा, बल्कि उसका वोट प्रतिशत भी जमीन पर आ गया। कांग्रेस को इस बार मात्र 4.26 प्रतिशत यानी 3,95,924 वोट ही मिले, जबकि 2015 के विधानसभा चुनाव से उसे 9.7 प्रतिशत यानी 8,66,962 वोट मिले थे। 2015 के बाद कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बेहतरीन तरीके से चुनाव लड़ा था और आम आदमी पार्टी को तीसरे नंबर पर धकेल दिया था। भले कांग्रेस सातों सीटों पर हार गई थी, लेकिन 22.5 प्रतिशत वोट लेने में सफल रही थी, जबकि आम आदमी पार्टी को 18.1 प्रतिशत वोट ही मिले थे।
लोकसभा में ठीक-ठाक प्रदर्शन करने के बावजूद कांग्रेस ने शायद यह मान लिया था कि वो विधानसभा चुनाव में कोई खास कमाल नहीं करने जा रही है। यही कारण है कि दिल्ली के उसके स्टार नेता अजय माकन चुनाव से पहले गायब हो गए। स्टार प्रचारक राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने प्रचार की औपचारिकता ही निभाई। दूसरे राज्यों के बड़े नेता दिल्ली प्रचार के लिए आए ही नहीं। बेमन से चुनाव में खड़े हुए शीला दीक्षित सरकार में मंत्री रहे अरविंद सिंह लवली, हारुन यूसुफ, डा. अशोक कुमार वालिया बुरी तरह पराजित हुए।
मुस्लिम वोट कांग्रेस की रीढ़ माना जाता था, लेकिन दिल्ली की मुस्लिम बहुल सीटों पर पार्टी की करारी हार हुई। मुस्तफाबाद सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार अली मेहंदी को मात्र 5355 वोट (2.89 प्रतिशत), ओखला सीट पर परवेज हाशमी को 5107 वोट (2.59 प्रतिशत), सीलमपुर सीट पर चौ. मतीन अहमत को 20207 वोट (15.61 प्रतिशत) और बल्लीमारन में पूर्व मंत्री हारुन यूसुफ को 4797 वोट (4.73 प्रतिशत) वोट ही मिले। पार्टी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सभी सीटों पर हार गई। करोल बाग आरक्षित सीट पर कांग्रेस को 3365 वोट (3.1 प्रतिशत) ही मिले। यही हाल, बावना, अंबेडकर नगर, सुल्तानपुर माजरा, मंगोलपुरी, पटेल नगर, मादीपुर, त्रिलोकपुरी, कोंडली, सीमापुरी, देवली, गोकलपुर का हुआ।
दिल्ली ही नहीं, कांग्रेस उत्तर प्रदेश, बिहार समेत कई राज्यों की राजनीति से पहले ही बाहर हो गई है। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, तमिलनाडु जैसे राज्यों में वो रीजनल पार्टी की बी-टीम बनकर रह गई है। कांग्रेस के भरसक प्रयास के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली में अपना मत प्रतिशत बढ़ाया है। 2015 के चुनाव में जहां भाजपा को 33 प्रतिशत वोट मिले थे, वहीं इस बार यह वोट प्रतिशत बढ़कर 40 तक पहुंच गया है यानी पार्टी ने 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। पार्टी को 36 लाख के करीब वोट मिले हैं।
जहां तक आम आदमी पार्टी की जीत की बात है तो कुछ माह पहले मुफ्त की योजनाओं का सहारा लेकर केजरीवाल ने जनता को बरगलाया भर है। वरना क्या कारण था कि 2015 में 54.3 प्रतिशत हासिल करने के बावजूद आम आदमी पार्टी पहले एमसीडी चुनाव हारी, फिर दिल्ली में उप चुनाव हारी और लोकसभा चुनाव में खाता तक नहीं खोल सकी। साढ़े चार साल केजरीवाल यही दुहाई देते रहे कि केंद्र सरकार उन्हें काम नहीं करने दे रही, लेकिन पिछले कुछ महीनों में बिजली, पानी, महिलाओं के लिए बस यात्रा फ्री करके उन्होंने केवल और केवल वोट खरीदने का काम किया है। शिक्षा के क्षेत्र में केजरीवाल ने सुधार के बड़े-बड़े दावे किए, लेकिन उनके उप मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया को ही अपनी सीट बचानी भारी पड़ गई। सिसोदिया बामुश्किल 3200 वोटों से आखिरी राउंड में जाकर जीते। जो विकास साढ़े साल नहीं दिखा, वो एकाएक कैसे दिख गया।
रही बात कांग्रेस की तो दिल्ली विधानसभा चुनाव में उसके पास अपने कैडर को जिंदा करने का अच्छा मौका था, जो उसने भाजपा को हराने के फेर में गंवा दिया। यह कैडर अब या तो भाजपा की तरफ शिफ्ट होगा या आम आदमी पार्टी में चला जाएगा। दूसरे की हार में अपनी जीत तलाश रही कांग्रेस ने भविष्य में दिल्ली की राजनीति के रास्ते भी बंद कर लिए हैं। 4.26 प्रतिशत मतों से ऊपर उठने की संभावना निकट भविष्य के चुनावों में नजर नहीं आती।