अपनी बात मनवाने को झूठ भी बोलते थे नेहरू !
   दिनांक 16-फ़रवरी-2020
नेहरू बातों को घुमाते थे और अपनी बात मनवाने के लिए असत्य भी बोल देते थे ये भी सिद्ध सत्य है. उदाहरण के लिए नेहरू नहीं चाहते थे कि डॉ राजेन्द्र प्रसाद भारत के राष्ट्रपति बनें

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फिर चर्चा निकली है सरदार पटेल और नेहरू की. विदेशमंत्री एस जयशंकर ने गृहमंत्री सरदार पटेल के गृहसचिव रहे वीपी मेनन पर उनकी प्रपौत्री और इतिहासकार नारायणी बासु की किताब ‘वीपी मेनन : दि अनसंग आर्किटेक्ट ऑफ़ मॉडर्न इंडिया’ को उद्धरित करते हुए ट्वीट किया कि नेहरू पटेल को अपने मंत्रीमंडल में नहीं लेना चाहते थे. इस खुलासे पर कांग्रेस सकते में है क्योंकि कोई भी भारतीय इस कल्पना से सिहर उठता है कि यदि सरदार पटेल देश के गृहमंत्री न होते तो भारत के आज कितने राजनैतिक टुकड़े होते? सरदार के अंदर का लोहा और समझ ही थी जिसने आधुनिक भारत का वर्तमान नक्शा गढ़ा है. सरदार ही थे जिन्होंने भोपाल नवाब , जूनागढ़ रियासत और हैदराबाद के निज़ाम के मज़हबी जूनून और विशाल सैनिक ताकत से निपटकर देश के आगे और टुकड़े होने से रोके. कितने ही रजवाड़े और शाही खानदान थे जो नवस्वतंत्र भारत को स्वायत्त राजनैतिक जमींदारियों में बांटकर अपनी सत्ता को स्थिर रखना चाहते थे. इन सबके बीच से रास्ता निकालने वाले सरदार पटेल, नेहरु और उनके वंशजों द्वारा भुला दिए गए, ये भी सत्य है.
भारतरत्न का फैसला भारत सरकार करती है. नेहरू खुद देश के प्रधानमंत्री रहते हुए भारतरत्न बने. 1971 में उनकी बेटी इंदिरा ने प्रधानमंत्री रहते हुए भारतरत्न ग्रहण किया, लेकिन सरदार पटेल को भारत रत्न न नेहरू ने दिया, न इंदिरा ने और न ही राजीव ने. सरदार को भारत रत्न का सम्मान दिया नरसिम्हाराव ने. जिनको कांग्रेस पार्टी ने बुरी याद की तरह भुला दिया है. मृत्यु के बाद जिनका दाहसंस्कार भी दिल्ली में नहीं होने दिया गया. सत्तर सालों तक देश में हवाईअड्डे, विश्वविद्यालय, स्टेडियम, नेशनल पार्क,केंद्र और राज्य सरकार की योजनाएं आदि नेहरू-गांधी वंश के नाम पर किए जाते रहे, लेकिन सरदार पटेल की याद नहीं की गई. खुद वीपी मेनन ने लिखा है कि “सरदार वल्लभभाई पटेल की मृत्यु के बाद उनकी स्मृति को मिटाने के लिए एक योजनाबद्ध अभियान चलाया गया.” ये सब ज्ञात इतिहास है और देश के लोग इससे अच्छी तरह परिचित हैं.
प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों से सरदार पटेल को उनका उचित स्थान मिलना शुरू हुआ है, और कांग्रेस को पटेल की उपेक्षा और वंशपूजा पर जवाब देते नहीं बन रहा है. ऐसे में यदि वीपी मेनन के हवाले से कही गई बात तूल पकड़ लेती है तो पार्टी और उसका राजपरिवार दिक्कत में आएंगे ही. इसलिए कुछ कांग्रेसी दिग्गज बचाव में कूद पड़े हैं. ट्वीट दागे जा रहे हैं. अच्छा ही है कि ये चर्चा चले. इतिहास के सच देश के सामने आएं. पहले इस आतिशबाजी में शामिल हस्तियों और ऐतिहासिक नामों की चर्चा कर लें.
नेहरू के बचाव में उतरे हैं इतिहासकार रामचंद्र गुहा, जो वामपंथी झुकाव वाले लेखक हैं. संघ, भाजपा, मोदी के कटु आलोचक हैं, और बिना सबूत संघ और भाजपा पर आरोप लगाकर फंस भी चुके हैं. गुहा ने सितंबर 2017 में गौरी लंकेश की हत्या के संबंध में कहा था कि “ ...स्वाभाविक है लंकेश के हत्यारे भी संघ परिवार से आए थे जैसे कि दाभोलकर, पांसे और कलबुर्गी के हत्यारे आए थे..” इस पर गुहा को वैधानिक कार्यवाही का भी सामना करना पड़ा था. प्रधानमंत्री मोदी या मोदी सरकार की सराहना करने वाले सेलेब्रेटी भी गुहा के निशाने पर रहते हैं, जिनमे विराट कोहली और अमिताभ बच्चन भी शामिल हैं. गुहा ने अपने एक लेख में नोटबंदी का समर्थन करने वालों को “चापलूस” कहा था, लेकिन गांधी परिवार से निकटता के लिए शाहरूख़ खान की “वफादारी” की तारीफ़ की थी. नेहरू के बचाव में कांग्रेस नेता शशि थरूर ने भी ट्वीट किए हैं.
चर्चा की शुरुआत की है विदेशमंत्री एस जयशंकर ने. जिस किताब का जयशंकर ने हवाला दिया है वो है वीपी मेनन की जीवनी जिसका हाल ही में उन्होंने विमोचन किया है. 1893 में जन्मे वीपी मेनन सिविल सर्वेंट थे, जिन्होंने गृहमंत्रालय में सरदार पटेल के सचिव के रूप में काम किया और भारतीय रियासतों के विलय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. मेनन को सरदार के दाहिने हाथ के रूप में जाना जाता था. मेनन ने भारतीय राज्यों के एकीकरण के घटनाक्रम पर एक किताब ‘ट्रांसफर ऑफ़ पावर’ भी लिखी जिसे गंभीर अध्येताओं द्वारा एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रन्थ माना जाता है. इसलिए मेनन के हवाले से ये कहा जाना कि सरदार पटेल नेहरू की प्रथम कैबिनेट सूची में नहीं थे, गहन चर्चा और शोध की मांग करता है.
जवाब में गुहा ने नेहरु द्वारा सरदार को लिखा गया पत्र ट्वीट किया है जिसमें उन्होंने नेहरु को कैबिनेट का सबसे मजबूत स्तंभ बतलाते हुए उन्हें कैबिनेट में शामिल होने का आमंत्रण दिया है. जयराम रमेश ने भी माउंटबेटन को दी गई कैबिनेट मंत्रियों की सूची दिखाई है जिसमें पटेल का नाम सबसे ऊपर है.लेकिन सवाल तो इस पत्र के पहले नेहरू द्वारा बनाई गई कैबिनेट मंत्रियों की सूची का है जिसमें सरदार पटेल का नाम नहीं था. इस पर नेहरू के बचाव में गुहा या थरूर या कांग्रेस द्वारा कुछ भी पेश नहीं किया गया है.
नेहरू सरदार से अनेक मुद्दों पर असहमत रहते थे ये सिद्ध सत्य है. सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण, हैदराबाद के निज़ाम से निपटना, कश्मीर में सेना भेजना आदि पर नेहरू और पटेल के विपरीत विचार थे. नेहरू बातों को घुमाते थे और अपनी बात मनवाने के लिए असत्य भी बोल देते थे ये भी सिद्ध सत्य है. उदाहरण के लिए नेहरू नहीं चाहते थे कि डॉ राजेन्द्र प्रसाद भारत के राष्ट्रपति बनें. साल 1949 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति के चुनाव के लिए चर्चा चल रही थी. डॉ राजेंद्र प्रसाद का नाम सबसे आगे था. राजेंद्र प्रसाद संस्कृति के आग्रही थे. सोमनाथ मंदिर निर्माण के प्रश्न पर सरदार पटेल के साथ खड़े थे. नेहरू राजेंद्र प्रसाद के इस झुकाव को पसंद नहीं करते थे, और सी राजगोपालाचारी को उनकी जगह राष्ट्रपति बनाना चाहते थे, लेकिन समस्या ये थी कि राजगोपालाचारी को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पसंद नहीं करते थे. पर नेहरू किसी भी कीमत पर ये करना चाहते थे.
नेहरू ने 10 सितंबर 1949 को डॉ. राजेंद्रप्रसाद को पत्र लिखा कि उनकी सरदार पटेल से चर्चा हुई है और वो भी चाहते हैं कि राजगोपालाचारी राष्ट्रपति बनें. डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सरदार पटेल से बात की. सरदार ने नेहरू से इस तरह की कोई भी चर्चा होने से इनकार कर दिया. स्पष्ट था कि नेहरू ने झूठ बोला था. राजेंद्र बाबू ने नेहरू को जवाबी पत्र लिखकर नेहरू से स्पष्टीकरण मांगा. नेहरू फंस चुके थे. उन्होंने माफ़ी मांगते हुए पत्र लिखा कि उन्होंने “यूं ही” सरदार पटेल का जिक्र कर दिया था और उनकी इस संदर्भ में सरदार से कोई बात नहीं हुई थी. ये पत्र आज भी राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित है.
नेहरू के अंधे चीन प्रेम, माओ –चाऊ एन लाइ के तुष्टीकरण की नीति, नेहरु द्वारा तिब्बत की बलि और भारत की रक्षा तैयारियों की उपेक्षा से भी सरदार नेहरु से असहमत और आहत थे. अपनी मृत्यु से पहले सरदार पटेल ने 1950 में नेहरू को चीन पर चेताते हुए एक पत्र लिखा था, और साफ़ कहा था कि चीन मित्रता का दिखावा और भारत के खिलाफ षडयंत्र कर रहा है. पर नेहरू ने पटेल और उनके पत्र के पूरी तरह उपेक्षा की, चीन अपने षड्यंत्र में सफल हुआ और इस ख़त के 12 साल बाद उसने भारत पर हमला करके लद्दाख का बड़ा हिस्सा दबा लिया.
उपरोक्त सारी बातों को दरकिनार करके वीपी मेनन सरीखे सरदार पटेल के साथी को गलत बताना कांग्रेस और उसके समर्थक इकोसिस्टम की मजबूरी है. शशि थरूर ने थोड़ी सावधानी रखते हुए कहा कि ‘वीपी मेनन महान थे और उनके गृहराज्य केरल से थे, लेकिन महान व्यक्तियों से भी समझने में गलती हो सकती है.’ थरूर और उनकी पार्टी की समस्या ये है कि पार्टी का अस्तित्व नेहरू खानदान पर ही केंद्रित है पर आज के सूचना के युग में नेहरु की गलतियों पर पर्दा डाले रखना असंभव है. उम्मीद है कि ये चर्चा आगे बढ़ेगी और इतिहास के कई गुम हो गए पन्ने सामने आएंगे.