राहुल जी ! 84 के जघन्य हत्याकांड और देश विभाजन के दंगों का फायदा किसे मिला ?
   दिनांक 17-फ़रवरी-2020
लाशों में नफ़ा-नुकसान ढूंढने का कांग्रेस का पुराना इतिहास है. राहुल अपनी सेकुलर राजनीति चमकाने के जुगाड़ में उसी राह पर बढ़ रहे हैं. राहुल के पुलवामा पर दिए बयान का फायदा हाफ़िज़ सईद और ज़कीउर रहमान लखवी को हुआ है.  इस तरह की राजनीति और बयानबाजी का फायदा पाकिस्तान की आईएसआई का प्रोपेगंडा सेल उठाता है और सारी दुनिया के सामने ऐसे बयानों को अपनी मासूमियत के सबूत के रूप में पेश करता है

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तीन दिन पहले देशहित , सेना का सम्मान, और शर्म को दांव पर लगाकर राहुल गांधी ने सवाल पूछा है कि पुलवामा हमले से किसे सबसे ज्यादा फायदा हुआ ? राहुल जी सबसे ज्यादा फायदा पाकिस्तान और उसके जिहादी आतंकियों को हुआ क्योंकि उनका रास्ता रोकने वाले देश के 40 वीर जवान बलिदान हो गए. इन मौतों के दूसरे नंबर के लाभकर्ता शायद आप बनना चाह रहे हैं जो कि पुलवामा हमले की बरसी पर शहीद जवानों के परिवारों और देश के जख्म को कुरेद रहे हैं. आप की इस निर्दयता पर आश्चर्य नहीं होता क्योंकि लाशों की राजनीति करके नफे नुकसान का हिसाब करने का आपकी पार्टी का इतिहास है.
लाशों से फायदा निकालने का ही प्रयास था 1984 का सिख नरसंहार. जब निर्दोष सिखों को उनके घरों से निकलकर जलाया गया था और पुलिस के हाथ बांधकर इस राजनैतिक हत्याकांड को सरकारी सुरक्षा कवच दिया गया था. जब तीन दशकों तक इस मामले में कार्यवाही नहीं की गई. हत्यारों की फौज का नेतृत्व करने वालों को केवल बचाया ही नहीं गया बल्कि पुरस्कृत भी किया गया. मंत्री और मुख्यमंत्री बनाया गया. आपके पिता और तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस सब को जायज ठहराते हुए बयान दिया कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है. 84 के इस भयंकर खूनखराबे के बाद आपकी कांग्रेस पार्टी लोकसभा चुनाव के मैदान में उतरी. देश के अखबारों में राजीव गांधी के लिए वोट मांगने वाला एक विज्ञापन छपवाया गया था, जिसमें एक सिख टैक्सीचालक की बड़ी से तस्वीर पर लिखा गया था कि क्या आप अपने टैक्सीड्राइवर पर भरोसा कर सकते हैं? निर्लज्जता की सभी सीमाओं और सभी संवैधानिक तथा मानवीय दायित्वों को नफरत की आँच में झोंककर सियासत की रोटियां सेंकी गईं.
राहुल जी ! लाशों का सौदा हुआ था जब “देश किसी कीमत पर नहीं बंटेगा” का बार-बार आश्वासन देने के बाद अचानक देश का बंटवारा कर दिया गया था और पाकिस्तान में फंसे उन लाखों हिंदुओं और सिखों को वहां से बाहर निकालने की समुचित व्यवस्था किए बिना उन्मादी भीड़ के हाथों मरने और सम्मान गंवाने के लिए छोड़ दिया गया था. कुर्सी पाने की जल्दी में यह विचार ही नहीं किया गया कि इससे होने वाली मानवीय त्रासदी से कैसे निपटना है. इतने बड़े देश का विभाजन क्या इस प्रकार से होना चाहिए था? क्या जनता से यह पूछा नहीं जाना चाहिए था कि कौन किस ओर रहना चाहता है ? जो लोग भारत आना चाहते थे उन्हें सुरक्षित निकालकर लाना किसकी जिम्मेदारी थी?
राहुल जी ! इस प्रकार की राजनीति आपकी पार्टी को रास आती रही है. गांधी हत्याकांड के बाद संघ का झूठा नाम फंसाकर संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्रीगुरुजी को बिना आरोप मे महीनों जेल में बंद करके रखा गया. हजारों स्वयंसेवकों को प्रताड़ित किया गया. इस घटनाक्रम का एक कम चर्चित लेकिन अधिक जघन्य पहलू ये है कि चूंकि गोडसे  मराठी ब्राह्मण था इसलिए गांधी जी की हत्या का बदला लेने के नाम पर महाराष्ट्र में ब्राहमणों पर हमले किए गए, हत्याएं हुईं उनके घर जलाए गए. गांधी की अहिंसा का दम भरने वालों ने गांधी के नाम पर निर्दोष लोगों के प्राण लिए. अपने पिता की तर्ज पर आप भी इसे बड़ा पेड़ गिरने पर धरती हिलना बताकार उचित सिद्ध कर सकते हैं.
राहुल जी! आपके इस बयान से फायदा हाफ़िज़ सईद और ज़कीउर रहमान लखवी को हुआ है. आपकी इस तरह की राजनीति और बयानबाजी का फायदा पाकिस्तान की आईएसआई का प्रोपेगंडा सेल उठाता है और सारी दुनिया के सामने आप और भारत में आपके जैसे तथाकथित सेकुलर नेताओं के ऐसे बयानों को अपनी मासूमियत के सबूत के रूप में पेश करता है.
लाशों का फायदा उठाने का एक तरीका और होता राहुल जी, वो है लाशों से नज़रें फेर लेना. तभी, जब कश्मीर में हिंदुओं की हत्याएं की जा रही थीं तब आपकी पार्टी अंधी –गूंगी बनकर बैठी थी. घाटी में कई मस्जिदों से ऐलान किया जा रहा था कि “हम कश्मीर को जन्नत बनाएंगे जिसमें पंडितानियां रहेंगी, पंडितों के बिना.” बलात्कार हो रहे थे, नृशंस हत्याएं हो रहीं थीं. और एक दिन अचानक लाखों कश्मीरी हिंदू कश्मीर में अपने घर द्वार- व्यापार-नौकरी-खेती-बाग़ बगीचे छोड़कर जाने पर मजबूर हो गए. आपकी पार्टी चुप थी क्योंकि कश्मीरी हिंदुओं के आंसू पोंछना आपके ‘सेकुलर’ एजेंडे को रास नहीं आता था.
इन लाशों पर आपने कभी आंसू नहीं बहाए . इन पर आप कभी नहीं बोले. आपके आंसू बहे तो बाटला एनकाउंटर पर. आपको सहानुभूति हुई बुरहान वानी से. और आज जब आप बोले तो बलिदानियों के शवों में अपना मुनाफ़ा ढूंढने लगे. और अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान में बैठे उनके हत्यारों को क्लीन चिट दे दी? पाकिस्तान द्वारा आपकी पीठ ठोकी जा रही है, मज़े लीजिए, और पाकिस्तानी एजेंडे को हवा दीजिए.