क्या पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम सिर्फ हिन्दुओं के लिए 'आदर्श मुसलमान' थे
   दिनांक 17-फ़रवरी-2020
हाल ही में आउटलुक पत्रिका के एडिटर-इन-चीफ रूबेन बनर्जी ने पत्रिका में प्रकाशित उमर अहमद के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को केन्द्र में रखकर लिखे गए एक अपमानजनक लेख के लिए माफी मांगी

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आउटलुक ने लिखा: "हमने उमर अहमद का (The Burden Of an unheroic Hero) शीर्षक से लेख प्रकाशित किया, जिसमें पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का अपमान करने वाली टिप्पणी की गई थी। यह प्रकाशित नहीं किया जाना चाहिए। हमें अपने संपादकीय दायितव में हुई चूक पर बेहद अफसोस है।''
बिजनेस टेलीविजन इंडिया के कार्यकारी संपादक सिद्धार्थ जराबी को जवाब देते हुए बनर्जी ने ट्वीटर पर लिखा — “यह संपादकीय निगरानी में चूक थी और हम इसके लिए माफी मांग रहे हैं। हमारी निगरानी विफल साबित हुई।”
उमर अहमद ने अपने लेख में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को एक ऐसे नायक का बोझ लिखा, जो अपने जीवन में नायक नहीं था। उमर ने लिखा— ''एपीजे अब्दुल कलाम न तो सफदर हाशमी थे, जिनकी साल 1989 में एक नाटक के मंचन के दौरान हत्या कर दी गई थी और न ही शेर अली थे। आखिर ऐसा क्यों है कि वे तमाम मुसलमान, जिन्होंने सरकारों की नींव हिलाई और अपनी जान कुर्बान की, मुसलमानों के हीरो नहीं माने जाते हैं? ऐसा क्यों है कि प्रसिद्ध ब्रह्मचारी 'मिसाइल मैन ऑफ इंडिया' केवल दक्षिणपंथियों के बीच मुसलमानों के एक नायक के रूप में स्वीकार्य है?
उमर अहमद का दावा है कि कलाम 'कोई नायक नहीं थे' और 'केवल अपने राजनीतिक आकाओं के आदेशों का पालन कर रहे थे। अहमद के अनुसार — ''डॉ. कलाम कोई नायक नहीं हैं, बल्कि जो असली नायक हैं, उनके उभार में एक रोड़ा हैं।’’
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को लेकर 'आउटलुक' में प्रकाशित लेख को पढ़कर कोई भी भारतीय आक्रोशित हो सकता है लेकिन लेखक का नाम पढ़कर यह समझना बिल्कुल कोई रॉकेट साइंस नहीं है कि उमर अहमद इस्लाम के वहाबी धारा के कट्टरपंथी नेताओं से प्रभावित हैं। जहां डॉ. कलाम जैसे उदार मुसलमानों के लिए अपमान के सिवा कुछ भी नहीं है। अब पत्रिका ने उस लेख को वेबसाइट से हटा लिया है।
हाल में अपने देश को बांटने वाले बयानों के लिए गिरफ्तार हुआ शर्जील इमाम और आउटलुक पत्रिका को डॉ. कलाम के लिए अपने पूर्वाग्रह की वजह से सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने के लिए मजबूर करने वाले उमर अहमद में सोच की समानता साफ दिखाई देती है। महत्वपूर्ण बात यह कि दोनों प्रोपेगंडा वेबसाइट वायर के नियमित लेखक हैं।
07 मई 2018 को वायर के अपने लेख 'इट्स टाइम वी एबजाल्व जिन्ना' में जहां शर्जील लिखता है— बंटवारे ने सबसे अधिक भारतीय मुसलमानों को चोट पहुंचाई है लेकिन इसके लिए जिन्ना या मुस्लिम लीग को दोष देना जरूरी नहीं कि इतिहास की सही व्याख्या हो। अर्थात एक तरफ शर्जील जिन्ना को देश का बंटवारा कराने के अपराध से मुक्त करता है और दूसरी तरफ उमर अहमद देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम को अपमानित करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ता।
इस पूरे प्रकरण पर पत्रकार आदित्य राज कौल ने खरी—खरी बात की। श्री कौल के अनुसार, '‘उमर अहमद को यह समझ में नहीं आ रहा है कि वे न सिर्फ एक बेहद सम्मानित भारतीय मुसलमान पर टिप्पणी कर रहे हैं, बल्कि एक ऐसे पूर्व राष्ट्रपति पर भी टिप्पणी कर रहे हैं, जिसने इस देश को बहुत कुछ दिया है। उमर जैसे लोग कलाम को हीरो बताना बर्दाश्त ही नहीं कर सकते हैं।''
इस्लाम के अंदर कट्टरवादी वहाबी सोच के तुष्टीकरण की प्रवृत्ति को बढ़ावा भारतीय राजनीति की कथित सेकुलर और छद्म निष्पक्ष धारा से ही मिला है। इसी का परिणाम है कि उमर अहमद—शर्जील इमाम के लिए एक तरफ बाबर, औरंगजेब, टीपू सुल्तान, तैमूर, जिन्ना जैसे हत्यारों की पूरी जमात इस्लामिक गौरव का प्रतीक बन जाते हैं और दूसरी तरफ डॉ. कलाम, जयपुर के भजन गायक रमजान खान, गौ सेवक फैज खान जैसे मुसलमान उन्हें फूटी आंख नहीं सुहाते।
अब समय आ गया है कि वहाबी सोच से प्रभावित कट्टरपंथी मुसलमानों की पहचान की जाए और ऐसे लोगों को मुसलमान समाज ही किनारे लगाए। चूंकि ऐसे लोग समाज के लिए दीमक हैं और इनसे मजहब को भी बदनामी के सिवा कुछ हासिल नहीं होना।