सिर्फ आंकड़ा नहीं यह जीत
   दिनांक 18-फ़रवरी-2020
दिल्ली चुनाव में भारी जीत की बधाई के साथ ही आम आदमी पार्टी (आआपा) को एक बात पर तो अपनी गलती माननी पड़ेगी, यही कि ईवीएम सही थी और अरविंद केजरीवाल गलत !

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वैसे, पार्टी के चमकदार प्रदर्शन के बाद अरविंद केजरीवाल हर प्रकार की गलतियों से ऊपर हैं। ऐसी स्थिति, जहां गलत करने पर भी सब सही होता है और कोई उंगली नहीं उठा सकता।
गौर कीजिए, यह जीत केवल आंकड़ा भर नहीं है। आआपा की दमदार वापसी में उस पार्टी का डीएनए बदलने की वह यात्रा भी है जो गत चुनावों तक ‘वालेंटियर्स’ की पार्टी थी और अब पेशेवर रणनीतिकारों के कंधों पर सवार है। यह भी मत भूलिए कि इस जीत में राजनीतिक बेदागी के दावों का अर्थहीन हो जाना भी शामिल है। राजनीति बदलने के लिये आना और खुद बदल जाना अब ऐसा है जिसकी चर्चा अब आआपा के भीतर भी कोई नहीं करता। एडीआर और इलेक्शन वॉच की दागी राजनेताओं पर रिपोर्ट गत दो विधानसभा चुनावों में पार्टी को अलग-बेहतर दिखाने वाला मीडिया कारक थीं, अरविंद खुद लम्बे समय तक इस प्रकार की रिपोर्ट और आंकड़ों का उदाहरण देते थे! किन्तु अब आआपा को इससे फर्क नहीं पड़ता कि रिपोर्ट के मुताबिक उसके विजयी विधायकों में आधे से ज्यादा (38) पर आपराधिक मामले हैं।
आआपा की इस जीत में यदि आप केवल कांग्रेस की नतमस्तक मुद्रा को देखेंगे तो बात अधूरी रह जाएगी। इसके लिए आपको शीला दीक्षित की अगुआई में करीब दशक भर पहले दिल्ली विधानसभा क्षेत्रों के उस परिसीमन को भी देखना होगा जिसने दिल्ली को भाजपा के लिए कठिन मैदान बनाने का आधारभूत काम किया।
खैर, इन पंक्तियों के लिखे जाने तक, दिल्ली में नई सरकार के शपथ ग्रहण की तैयारी हो चुकी है और आगे का पता नहीं, किन्तु अभी तक सूचना यही है कि अरविंद केजरीवाल अपनी इस भारी-भरकम जीत के बाद, शपथग्रहण समारोह में किसी पार्टी के नेता को, किसी दूसरे मुख्यमंत्री को निमंत्रित करने नहीं जा रहे हैं।
अभी तक यह चलन था। अपने-अपने राज्य के नेता, शायद खुद को राष्ट्रीय स्तर का या राष्ट्रीय महत्व का नेता जताने के लिए ऐसा कोई मौका कभी नहीं चूकते थे। रिश्ता एक ही था-हम आपके यहां शादी में आए हैं, अब आप भी हमारे यहां जरूर आना।
किन्तु अब यह राजनीति के एक नए चलन का संकेत भी है, या शायद बहुत दबे पैरों से माहौल परखने की कोशिश भी।
निस्संदेह केजरीवाल इस खेल के अच्छे खिलाड़ी हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव की लड़ाई उन्होंने खेल के नियम और खेल के दांव बदल कर जीती है।
जो हुआ, वह दिखा नहीं। जो दिखा, वह हुआ ही नहीं। जिसकी अपेक्षा थी, वह घटा नहीं, और जो घटित हुआ, वह पुराना दांव भर साबित हुआ। इसे एक घटना के उदाहरण से कहा जाए तो-किसी ने वास्तव में गोली चलाई, वास्तविक वीडियो सबने देखा। यह बाद की बात है कि उस वास्तविकता की वास्तविकता क्या थी! अर्थात! यही कि लड़ाई अब बदल चुकी है।
जो झूठ था, ‘फेक’ था, अब वह और गहरी चाल या कहिये ‘डीप फेक’ के नए अंदाज में सामने आया।
दरअसल, ‘डीप फेक’ वीडियो बनाने वालों का खेल है। लेकिन अब राजनीति समाज की अगुआई भर नहीं बल्कि आशंकाओं को भांप, हल्की से हल्की संभावनाओं को सुगम बनाने वाले एक वीडियो गेम की तरह है। जिसके लिए कूट, सूक्ष्म प्रोग्रामिंग की जाती है। स्क्रीन पर रोचक, बांधे रखने वाला, ‘खेल’ भर दिखता है, प्रोग्रामिंग नहीं। जब कोई वीडियो गेम खेल रहा होता है, तो वह बहुत एकाग्र होता है, सोशल मीडिया से दूर होता है।
प्रचार माध्यमों के जानकार इस बात पर हैरान थे कि पिछले चुनाव में सोशल मीडिया का जमकर प्रयोग करने वाले केजरीवाल ने इस बार इस मैदान की तरफ जैसे झांक कर भी नहीं देखा!
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से दो और तीन सीटों की मांग करने वाले केजरीवाल ने इस बार कांग्रेस की तरफ झांक कर भी नहीं देखा। बिना झांके कांग्रेस ने क्या किया, यह सबके सामने है।
कोई संदेह नहीं कि भाजपा ने आखिरी दिन तक जमकर लड़ाई लड़ी। लेकिन लंबे समय के बाद भाजपा को एक ऐसी हार का सामना करना पड़ा है, जिस पर कोई ठोस सांत्वना वह स्वयं को नहीं दे सकती है। जब राजस्थान या मध्य प्रदेश में भाजपा सत्ता से बाहर हुई, तो वह कह सकती थी कि वह मात्र एक या दो प्रतिशत वोटों से पिछड़ी है। लेकिन दिल्ली में उसकी स्थिति छत्तीसगढ़ की तरह हो गई।
दिल्ली आजादी के बाद से ही जनसंघ और भाजपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में गिनी जाती रही है। और अब भाजपा के परम्परागत प्रभाव वाले क्षेत्रों में से यह देश का एकमात्र हिस्सा है, जहां वह लगभग तीन दशक तक सत्ता से बाहर रहेगी।
इस दौरान कई नए इलाकों में सत्ता में पहुंची है। वहां भी जहां पहले उसे शायद ही महत्व मिलता हो। वहां वह बिना नेता के मैदान में उतरी, और सफल भी रही। जैसे त्रिपुरा, हरियाणा और काफी हद तक उत्तर प्रदेश भी। लेकिन यह सुविधा दिल्ली को महज इस नाते उपलब्ध नहीं थी, कि यह भाजपा का परम्परागत और परिचित क्षेत्र था, और यहां उसके पास केजरीवाल का मुकाबला करने के लिए कोई नेता न देने का कोई ठोस कारण मौजूद नहीं था।
फिर भी अपने कार्यकर्ताओं को अंत तक उत्साहित बनाए रखने में सफल रही। यही कारण है कि इस चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 1998 के बाद से सबसे अधिक है।
यह मानना नादानी होगी कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को इस परिणाम का अनुमान नहीं होगा। ऐसे में भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व की सबसे बड़ी चुनौती अपने कार्यकर्ताओं को उत्साहित बनाए रखने की थी। अमित शाह ने इस चुनौती का खुद सामने आकर सामना किया।
लेकिन बात वहां खत्म नहीं होती है। भाजपा इस स्थिति से बच सकती थी। उसके पास 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद अपने संगठन को दुरुस्त करने, अपनी कमजोरियों पर विचार करने, स्वयं को पुनर्गठित करने, केजरीवाल को टक्कर दे सकने योग्य नेतृत्व देने के लिए पर्याप्त समय था। उसने निश्चित रूप से यह समय व्यर्थ जाने दिया। जब यही भाजपा झारखंड में हार के मात्र दो महीने के भीतर अपनी गलतियां सुधारने के लिए सक्रिय हो गई हो तो अब उसे यही काम दिल्ली में भी करना होगा।
 
@hiteshshankar