अनुवाद से खिलवाड़
   दिनांक 18-फ़रवरी-2020
सोनाली मिश्र
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अनुवाद कहने को एक छोटा शब्द है, परन्तु यह कितना शक्तिशाली है, इसे हाल के कुछ विवादों से समझा जा सकता है। हर शब्द की एक संस्कृति होती है, उसका इतिहास होता है। हाल ही में ऐसा ही एक शब्द सामने आया जो बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के एक पाठ्यक्रम से संबंधित है, वह है भूत विद्या! भूत का यदि अंग्रेजी अनुवाद देखें तो पाएंगे कि इसे ghost से जोड़ दिया है, जबकि जिस भूत विद्या की बात यहां हो रही है वह है Para Humanology.
 
मैं बार-बार कहती हूं कि हर शब्द स्वयं में विशिष्ट है। आयुर्वेद में पञ्च महाभूत की अवधारणा है, तो क्या हम इस पञ्च महाभूत का अनुवाद five great ghost करेंगे? नहीं न! उसे हम panch mahabhoot ही लिखेंगे, क्योंकि यह कोई शब्द नहीं, बल्कि पूरा का पूरा विज्ञान है। इसलिए जब भूत विद्या की बात होती है तो उसे ghost से क्यों जोड़कर देखते हैं?
 
मैंने ट्विटर पर बड़े से बड़े हिंदी पत्रकार को इस पर हंसी उड़ाते हुए देखा। यद्यपि मैं उनके ज्ञान पर हंसने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकती हूं, क्योंकि वे केवल और केवल भाषाई स्तर के पत्रकार हैं, शेष मामलों में पूरी तरह विदेशी हैं। उनका खान-पान विदेशी, विचार विदेशी और रहन-सहन विदेशी, चूंकि शायद वे अंग्रेजी में लिख नहीं पाते होंगे, इसलिए विवशतावश हिंदी में बने हुए हैं।
 
मेरे वैचारिक गुरु प्राय: मुझसे कहते रहते हैं, ‘‘सोनाली हम बोली बोलते हैं, भाषा नहीं! चूंकि हमें बोलने के लिए एक बोली चाहिए, इसलिए हम अपने परिवेश से एक बोली चुन लेते हैं, चाहे वह अंग्रेजी हो या हिंदी!’’ जब से मैंने भूत विद्या पर हिंदी के परम वैचारिक पत्रकारों को उपहास उड़ाता हुआ ट्वीट देखा तो मुझे लगा कि मेरे गुरु कितना सच कहते हैं।
 
मैं लिखने से पहले पचास बार शब्दों को टटोलती हूं। पहले तो मन जो होता था, वह लिख देती थी, परन्तु अनुवाद में मेरे गाइड राजेंद्र पाण्डेय सर ने भी शब्दों के संदर्भ के महत्व के विषय में बताया था और उसके उपरान्त मैं सजग हो गई थी अपने शब्दों के प्रति।
 
हल्का-फुल्का मजाक और अगंभीर पोस्ट हो तो मैं सरल भाषा का प्रयोग करती हूं, परन्तु जब मैं सन्दर्भ देकर बात करती हूं तो बहुत सजग रहती हूं कि मुझे क्या लिखना है।
 
यह जो विषयों के अगंभीर पर्याय हैं, वे विषय को हानि पहुंचाते हैं। भूत विद्या सिद्धांत दर्शन का एक विषय है। सिद्धांत दर्शन के तहत आयुर्वेद से संबंधित सभी विषयों के मूलभूत सिद्धांतों को पढ़ाया जाता है। उसी में भूत विद्या एक विषय है।
यही नहीं, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य की भूमिका पुस्तक में भी आयुर्वेद के आठ अंगों का वर्णन करते हुए उसमें भूत विद्या का उल्लेख किया है। 
 
समस्या यह है कि एक वर्ग वह है जो स्वयं को सर्वज्ञाता समझता है। उसकी निगाह में भारतीय सन्दर्भ एवं भारतीय ज्ञान एक ऐसा पिछड़ा क्षेत्र है, जिसे नीचा दिखाना वह अपना परम कर्तव्य समझता है।
 
बहुधा हम गलत अनुवाद के शिकार होते हैं। हम शाब्दिक अनुवाद के शिकार होते हैं, जबकि अनुवाद का जो प्रथम सिद्धांत है उचित संप्रेषण, उससे विमुख हो जाते हैं। यह जो अंग्रेजी एवं हिंदी अल्पज्ञान वाली पीढ़ी है, उसने शाब्दिक अनुवाद के माध्यम से सब कुछ तहस-नहस कर दिया है।
 
नाइडा के अनुसार, अनुवाद यानी निकटतम समतुल्यता के रूप में व्यक्त करना। उनके अनुसार, kkTranslating consists of reproducing in the receptor language the closest natural equivalent to the message of the source language, first in terms of meaning and secondly in terms of style.ll अत: जब भी भूत विद्या आदि का उल्लेख हो तो उसमें यह अवश्य ध्यान दिया जाए कि यह एक विषय है न कि एक सतही अनुवाद में अर्थ का अनर्थ कर बैठें।
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