‘धर्म, मनुष्य को भगवान बनने के मार्ग पर ले जाता है’’
   दिनांक 18-फ़रवरी-2020
धर्म के कारण ही मनुष्य में ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना निर्मित होती है
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 समारोह को संबोधित करते श्री मोहनराव भागवत
 
गत दिनों पुणे में वारकरी शिक्षण मंडल संस्था, आलंदी द्वारा स्वानंद सुखनिवासी सद्गुरु जोग महाराज के पुण्यतिथि शताब्दी समारोह का आयोजन किया गया। इस मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अध्यात्म के आधार पर हमारे देश का आम आदमी भी विश्व के लोगों का गुरु बन सकता है। उसका धर्म उसकी बुद्धि में नहीं, बल्कि उसके आचरण में है। धर्म से जीवन की धारणा होती है। मनुष्य की बुद्धि जैसी हो, उस प्रकार का अच्छा या बुरा कार्य वह करता है। यहां एक धर्म ही है जो मनुष्य को दानव नहीं, बल्कि भगवान बनने के मार्ग पर ले जाता है। धर्म के कारण ही मनुष्य में ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना निर्मित होती है।
 
उन्होंने आगे कहा कि भारत एक धर्मनिष्ठ देश है। यदि हमें अपने देश में कुछ करना है, बोलना है तो धर्म का आधार लेना पड़ता है। भौतिक चीजों को देखते हुए अपने अंदर भी देखना हमारे ऋषि-मुनियों को जिस दिन ज्ञात हुआ, उसी दिन अध्यात्म का जन्म हुआ। हमारे देश के लिए भी यही हो रहा है। भारत ने कभी भी बाहरी दुनिया को अस्वीकार नहीं किया, लेकिन अपना भी अन्वेषण किया। इस प्रकार अध्यात्म का अन्वेषण कर, उसका विकास कर, उसका अनुसरण करने वाला भारत दुनिया का शायद एकमात्र देश होगा। हम विविधता में एकता कहते हैं, लेकिन हमारे देश ने बहुत पहले साबित कर दिया है कि यह एकता की विविधता है। जीवन को शांति, संतोष और समृद्धि से जीने के लिए हमारे देश ने कुछ नियम निर्धारित किए हैं, जिन्हें हम धर्म कहते हैं। धर्म यानी जीवन जीने का मार्ग है और हर एक का अपना अलग रास्ता है। हालांकि सत्य की ओर जाने वाला मार्ग एक ही है। आप कितना कमाते हैं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आप कितना बांटते हैं। इस प्रकार की शिक्षा देने वाला ही शाश्वत धर्म है। हमारे इसी धर्म का दर्शन हम अपने भाषणों व पुस्तकों से तो दे सकते ही हैं, लेकिन प्रत्यक्ष धर्म जीने वाले और उसके प्रभाव से समृद्ध होने वाले लोग भी हम दिखा सकते हैं। हमारे पास ऐसी कई परंपराएं हैं।  विसंके, पुणे
‘‘संघ ने कभी जाति, वर्ग,पंथ का भेदभाव नहीं माना’’
 
‘‘भारत और हिन्दू अलग-अलग नहीं हैं। संस्कार, समर्पण, संगठन, सकारात्मकता आदि गुण आत्मसात करके देशहित के लिए सक्रिय रहने वाले नागरिकों की आज देश को आवश्यकता है। संघ कभी भी जाति, वर्ग, पंथ के भेदभाव को नहीं मानता। राष्ट्र के खिलाफ होने वाली गतिविधियों को लेकर आवाज उठाने वाला, देशहित की चिंता करने वाला, देश को सामर्थ्यवान बनाने के लिए सर्वस्व अर्पण करने वाला कार्यकर्ता स्वयंसेवक है।’’ उक्त बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी ने कही। वे गत दिनों पणजी में ‘विश्वगुरु भारत-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम में प्रबुद्ध नागरिकों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि विविध तत्वों ने लगातार देश को तोड़ने का प्रयास किया, लेकिन वह प्रयास कभी सफल नहीं हुआ और कभी सफल होगा भी नहीं। वैश्विक चिंतन करने का सामर्थ्य केवल भारत के पास ही है। अपनी परंपरा, धारणा संपूर्ण मानव जाति के कल्याण की है। विश्व को समन्वय के मार्ग से आगे ले जाने का कार्य ईश्वर ने भारत को सौंपा है। वह कार्य जब पूरा होगा, तभी सब समस्याओं का समाधान होगा। उन्होंने कहा कि ‘एक देश, एक समाज’ यह भावना हर एक के मन में होनी चाहिए। ‘अतिथि देवो भव:’ यह भारत की संस्कृति है।
 
हिन्दू समाज को संगठित करने का मतलब किसी के विरोध में खड़े रहना और सांप्रदायिकता फैलाना नहीं होता। संगठित समाज देश की आवश्यकता है। यह बात संघ का विरोध करने वालों को ध्यान में रखनी चाहिए। अनेक लोग भारत के ‘सुपर पॉवर’ बनने की बात करते हैं। ‘पॉवर’ मतलब साम्राज्य और विश्व पर साम्राज्य स्थापित करना, यह भारत की आवश्यकता नहीं है। भारत के आगे ‘सुपर राष्ट्र’ होने का लक्ष्य है। भारत को इसी दृष्टि से प्रयास करना चाहिए। यह राष्ट्र शक्तिसंपन्न होना चाहिए, और विश्व के सामने आदर्श बनकर खड़ा होना चाहिए। यह संघ का उद्देश्य है। इस मौके पर गोवा के मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत, गोवा के संघचालक नाना उर्फ लक्ष्मण बेहरे, कोंकण सह प्रांत संघचालक बाबा उर्फ अर्जुन चांदेकर, सदानंद शेटे आदि मौजूद थे। -विसंके,पणजी