स्वदेशी का चिंतन करते हुए ग्राम आधारित उद्योगों को मिले बढ़ावा
   दिनांक 18-फ़रवरी-2020


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संगोष्ठी को संबोधित करते श्री अनिरुद्ध देशपांडे 

‘‘पश्चिम और भारतीय चिंतन में अधिक अंतर उपभोग का है। पश्चिम में मान्यता है कि दुनिया हमारे उपभोग के लिए है इसलिए वहां व्यक्ति-केंद्रित विकास की अवधारणाएं हैं। इसके विपरीत भारत की अर्थव्यवस्था पांच घटक-व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और सृष्टि के आधार पर विकास के मापदंडों का निर्धारण करती है। भारतीय चिंतन में व्यक्ति चिंतन के साथ समाज और आध्यात्मिक चिंतन का समावेश है। यहां पर समाज, समाज की चिंता करता है, जबकि पश्चिम का चिंतन बिल्कुल अलग है।’’

उक्त विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख डॉ. अनिरुद्ध देशपांडे ने व्यक्त किए। वे गत 8 फरवरी को आगरा विश्वविद्यालय के खंदारी परिसर स्थित जेपी सभागार में आयोजित प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। विकास की भारतीय अवधारणाविषय पर उन्होंने कहा कि भारत में 16 प्रतिशत महिलाएं रोजगार के क्षेत्र में हैं। पुरुषों के साथ महिलाओं का रोजगार प्रतिशत बढ़ना चाहिए। मानव की उपभोग वाली वृत्ति से पर्यावरण का बड़ा नुकसान हो रहा है। ऋतु परिवर्तन चिंता की बात है। हमें सभी संसाधनों का संरक्षण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वदेशी का चिंतन करते हुए ग्राम आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए। महात्मा गांधी ने कहा था कि सबसे नजदीक जो उपलब्ध है, उसका हमें प्रयोग करना चाहिए। अपने गांव, तहसील, जिले में जो मिले उसे प्रयोग करें। उन्होंने कहा कि आज जो मुद्रा उद्योग, स्टार्टअप, आयुष्मान जैसी सरकारी योजनाएं चल रही हैं, वह समाज को केंद्रित रखकर बनाई गई हैं। 9 करोड़ लोगों ने स्वेच्छा से गैस सब्सिडी छोड़ी, परिणामत: 12 करोड़ महिलाओं को गैस का चूल्हा उपलब्ध कराया गया। इसलिए विकास के मॉडलमें समाज की सहभागिता जरूरी है। हमारा चिंतन बचत पर आधारित है। भारत में बचत दर सर्वाधिक है। -विसंके, आगरा